PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(From vowel i to Udara)

Radha Gupta, Suman Agarwal and Vipin Kumar

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I - Indu ( words like Ikshu/sugarcane, Ikshwaaku, Idaa, Indiraa, Indu etc.)

Indra - Indra ( Indra)

Indrakeela - Indradhwaja ( words like Indra, Indrajaala, Indrajit, Indradyumna, Indradhanusha/rainbow, Indradhwaja etc.)

Indradhwaja - Indriya (Indradhwaja, Indraprastha, Indrasena, Indraagni, Indraani, Indriya etc. )

Indriya - Isha  (Indriya/senses, Iraa, Iraavati, Ila, Ilaa, Ilvala etc.)

Isha - Ishu (Isha, Isheekaa, Ishu/arrow etc.)

Ishu - Eeshaana (Ishtakaa/brick, Ishtaapuurta, Eesha, Eeshaana etc. )

Eeshaana - Ugra ( Eeshaana, Eeshwara, U, Uktha, Ukhaa , Ugra etc. )

Ugra - Uchchhishta  (Ugra, Ugrashravaa, Ugrasena, Uchchaihshrava, Uchchhista etc. )

Uchchhishta - Utkala (Uchchhishta/left-over, Ujjayini, Utathya, Utkacha, Utkala etc.)

Utkala - Uttara (Utkala, Uttanka, Uttama, Uttara etc.)

Uttara - Utthaana (Uttara, Uttarakuru, Uttaraayana, Uttaana, Uttaanapaada, Utthaana etc.)

Utthaana - Utpaata (Utthaana/stand-up, Utpala/lotus, Utpaata etc.)

Utpaata - Udaya ( Utsava/festival, Udaka/fluid, Udaya/rise etc.)

Udaya - Udara (Udaya/rise, Udayana, Udayasingha, Udara/stomach etc.)

 

 

 

Puraanic contexts of word Indra are given here.

Comments on Indra by Dr. Tomar

Esoteric aspect of Indra

इन्द्र अग्नि ८४.३२( ८ देवयोनियों में पंचम ), २३७( राज्यलक्ष्मी की स्थिरता के लिए इन्द्र द्वारा श्री की स्तुति ), २६८.५( इन्द्र व शची पूजा विधान ), कूर्म १.४३.२०( ज्येष्ठ मास में इन्द्र नामक आदित्य का तपना, इन्द्र आदित्य की रश्मि संख्या का कथन ), गरुड १.१४( १४ मन्वन्तरों में इन्द्रों के नाम, इन्द्र - शत्रु व शत्रु - हन्ता विष्णु के रूप ), ३.७.१(इन्द्र द्वारा हरि-स्तुति), ३.२८.२८(इन्द्रद्युम्न, पुरंदर, वाली आदि ७ की इन्द्र संज्ञा), गर्ग ३.४( कृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण पर इन्द्र के गर्व का खण्डन, इन्द्र द्वारा कृष्ण की स्तुति ), देवीभागवत ५.८.७१( इन्द्र के तेज से देवी के मध्य भाग की उत्पत्ति ), ६.७( फेन से सन्ध्या समय में वृत्र का वध, ब्रह्महत्या के भय से कमल नाल में छिपना, नहुष द्वारा इन्द्र पद की प्राप्ति ), नारद १.४०.१३( इन्द्र द्वारा सुधर्मा से अतीत के मन्वन्तरों के इन्द्रों आदि के विषय में पृच्छा ), १.११६.२६( ज्येष्ठ शुक्ल सप्तमी को इन्द्र नामक आदित्य के जन्म का उल्लेख ), १.१२४.४३( शक्र पूर्णिमा व्रत की विधि ), पद्म १.४.११( दुर्वासा द्वारा प्रदत्त माला की उपेक्षा से इन्द्र द्वारा शाप प्राप्ति ), १.२२.९( इन्द्र द्वारा वायु व अग्नि को समुद्र शोषण की आज्ञा, आज्ञा उल्लंघन पर वायु व अग्नि को अगस्त्य व वसिष्ठ ऋषि बनने का शाप ), २.३.३४( शिवशर्मा - पुत्र विष्णुशर्मा द्वारा इन्द्र से अमृत कलश व पितृभक्ति रूप वर प्राप्ति ), २.५.७४( विष्णु लोक निवासी सुव्रत ब्राह्मण का अदिति के गर्भ से जन्म लेकर वसुदत्त नामक इन्द्र बनना, देवों आदि द्वारा इन्द्र का अभिषेक ), २.५३+ ( इन्द्र द्वारा काम की सहायता से कृकल - पत्नी सुकला के पातिव्रत्य को भङ्ग करने की चेष्टा, धर्म द्वारा सुकला की रक्षा ), ५.१६.१४( शर्याति के सोम याग में अश्विनौ को भाग दान पर इन्द्र द्वारा वज्र ग्रहण, च्यवन द्वारा बाहु स्तम्भन ), ६.६.१५( इन्द्र का जालन्धर - सेनानी बल से युद्ध, इन्द्र द्वारा बल का रत्न रूपी शरीर प्राप्त करना ), ६.९६( इन्द्र द्वारा शिव की खोज, शिव पर वज्र प्रहार, जालन्धर की उत्पत्ति का प्रसंग ), ६.१५१.१( इन्द्रग्राम तीर्थ का माहात्म्य : धवलेश्वर शिव की स्थिति, युगान्तरों में नाम, नन्दी - किरात वृत्तान्त ), ६.१९२( नवीन इन्द्र के कारण इन्द्र का राज्य से च्युत होना, गीता के १८वें अध्याय के पाठ से वैकुण्ठ लोक की प्राप्ति ), ६.२००.४( स्वराज्य प्राप्ति पर इन्द्र द्वारा खाण्डव वन में यज्ञ, इन्द्रप्रस्थ की स्थापना, शिवशर्मा - पुत्र विष्णुशर्मा बनना ), ब्रह्म १.७९( कृष्ण द्वारा इन्द्र याग के स्थान पर गोवर्धन पूजा की कथा ), २.२३( विश्वामित्र द्वारा श्व मांस भक्षण की चेष्टा पर इन्द्र द्वारा मांस युक्त स्थाली का हरण, मधुस्थाली प्रस्तुत करना, विश्वामित्र के कोप से मुक्ति के लिए मधुवर्षण करना ), २.२६( इन्द्र तीर्थ का माहात्म्य : ब्रह्महत्या से निवृत्ति के लिए देवों द्वारा इन्द्र का अभिषेक ), २.३०( इन्द्र द्वारा बालखिल्यों के अपमान पर बालखिल्यों द्वारा कश्यप को इन्द्र दर्पहर पुत्र सुपर्ण व सर्प उत्पन्न करने की प्रेरणा देना ), २.५२( धन्वन्तरि नृप द्वारा तप से इन्द्र पद की प्राप्ति, इन्द्र द्वारा राज्य से अच्युति के लिए हरि व हर की स्तुति ), २.५४.४०( ब्राह्मण रूप धारण करके मय से मैत्री रूप वर की प्राप्ति, दिति के गर्भ का छेदन ), २.५४.७८( दिति के गर्भ के छेदन पर अगस्त्य व दिति द्वारा इन्द्र को शाप ), २.५९.१३( महाशनि द्वारा इन्द्र का बन्धन, अपमान व मुक्ति, इन्द्र द्वारा शिव व विष्णु की स्तुति, शिव - विष्णु रूप धारी पुरुष द्वारा महाशनि का वध ), २.७०( इन्द्र से स्पर्द्धा में आत्रेय द्वारा कृत्रिम इन्द्रपुरी का निर्माण, असुरों द्वारा इन्द्र के भ्रम में आत्रेय का बन्धन, आत्रेय द्वारा इन्द्र की स्तुति व पूर्वावस्था में आगमन, द्र. ऋग्वेद २.१२.१ ), २.१०१( राजा प्रमति से अक्ष क्रीडा में इन्द्र द्वारा उर्वशी व वज्र आदि को दांव पर हारना, चित्रसेन गन्धर्व द्वारा प्रमति को हराना ), ब्रह्मवैवर्त्त ४.१४.४९( इन्द्र द्वारा रम्भा के अंश से उत्पन्न जनमेजय - भार्या से सम्भोग की कथा ), २.२६.२३( पारिजात पुष्प के निरादर करने पर दुर्वासा के शाप से भ्रष्ट - श्री होना ), ३.२०.९( महेन्द्र का रम्भा से समागम, पारिजात पुष्प के निरादर से दुर्वासा द्वारा भ्रष्ट - श्री होने का शाप ), ४.२१( व्रज में इन्द्रध्वज उत्सव का वर्णन, कृष्ण द्वारा इन्द्र उत्सव के स्थान पर गोवर्धन पूजा कराने पर इन्द्र का कोप, नन्द द्वारा इन्द्र की स्तुति, कृष्ण द्वारा वृष्टि निवारण हेतु गोवर्धन धारण, इन्द्र द्वारा पराजित होने पर कृष्ण की स्तुति ), ४.४७.१०( इन्द्र द्वारा गुरु के अपमान पर शाप प्राप्ति, अहल्या गमन की कथा, कृत्या भय से कमल तन्तु में प्रवेश, नहुष को राज्य प्राप्ति, इन्द्र द्वारा कवच प्राप्ति, लोमश का आगमन ), ४.५९( इन्द्र के दर्प भङ्ग के प्रसंग में नहुषोपाख्यान ), ४.६१( कल्पान्तर में इन्द्र के दर्प भङ्ग के प्रसंग में इन्द्र द्वारा अहल्या धर्षण की कथा ), ब्रह्माण्ड १.२.७.१६६( क्षत्रियों को ऐन्द्र स्थान प्राप्ति का उल्लेख ), ३.४.६( इन्द्र द्वारा दुर्वासा - प्रदत्त माला के तिरस्कार से लक्ष्मी द्वारा इन्द्र का त्याग, बृहस्पति द्वारा पशु यज्ञ का निरूपण ), ३.४.७( बृहस्पति द्वारा इन्द्र हेतु स्तेय/धन हरण व अन्न के गुण - दोषों का निरूपण ), ३.४.८( बृहस्पति द्वारा अगम्यागमन दोष का वर्णन ), ३.४.९( इन्द्र द्वारा विश्वरूप का वध व ब्रह्महत्या के विभाजन की कथा, श्री प्राप्ति हेतु समुद्र मन्थन ), ३.४.१२.६४( भण्डासुर पर विजय प्राप्ति हेतु इन्द्र द्वारा ललिता देवी की आराधना ), ३.४.१५.२२( इन्द्र द्वारा ललिता को मधु पात्र भेंट करना ), भविष्य १.५७.१३( इन्द्र हेतु राजवृक्ष बलि का उल्लेख ), १.१२५.२४( १४ मन्वन्तरों में १४ इन्द्रोंके नाम ), २.१.१८.१०( पुंसवन कर्म में अग्नि का इन्द्र नाम ), ३.४.१८.१७( संज्ञा स्वयंवर में इन्द्र द्वारा बल असुर से युद्ध ), भागवत ४.१९.११( इन्द्र द्वारा पृथु के अश्वमेध यज्ञ का अश्व चुराना ), ६.९.४( इन्द्र द्वारा विश्वरूप का वध, ब्रह्महत्या की प्राप्ति, ब्रह्महत्या का प्राणियों में वितरण ), ६.११+ ( इन्द्र का वृत्र से युद्ध व वज्र द्वारा वध ), ६.१३( इन्द्र पर ब्रह्महत्या का आक्रमण, इन्द्र का कमलनाल में प्रवेश, अश्वमेध द्वारा मुक्ति ), ६.१८.५६( इन्द्र द्वारा दिति के गर्भ का छेदन, मरुतों की उत्पत्ति ), ८.५.३( पांचवे रैवत मन्वन्तर में विभु नामक इन्द्र ), ८.५.८( छठें चाक्षुष मन्वन्तर में मन्त्रद्रुम नामक इन्द्र ), ८.१०.२८( देवासुर सङ्ग्राम में इन्द्र का बलि से युद्ध ), १०.२४( कृष्ण द्वारा इन्द्र याग का निवारण व गोवर्धन पूजा ), मत्स्य ४७.९६( शुक्र - पत्नी द्वारा इन्द्र को स्तम्भित करना, इन्द्र का विष्णु में प्रवेश करना ), १०१.६९( इन्द्र व्रत की संक्षिप्त विधि व माहात्म्य ), १०१.८०( इन्द्र व्रत का संक्षिप्त माहात्म्य ), १४८.९६( इन्द्र ध्वज पर हेम मातङ्ग चिह्न ), १७४.४( तारकासुर सङ्ग्राम में इन्द्र के रथ का वर्णन ), मार्कण्डेय ५.११( वृत्र हत्या पर इन्द्र के बल का मरुत में अवगमन ), ५.१२( अहल्या के धर्षण पर इन्द्र के रूप का नासत्यौ में अवगमन ), लिङ्ग १.१०७( उपमन्यु बालक की परीक्षार्थ शिव का शक्र रूप धारण करके उपमन्यु के समीप गमन व शिव की निन्दा ), वराह १२६.८५( कुब्जाम्रक तीर्थ के अन्तर्वर्ती शक्र तीर्थ का माहात्म्य ), १४६.८( देवदत्त ऋषि के तप में विघ्न हेतु इन्द्र द्वारा प्रम्लोचा अप्सरा का प्रेषण ), वायु ६८.८/२.७.८( दनु के १०० पुत्रों में से एक ), विष्णु १.९( दुर्वासा - प्रदत्त माला के तिरस्कार से इन्द्र की असुरों से पराजय की कथा ), ३.१( १४ मन्वन्तरों में इन्द्र, देवता व सप्तर्षियों का वर्णन ), ४.२.२९( पुरञ्जय राजा का वृषभ रूप धारी इन्द्र पर आरूढ होकर असुरों से युद्ध करना ), ४.२.६०( इन्द्र की अमृत स्राविणी अङ्गुलि से मान्धाता बालक का पालन ), ५.११( गोपों द्वारा इन्द्र पूजा की उपेक्षा पर इन्द्र का कोप, कृष्ण द्वारा गोवर्धन धारण ), विष्णुधर्मोत्तर १.२४( इन्द्र के बिस तन्तु में निवास का प्रसंग ), १.१७५+ ( मन्वन्तरों में इन्द्र के नाम ), १.१७६+ ( इन्द्र का शाम्बरायणि से मन्वन्तर विषयक संवाद ), १.२२२.३१( मेघनाद द्वारा इन्द्र का बन्धन, कारण ), १.२३०.३( स्कन्द वधार्थ इन्द्र द्वारा ग्रहों की सृष्टि, स्कन्द द्वारा प्रतिग्रहों की सृष्टि ), २.१५७( इन्द्र ध्वज उत्सव काल में पठनीय मन्त्र व इन्द्र की स्तुति ), ३.५०( इन्द्र की प्रतिमा का स्वरूप , शक्र के त्रिनेत्र होने का कथन), ३.१९६( शक्र व्रत विधि व संक्षिप्त माहात्म्य ), शिव ३.३०( इन्द्र द्वारा शिव अन्वेषण प्रसंग में भीषण पुरुष के दर्शन, इन्द्र द्वारा वज्र प्रहार, इन्द्र की मृत्यु व पुन: सञ्जीवन, जालन्धर की उत्पत्ति का प्रसंग ), ५.३४.१२( १४ मन्वन्तरों में इन्द्रों के नाम ), ७.१.३५( उपमन्यु बालक की परीक्षार्थ शिव का शक्र रूप धारण करके उपमन्यु के समीप गमन व शिव की निन्दा ), स्कन्द १.१.८.२२( इन्द्र द्वारा रत्नमय लिङ्ग की पूजा का उल्लेख ) १.१.१५.४( असुरों का पक्ष लेने वाले त्रिशिरा विश्वरूप की इन्द्र द्वारा हत्या पर ब्रह्महत्या द्वारा इन्द्र का अनुगमन, इन्द्र का सरोवर में छिपना, नहुष का इन्द्र पद पर आसीन होना व इन्द्र पद से पतन का वृत्तान्त ), १.१.१६.१९( इन्द्र द्वारा त्रिशिरा की हत्या के कारण प्राप्त ब्रह्महत्या को पृथिवी, वृक्ष आदि में विभाजित करना ), १.१.१७.१६९( इन्द्र का वृत्र से युद्ध, वृत्र द्वारा इन्द्र का निगरण, इन्द्र का वृत्र की कुक्षि का भेदन करके बहिर्गमन ), १.१.१८.६४( बलि द्वारा ३ घडी के लिए इन्द्र पद प्राप्ति का वृत्तान्त ), १.१.१८.१२१( इन्द्र द्वारा ब्राह्मण वेश में प्रह्लाद - पुत्र विरोचन से शिर की याचना ), १.२.६२.२६( इन्द्रमूर्ति : क्षेत्रपालों के ६४ प्रकारों में से एक ), २.४.१४.५( इन्द्र द्वारा कैलास पर शिव का अन्वेषण, शिव पर वज्र क्षेपण, मृत्यु व पुन: सञ्जीवन ), २.७.१९.२०( इन्द्र के प्राण से श्रेष्ठ व गिरिजा से अवर होने का उल्लेख ), २.७.१९.४०( हस्तों से इन्द्र के विनिष्क्रान्त होने पर भी देहपात न होने का कथन ), २.७.२३.९( इन्द्र द्वारा उतथ्य - पत्नी से बलात्कार, वैशाख मास धर्माचार से पाप से मुक्ति ), ३.१.४.५३( इन्द्र द्वारा पर्वतों के पक्ष छेदन का वृत्तान्त ), ३.१.११.५( इन्द्र द्वारा कपालाभरण राक्षस के वध के कारण ब्रह्महत्या की प्राप्ति, सीता सरोवर में स्नान से मुक्ति ), ३.२.३+ ( धर्मराज/यम के तप से इन्द्र का भयभीत होना, वर्धिनी अप्सरा का धर्म के तपोभङ्ग हेतु गमन ), ३.२.१९.१०( इन्द्र द्वारा शिव से ब्रह्महत्या से मुक्ति का उपाय पूछना ), ४.२.८१.३( वृत्रहत्या के कारण प्राप्त ब्रह्महत्या के निवारण के लिए इन्द्र द्वारा धर्मेश लिङ्ग के निकट तप ), ५.२.३५( वृत्र वध से उत्पन्न ब्रह्महत्या दोष की निवृत्ति के लिए इन्द्र द्वारा इन्द्रेश्वर लिङ्ग की स्थापना, लिङ्ग का माहात्म्य ), ५.२.४४.३३, ५.३.२८.११( बाणासुर वधार्थ निर्मित शिव के रथ में इन्द्र का अक्ष बनना ), ५.३.३२( इन्द्र द्वारा चित्रसेन गन्धर्व - पुत्र पत्र को मृत्यु लोक में जाने का शाप ), ५.३.६१( शक्र तीर्थ का माहात्म्य : इन्द्र द्वारा शिव की आराधना ), ५.३.८३.१०४( गौ के शृङ्गाग्र में इन्द्र की स्थिति का उल्लेख ), ५.३.११८( इन्द्र तीर्थ का माहात्म्य : इन्द्र द्वारा ब्रह्महत्या से मुक्ति हेतु तप ), ५.३.१३८( शक्रेश्वर तीर्थ का माहात्म्य : शक्र द्वारा गौतम के शाप से निवृत्ति हेतु स्थापना ), ५.३.१९१.१३( इन्द्र नामक आदित्य के पूर्व दिशा में तपने का उल्लेख ), ५.३.२३१.१४( रेवा - सागर सङ्गम पर ५ इन्द्रेश्वर तीर्थों की स्थिति का उल्लेख ), ६.८.७३( इन्द्र द्वारा दधीचि की अस्थियों से निर्मित वज्र से वृत्र का वध, ब्रह्महत्या दोष की निवृत्ति हेतु हाटक लिङ्ग की पूजा ), ६.७९.१( दक्ष यज्ञ हेतु समिधा वहन करते हुए बालखिल्यों का इन्द्र द्वारा उपहास, बालखिल्यों द्वारा मन्त्रों से इन्द्र - दर्प हन्ता गरुड को उत्पन्न करने का वृत्तान्त ), ६.१८१.५३( यज्ञ में ब्रह्मा की पत्नी की व्यवस्था हेतु इन्द्र द्वारा गोप कन्या को गौ शरीर द्वारा पवित्र करके गायत्री में रूपान्तरित करने की कथा ), ६.१९२.६५( ब्रह्मा के यज्ञ में सावित्री द्वारा इन्द्र को शत्रुओं द्वारा बन्धन का शाप ), ६.२०६.४४( इन्द्र द्वारा गया में श्राद्ध करना, विश्वेदेवों  का आह्वान होने पर भी न आने पर शाप दान ), ६.२०७( गौतम द्वारा स्पर्श से सहस्रभग का सहस्र नेत्रों में रूपान्तरित होना, मेष के वृषण लगना, इन्द्र पञ्चरात्र पूजा विधान ), ७.१.२२४( इन्द्र द्वारा स्थापित लिङ्ग का माहात्म्य : ब्रह्महत्या दोष से मुक्ति ), ७.१.२५५.६१( ऋषियों की बिसों की चोरी पर शुनोमुख नामक इन्द्र द्वारा व्यक्त प्रतिक्रिया ), ७.१.२९५( इन्द्रेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य ), ७.४.१४( इन्द्रेश्वर लिङ्ग का माहात्म्य, लिङ्ग का वृद्धि लिङ्ग उपनाम ), ७.४.१७.३३( इन्द्रेश : द्वारका के उत्तर द्वार पर स्थित महेश्वर का नाम ), हरिवंश १.२७.१३( इन्द्र द्वारा कुशिक - पुत्र गाधि रूप में जन्म लेना ), २.६३.३२( नरकासुर को मारने के लिए इन्द्र का कृष्ण से अनुरोध ), २.६६+ ( पारिजात वृक्ष न देने पर कृष्ण द्वारा गदा प्रहार की धमकी, इन्द्र द्वारा युद्ध ), ३.५.१३( इन्द्र की जनमेजय की पत्नी में आसक्ति, जनमेजय द्वारा अश्वमेध में इन्द्र का यजन न होने का शाप ), ३.५२.१०( देवासुर सङ्ग्राम में इन्द्र के रथ का वर्णन ), योगवासिष्ठ ३.८९( राजा इन्द्रद्युम्न की पत्नी अहल्या की इन्द्र नामक ब्राह्मण पर कामासक्ति पर इन्द्रद्युम्न द्वारा अहल्या व इन्द्र को यातनाएं देना, प्रेमियों का यातनाओं से अप्रभावित रहना, भरत ऋषि द्वारा प्रेमी युगल को शाप से नष्ट करना ), ६.१.१२८.९( पाणि का इन्द्र में न्यास ), ६.२.१३.१८( शत्रुओं से युद्ध करते हुए थक जाने पर इन्द्र का किसी छिद्र में अन्त:प्रवेश करके सूर्य की किसी किरण/त्रसरेणु में विश्राम पाना व अन्तस्थ लोकों के दर्शन करना ), वा.रामायण १.२४.१८( वृत्र हत्या वध जनित दोष से युक्त इन्द्र का देवों द्वारा अभिषेक, अभिषेक से उत्पन्न मल की मलद व कारूष प्रदेशों में व्याप्ति, इन्द्र द्वारा देशों को वरदान ), १.४८( इन्द्र का अहल्या से समागम, गौतम शाप से विफल होना, मेष के वृषण से युक्त होना ), ३.५६प्रक्षिप्त( लङ्का में सीता को दिव्य हवि प्रदान करना, देवत्व का प्रमाण देना ), ७.२७( रावण से भय, विष्णु से सहायता की प्रार्थना ), ७.२८+ ( रावण से युद्ध, मेघनाद द्वारा बन्धन, ब्रह्मा द्वारा मोचन का उद्योग ), ७.८५( वृत्र वध पर ब्रह्महत्या की प्राप्ति, अश्वमेध अनुष्ठान से मुक्ति ), लक्ष्मीनारायण १.८९( उर्वशी नर्तन उत्सव में इन्द्र द्वारा बृहस्पति की अवमानना, दुर्वासा द्वारा प्रदत्त माला का तिरस्कार, दुर्वासा द्वारा इन्द्र की राज्य श्री नष्ट होने का शाप ), १.९०( बृहस्पति द्वारा उत्पन्न कृत्या व दुर्वासा के शाप पुरुष द्वारा स्वर्ग के रत्नों को सागर में फेंकना, बलि व इन्द्र द्वारा समुद्र मन्थन के उद्योग का निश्चय ), १.३२०.१६( राजा - पुत्री सुदुघा का पयस से इन्द्र की वृद्धि करना ), १.३२०.९०( मेधावी - पुत्री मेधावती द्वारा पांच इन्द्रों की पति रूप में प्राप्ति, पांच इन्द्रों का द्वापर में पांच पाण्डव बनना ), १.३७४( इन्द्र के राज्य से च्युत होने पर नहुष का इन्द्र पद पर आसीन होना ), १.३७५( वर्षा के कारण विनाश रोकने के लिए अहल्या द्वारा इन्द्र का आह्वान, इन्द्र की अहल्या पर आसक्ति, अहल्या को स्पर्श करने से गौतम शाप से भगाङ्गता प्राप्ति ), १.४४१.९६( इन्द्र का शिरीष वृक्ष के रूप में अवतरण ), १.४५९.८४( विश्वानर - पुत्र गृहपति द्वारा इन्द्र का तिरस्कार करने पर इन्द्र द्वारा वज्र प्रहार, शिव द्वारा रक्षा ), १.४८६( विप्र बालक रूप धारी नारायण द्वारा इन्द्र से ब्रह्माण्ड के असंख्य इन्द्रों का कथन, इन्द्र के गर्व का खण्डन, लोमश द्वारा इन्द्र को आयु की अल्पता का कथन ), १.५१७.७९( शिव द्वारा अन्धकासुर के भावी निग्रह पर इन्द्र द्वारा द्रष्ट शुभ स्वप्न का वर्णन ), २.१४६.१२८( वास्तुमण्डल के मेढ} में इन्द्र देवता का आह्वान ), २.२४६.२९( अतिथि के इन्द्रलोकेश होने का उल्लेख ), ३.२५.४( भविष्य के ५ इन्द्रों के नाम ), ३.२५.६१( देवसख, कीर्ति, कदम्ब आदि ५ भ्राताओं का भावी इन्द्र होना ), ३.६०.५०( पुरुषोत्तम विष्णु द्वारा इन्द्र रूप धारण करके चिदम्बरा भक्ता की परीक्षा लेना ), ३.९३( देवशर्मा -पत्नी रुचि से समागम के लिए इन्द्र द्वारा नानाविध रूप धारण करने का उल्लेख ), ४.८१.३८( इन्द्रवज्र : नन्दिभिल्ल राजा का सेनापतियुद्ध के लिए प्रस्थान करने पर अपशकुनों का कथन ), ४.८३.६२( कुवर द्वारा युद्ध में इन्द्रवज्र के वध का वर्णन ), कथासरित् ७.७.१४( पुत्र की मृत्यु पर नागार्जुन द्वारा अमृत निर्माण का उद्योग, इन्द्र के आदेश से निर्माण से निवृत्त होना ), ८.६.१९२( सुलोचना - पति आदित्यशर्मा द्वारा इन्द्र का तिरस्कार, इन्द्र द्वारा मृत्यु लोक में जाने का शाप ), १८.२.१२८( कलावती द्वारा ठिण्ठाकराल को कर्ण उत्पल में छिपाकर इन्द्र सभा में रम्भा नृत्य में ले जाना, ज्ञात होने पर इन्द्र द्वारा कलावती को देवागार में सालभञ्जिका होने का शाप ), अथर्व ५.२६.११(इन्द्रो युनक्तु बहुधा वीर्याणि),  द्र. पुरन्दर, महेन्द्र मौलेन्द्र Indra

Esoteric aspect of Indra

Vedic view of Indra