PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(From vowel i to Udara)

Radha Gupta, Suman Agarwal and Vipin Kumar

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I - Indu ( words like Ikshu/sugarcane, Ikshwaaku, Idaa, Indiraa, Indu etc.)

Indra - Indra ( Indra)

Indrakeela - Indradhwaja ( words like Indra, Indrajaala, Indrajit, Indradyumna, Indradhanusha/rainbow, Indradhwaja etc.)

Indradhwaja - Indriya (Indradhwaja, Indraprastha, Indrasena, Indraagni, Indraani, Indriya etc. )

Indriya - Isha  (Indriya/senses, Iraa, Iraavati, Ila, Ilaa, Ilvala etc.)

Isha - Ishu (Isha, Isheekaa, Ishu/arrow etc.)

Ishu - Eeshaana (Ishtakaa/brick, Ishtaapuurta, Eesha, Eeshaana etc. )

Eeshaana - Ugra ( Eeshaana, Eeshwara, U, Uktha, Ukhaa , Ugra etc. )

Ugra - Uchchhishta  (Ugra, Ugrashravaa, Ugrasena, Uchchaihshrava, Uchchhista etc. )

Uchchhishta - Utkala (Uchchhishta/left-over, Ujjayini, Utathya, Utkacha, Utkala etc.)

Utkala - Uttara (Utkala, Uttanka, Uttama, Uttara etc.)

Uttara - Utthaana (Uttara, Uttarakuru, Uttaraayana, Uttaana, Uttaanapaada, Utthaana etc.)

Utthaana - Utpaata (Utthaana/stand-up, Utpala/lotus, Utpaata etc.)

Utpaata - Udaya ( Utsava/festival, Udaka/fluid, Udaya/rise etc.)

Udaya - Udara (Udaya/rise, Udayana, Udayasingha, Udara/stomach etc.)

 

 

 

सार्वत्रिकरूपेण कथनमस्ति यत् इन्द्रः इन्द्रियस्य स्वामी अस्ति, देवाः इऩ्द्रियस्य वीर्यस्य स्थापनं इन्द्रे कुर्वन्ति(मैसं , , )। अयमेकैव गुणः इन्द्रस्य प्रतिष्ठां कर्तुं पर्याप्तः अस्ति। यथा विदितमस्ति, सर्वासां इन्द्रियाणां विवर्तनं बहिरेव भवति, न अन्तरे। यदि अन्तरे भवेत्, तदा मैक्सवैल पैराडांक्स अपि अनृतं भवेत्। इन्द्रस्य आविर्भावं मैक्सवैल विरोधाभासस्य अन्तकर्तुं शक्यते। कथितुं शक्यन्ते मैक्सवैल विरोधाभासे यः दैत्यः अस्ति, सैव वैदिकसाहित्ये इन्द्र अस्ति। भागवतपुराणे कथनमस्ति ऊष्माणं इन्द्रियाण्याहुः अन्तस्था बलमात्मनः। अर्थात् वर्णमालायां श, ष, स ये वर्णाः ऊष्माणसंज्ञकाः सन्ति, तैः इन्द्रियस्य निर्माणं भवति। य, र, ल, व ये वर्णाः अन्तस्थाः सन्ति, तेभ्यः आत्मनः बलस्य निर्माणं भवति। इन्द्रे एव तत् शक्तिरस्ति यः ऊष्माणतः अन्तस्थानां निर्माणं कर्तुं शक्यते।

 

*प्र॒जाप॑तिर्देवासु॒रान॑सृजत। स इन्द्र॒मपि॒ नासृ॑जत। तं दे॒वा अ॑ब्रुवन्। इन्द्रं॑ नो जन॒येति॑। सो॑ऽब्रवीत्। यथा॒ऽहं यु॒ष्माँँस्तप॒साऽसृ॑क्षि। ए॒वमिन्द्रं॑ जनयध्व॒मिति॑। ते तपो॑ऽतप्यन्त। - - - तं चतु॑र्होत्रा॒ प्राज॑नयन्। - तै.ब्रा. २.२.३.३

महाभारत आश्वमेधिक पर्व २५ में चतुर्होताओं के नाम करण, कर्म, कर्ता व मोक्ष आए हैं। करण/कारण, कर्म व कर्ता को तो कार्य-कारण सिद्धान्त के अनुसार समझा जा सकता है और इस कार्य-कारण शृङ्खला से मुक्ति को मोक्ष कहा जा सकता है। वैदिक साहित्य में इन्द्र से क्या तात्पर्य हो सकता है, यह एक पहेली ही रही है। तैत्तिरीय ब्राह्मण के उपरोक्त कथन की महाभारत के कथन से तुलना करने पर यह कहा जा सकता है कि इन्द्र कार्य-कारण की शृङ्खला से मोक्ष की स्थिति है।

सारा वैदिक साहित्य इन्द्र पर आधारित है। इन्द्र शब्द की निरुक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप ऐतरेय उपनिषद १.३.१४ में उपलब्ध है। प्रजापति द्वारा उत्पन्न किए गए पुरुष के प्रत्येक अंग में देवताओं की प्रतिष्ठा की गई और इसके पश्चात् पुरुष ने प्रयत्न किया कि वह अन्न का आस्वादन अंगों की सहायता से ही, जैसे चक्षु द्वारा दर्शन से, त्वचा द्वारा स्पर्श से, कर्ण द्वारा श्रवण से करने में समर्थ हो जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। जब उस पुरुष ने सीमा(ब्रह्मरन्ध्र?) का विदारण करके इदं ब्रह्म के विस्तार का दर्शन किया, तब इदं द्रः के कारण उसका नाम इन्द्र हो गया। यहां इदं तथा द्रः दोनों शब्दों को भली प्रकार समझने की आवश्यकता है। यास्क निरुक्त में इन्द्र शब्द की निरुक्ति इरां दृणाति, इरां ददाति, इरां दधाति, इरां दारयति, इरां धारयति, इन्दवे द्रवति आदि १५ प्रकार से की गई है(तुलनीय : पुराणों में १४ मन्वन्तरों में १४ इन्द्र)। इससे निष्कर्ष निकलता है कि इदं शब्द, जिसे निघण्टु में उदक नामों के अन्तर्गत रखा गया है, से तात्पर्य इरा या इडा/आनन्द तथा इन्दु दोनों से हो सकता है। ईशावास्योपनिषद में तो ईशावास्यमिदं सर्वं कह कर इदं में ईश्वर का वास कहा गया है। ऐतरेय उपनिषद में जहां पुरुष द्वारा अन्न के दर्शन की बात कही गई है, वह अन्न भी इरा का ही रूप होगा।

     डा. फतहसिंह के अनुसार पौराणिक कथाओं के अनुशीलन से यह पता चलता है कि जब भी इन्द्र ऐरावत पर आरूढ होकर असुरों से युद्ध करेगा, वह हार जाएगा। जब वह रथ पर आरूढ होकर युद्ध करता है तो असुरों को जीत लेता है। इरा या इडा एक आनन्द की अनुभूति है जिसे लगातार प्रयत्नों द्वारा पकाना पडता है(द्र. इडा पर टिप्पणी)। इस संदर्भ में कौशीतकि ब्राह्मणोपनिषद ४.२० का यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि जब तक इन्द्र आत्मोन्मुखी नहीं हुआ, तब तक वह असुरों से हारता रहा। इन्द्र का रथ पर आरूढ होना आत्मोन्मुखी होना ही है।

इन्द्र सीमा का विदारण करके इरा का विदारण अथवा इन्दु का द्रवण कैसे कर सकता है? इस संदर्भ में पं. चन्द्रमणि द्वारा यास्क निरुक्त पर की गई यह टिप्पणी उपयोगी है कि मेघ रूपी वृत्र का द्रवण विद्युत रूपी इन्द्र करता है। तैत्तिरीय आरण्यक १.२४.१ के अनुसार आपः के ४ रूप हैं मेघ, विद्युत, स्तनयित्नु और वृष्टि। ब्राह्मण ग्रन्थों में यत्र-तत्र इन्द्र को स्तनयित्नु/गर्जन करने वाला और वृष्टि करने वाला कहा गया है। षड्विंश ब्राह्मण १.२.६ में तो पर्जन्य को पुमान्, वृष्टि या अशनि को स्त्री और विद्युत को नपुंसक रूप कहा गया है।

वैदिक और पौराणिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से इन्द्र को वृष्टि कराने वाला कहा गया है। इन्द्र वृष्टि किस प्रकार करा सकता है? ब्राह्मण ग्रन्थों में सार्वत्रिक उल्लेख आता है कि जो यह तपाता है, यह इन्द्र(अर्थात् आदित्य) है। इन्द्र शब्द की १५ निरुक्तियों में से एक निरुक्ति इन्धे भूतानि भी है। इस तापन से घर्म नामक तेज उत्पन्न होता है जो बाद में आदित्य बन सकता है(मैत्रायणी संहिता २.२.९, शतपथ ब्राह्मण १४.२.२.६)। यही घर्म वर्षा के लिए उत्तरदायी है। सामान्य जीवन में जो कभी-कभी सिर में गर्मी का आभास होता है, वह घर्म ही है। काण्व शतपथ ३.१.१.१ के अनुसार जब तक अग्नि मन्द-मन्द जलती है, तब तक वह वरुण या रुद्र का रूप होती है। जब वह पूरे वेग से वर्षा कराने वाले रूप में जलती है, तो वह इन्द्र का रूप होती है। इस पर्जन्य वृष्टि से, आनन्द की वृष्टि से क्या होता है, इसके लिए महाभारत में अर्जुन के चरित्र से समझने की आवश्यकता है(शतपथ ब्राह्मण ५.४.३.७)।

वैदिक और पौराणिक साहित्य में सार्वत्रिक रूप से इन्द्र द्वारा वृत्र के वध का उल्लेख आता है। शतपथ ब्राह्मण १.६.४.१३ आदि में उल्लेख आता है कि जो यह चन्द्रमा है, जो सोम का रूप है, जिससे हमारा मन और सोमात्मक शरीर बना है, यही वृत्र है, तम से आच्छादित करने वाला है। जैसे भौतिक जगत में अमावास्या के दिन सूर्य चन्द्रमा को पूरी तरह ग्रस लेता है, वैसे ही इन्द्र को भी सूर्य बन कर चन्द्रमा रूपी वृत्र का वध करना है। शतपथ ब्राह्मण १.६.४.१२ का कथन है कि अमावास्या, अर्थात् मापनीय अथवा माया की स्थिति से अमाया की स्थिति को प्राप्त करना ही वृत्र वध है(मातलि : माया को तरने वाला?)। इन्द्र के सूर्य बनने के संदर्भ में तैत्तिरीय संहिता २.५.४.४ का कथन है कि संवत्सर इन्द्र का रूप है। मैत्रायणी संहिता ४.७.३ के अनुसार शक्वर साम की स्थिति इन्द्र और रैवत साम की स्थिति सूर्य की होती है। जैमिनीय ब्राह्मण १.३३१ तथा शतपथ ब्राह्मण ४.५.३.२ आदि में इन्द्र के वज्र को पंचदश और इन्द्र को षोडशी कहा गया है। यह विचारणीय है कि क्या ओंकार की १६ कलाओं पर आरूढ होकर इन्द्र वृत्र या सोम या चन्द्रमा की १६ कलाओं का पान करता है? ऋग्वेद की इन्द्र सम्बन्धी बहुत सी ऋचाओं में भी ऊं अथवा ओ सु जोडा गया है। तैत्तिरीय संहिता २.४.१४.१ आदि में उल्लेख है कि इन्द्र ने वृत्र का वध उदीची दिशा में किया(प्राची में वह राजा बना, दक्षिण में वृषभ)। इसका तात्पर्य यह है कि वृत्र वध के लिए इन्द्र को साधना की क्रमिक स्थितियों को पार करना होता है।

पुराणों में इन्द्र द्वारा ऋषि-मुनियों के तप से भयभीत होकर तप में विघ्न के लिए अप्सराओं को भेजने का उल्लेख आता है। इसकी सम्यक् व्याख्या अनुसंधेय है। वैदिक निघण्टु में इन्द्र शब्द की परिगणना पद नामों के अन्तर्गत की गई है। यह स्वाभाविक है कि तप से इन्द्र की उच्चतर अवस्थाओं को प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में यह संभव है कि ब्राह्मण ग्रन्थों में जो ऋक् और साम को इन्द्र के रथ के दो हरि/अश्व कहा गया है(मैत्रायणी संहिता ३.१०.६ इत्यादि), उनमें साम रूप बहिर्मुखी आनन्द का, अप्सराओं का हो जो तप करने पर प्रकट होता हो और साधना में बाधक बनता हो।

पुराणों और महाभारत में पांच इन्द्रों के पांच पाण्डव बनने के उल्लेख की व्याख्या के लिए शतपथ ब्राह्मण ३.३.३.१० इत्यादि का यह कथन महत्त्वपूर्ण है कि यज्ञ में यजमान ही इन्द्र है। जितने भी यज्ञ वर्णित हैं, उनमें यजमान इन्द्र का ही रूप होता है। पहले यजमान गार्हपत्य अग्नि की पुष्टि करता है। तब वह यम का रूप होता है। यज्ञ के अन्त में जब वह देवों की आहवनीय अग्नि को प्राप्त करता है, तब वह इन्द्र का रूप होता है(शतपथ ब्राह्मण २.३.२.२)। भागवत पुराण में १४ मन्वन्तरों के इन्द्रों की गणना करते समय भी पहले इन्द्र के रूप में याम नाम लिया गया है। महाभारत में कुन्ती द्वारा आत्मोन्मुखी साधना करते समय भी सबसे पहले यम अथवा धर्म का आह्वान किया जाता है जिससे युधिष्ठिर का जन्म होता है। यह विचारणीय है कि सरस्वती रहस्योपनिषद ३.१० में वर्णित अस्ति, भाति, प्रिय, नाम और रूप नामक व्युत्थान की पांच क्रमिक अवस्थाओं से पांच पाण्डवों का कितना साम्य है। इनमें अन्तिम दो अवस्थाओं नाम और रूप के आधार अश्विनौ-द्वय के अवतार नकुल और सहदेव हो सकते हैं जो क्रमशः अश्वों और गायों के विशेषज्ञ हैं। भाति को विज्ञानमय कोश की स्थिति कहा जा सकता है जहां सारे प्राण, सारे बल सह रूप में, एक दूसरे से सहयोग करते हुए स्थित हैं। ऐसी स्थिति का प्रतीक भीम हो सकता है। भीम बल का प्रतिनिधि है। इन्द्र और मरुतों को, जिन्हें ओज और बल का प्रतीक कहा गया है, के संदर्भ में भी भीम के चरित्र पर विचार करने की आवश्यकता है। यह संभव है कि इन्द्र की स्थिति का इस प्रकार ५ स्तरों पर विभाजन करने से तात्पर्य ऋग्वेद की ऋचाओं में इन्द्र के साथ आए गौ, अश्व, बल आदि शब्दों की व्याख्या करना हो।

अहल्या और इन्द्र की कथा के संदर्भ की व्याख्या के लिए षड्विंश ब्राह्मण १.१.१७ आदि का वर्णन उपयोगी है। अहल्या और इन्द्र के मिथुन की घटना देवत्व और असुरत्व की सीमा पर होती है। मिथुन के पश्चात् इन्द्र का बिडाल होकर भागना, गौतम के शाप से पहले सहस्रयोनि और उसके पश्चात् सहस्राक्ष बनना, पितरों द्वारा इन्द्र को मेष के वृषणों से युक्त करने आदि की व्याख्या षड्विंश ब्राह्मण के इस कथन पर संभव प्रतीत होती है कि इन्द्र से सम्बन्धित वृष्टि, अशनि, पर्जन्य, विद्युत आदि में वृष्टि और अशनि स्त्री लिंग हैं, पर्जन्य पुं रूप है और विद्युत नपुंसक रूप है। दूसरी ओर इन्द्र के अश्वों में ऋक् रूप अश्व स्त्री रूप है और साम अश्व नपुंसक रूप है(तीसरा यजु जो विष्णु से संबन्धित है, पुं रूप है)। सहस्रयोनि, अर्थात् सोम को, आनन्द को धारण करने की सामर्थ्य। यह स्त्री रूप है। इसके पश्चात् सहस्राक्ष को नपुंसक रूप कर सकते हैं। सहस्राक्ष को समझने के लिए जैमिनीय उपनिषद ब्राह्मण १.१४.२.१० में अक्षर इन्द्र की उपासना का उल्लेख उपयोगी है। अहल्या-इन्द्र कथा के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण ४.६.७.[११] के इस कथन पर भी विचार की आवश्यकता है कि साम रूपी वृषा/पति तथा ऋचा रूपी योषा/पत्नी के मिथुन से इन्द्र की उत्पत्ति होती है, जैसे तेज से तेज उत्पन्न होता है।

पुराणों में इन्द्र द्वारा बल असुर के शरीर से रत्नों का निर्माण करना वैदिक साहित्य में इन्द्र द्वारा बल असुर के पराभव के उल्लेखों की एकमात्र व्याख्या है।

मन्वन्तर

वि.ध. १.१७६

इन्द्र

 

इन्द्रशत्रु

गरुड

 १.८७

इन्द्र

इन्द्रशत्रु

नारद १.४०

इन्द्र

१ स्वायम्भुव

विश्वभुक्

बाष्कल

विश्वभुक्

बाष्कलि

शचीपति

२ स्वारोचिष

विपश्चित्

पुरुकुत्स

विपश्चित्

पुरुकृत्सर

विपश्चित्

३ औत्तम

सुचित्ति

प्रलम्ब

स्वशान्ति

प्रलम्ब

सुशान्ति

४ तामस

शिबि

भीमरथ

शिबि

भीमरथ

शिव

५ रैवत

विभु

शम्भु

विभु

शान्त

विभा

६ चाक्षुष

मनोजव

महामाल

मनोजव

महाकाल

मनोजव

७ वैवस्वत

मोजंबी

हिरण्याक्ष

तेजस्वी

हिरण्याक्ष

पुरंदर

८ सावर्णि

बलि

नानोल

बलि

 

बलि

विभु

कालकक्ष

अद्भुत हर

कालकाक्ष

अद्भुत

१० दशम

शान्ति

बालि

शान्ति

बलि

शान्ति

११ एकादश

वृष

दशग्रीव

वृष

दशग्रीव

वृष

१२ द्वादश

ऋतधामा

नरक

ऋतधामा

तारक

ऋभु

१३ रौच्य

बृहस्पति

टिट्टिभ

दिवस्पति

त्विष्टिभ

दिवस्पति

१४ भौत्य

शुचि

महासुख

शुचि

महा

शुचि

 

(प्रथम प्रकाशन : १९९४ ई., संशोधन : ६-८-२०१२ई.(अधिक भाद्रपद कृष्ण ५, विक्रम संवत् २०६९)

संदर्भ

*थ योऽयमेतर्ह्यग्निः स भीषा निलिल्ये सोऽपः प्रविवेश तं देवा अनुविद्य सहसैवाद्भ्य आनिन्युः सोऽपोऽभितिष्ठेवावष्ठ्यूता स्थ या अप्रपदनं स्थ याभ्यो वो मामकामं नयन्तीति तत आप्त्याः सम्बभूवुस्त्रितो द्वित एकतः [१] त इन्द्रेण सह चेरुः ।यथेदं ब्राह्मणो राजानमनुचरति स यत्र त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रं विश्वरूपं जघान । तस्य हैतेऽपि वध्यस्य विदाञ्चक्रुः शश्वद्धैनं त्रित एव जघानात्यह तदिन्द्रोऽमुच्यत देवो हि सः  माश ,,,

*इन्द्रो वै यज्ञस्य देवतेन्द्रो वृषैतेनो हास्यैताः सेन्द्राः सामिधेन्यो भवन्ति । माश ,,,३३; १,४,५, ;,,,३८ ।

*स्विष्टकृद्देवेभ्य इन्द्र आज्येन हविषाभूत्स्वाहेतीन्द्रो वै यज्ञस्य देवता तस्मादाहेन्द्र आज्येनेति वाचे वा एतमाघारमाघारयतीन्द्रो वागित्यु वा आहुः। माश ,,,

*तस्य सोमपानमेवैकं मुखमास । सुरापाणमेकमन्यस्मा अशनायैकं तमिन्द्रो दिद्वेष (त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रं विश्वरूपं) तस्य तानि शीर्षाणि प्रचिच्छेद । स यत्सोमपानमास । ततः कपिञ्जलः समभवत्तस्मात्स बभ्रुक इव बभ्रुरिव हि सोमो राजा [३]  अथ यत्सुरापाणमास । ततः कलविङ्कः समभवत्तस्मात्सोऽभिमाद्यत्क इव वदत्यभिमाद्यन्निव हि सुरां पीत्वा वदति [४] अथ यदन्यस्मा अशनायास । ततस्तित्तिरिः समभवत्तस्मात्स विश्वरूपतम इव  ।...स त्वष्टा चुक्रोध । कुविन्मे पुत्रमवधीदिति सोऽपेन्द्रमेव सोममाजह्रे स यथायं सोमः प्रसुत एवमपेन्द्र एवास इन्द्रो ह वा ईक्षां चक्रे । इदं वै मा सोमादन्तर्यन्तीति स यथा बलीयानबलीयस एवमनुपहूत एव यो द्रोणकलशे शुक्र आस तं भक्षयांचकार स हैनं जिहिंस सोऽस्य विष्वङ्ङेव प्राणेभ्यो दुद्राव । माश ,,,

*स हाग्निरुवाच । मय्येव वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्वोऽहं मय्या भजामीति तस्मादग्नौ सर्वेभ्यो देवेभ्यो जुह्वति तस्मादाहुरग्निः सर्वा देवता इति [२०] अथ ह सोम उवाच । मामेव वः सर्वेभ्यो जुह्वतु तद्वोऽहं मय्याभजामीति तस्मात्सोमं सर्वेभ्यो देवेभ्यो जुह्वति तस्मादाहुः सोमः सर्वा देवता इति [२१] । अथ यदिन्द्रे सर्वे देवास्तस्थानाः । तस्मादाहुरिन्द्रः सर्व देवता इन्द्रश्रेष्ठा देवा इति । माश ,,, २२ ।।

*दर्शोपचारः-- इन्द्रो ह यत्र वृत्राय वज्रं प्रजहार । सोऽबलीयान्मन्यमानो नास्तृषीतीव बिभ्यन्निलयां चक्रे स पराः परावतो जगाम देवा ह वै विदांचक्रुर्हतो वै वृत्रोऽथेन्द्रो न्यलेष्टेति तमन्वेष्टुं दध्रिरे । अग्निर्देवतानां हिरण्यस्तूप ऋषीणां बृहती च्छन्दसां तमग्निरनुविवेद तेनैतां रात्रिं सहाजगाम स वै देवानां वसुर्वीरो ह्येषाम्। माश ,,,।।

*वार्त्रघ्नं वै पौर्णमासम् । इन्द्रो ह्येतेन वृत्रमहन्नथैतदेव वृत्रहत्यं यदामावास्यं वृत्रं ह्यस्मा एतज्जघ्नुष आप्यायनमकुर्वन् तद्वा एतदेव वार्त्रघ्नम् । यत्पौर्णमासमथैष एव वृत्रो यच्चन्द्रमाः स यत्रैष एतां रात्रिं न पुरस्तान्न पश्चाद्ददृशे तदेनमेतेन सर्वं हन्ति नास्य किं चन परिशिनष्टि सर्वं ह वै पाप्मानं हन्ति न पाप्मनः किं चन परिशिनष्टि य एवमेतद्वेद - १.६.४.[१३]

*दर्शोपचारः--तद्वा एष एवेन्द्रः । य एष तपत्यथैष एव वृत्रो यच्चन्द्रमाः सोऽस्यैष भ्रातृव्यजन्मेव तस्माद्यद्यपि पुरा विदूरमिवोदितोऽथैनमेतां रात्रिमुपैव न्याप्लवते सोऽस्य व्यात्तमापद्यते [१८] तं ग्रसित्वोदेति । स न पुरस्तान्न पश्चाद्ददृशे। माश , ,,१८

*इन्द्रो वा एष पुरा वृत्रस्य वधादथ वृत्रं हत्वा यथा महाराजो विजिग्यान एवं महेन्द्रो ऽभवत् । माश ,,,२१: ४,,,१७।।

*यद्वसुवने वसुधेयस्येति यजति । अग्निर्वै वसुवनिरिन्द्रो वसुधेयोऽस्ति वै छन्दसां देवतेन्द्राग्नी एव। माश ,,,१६ ।।

*फल्गुनीष्वग्नी आदधीत । एता वा इन्द्रनक्षत्रं यत्फल्गुन्योऽप्यस्य प्रतिनाम्न्यो अर्जुनो ह वै नामेन्द्रः यदस्य गुह्यं नाम अर्जुन्यो वै नामैतास्ता एतत्परोऽक्षमाचक्षते फल्गुन्य इति । माश ,,,११; ,,,७ ।।

*को ह्येतस्यार्हति गुह्यं नाम ग्रहीतुमिन्द्रो वै यजमानस्तत्स्व एवैतन्नक्षत्रेऽग्नी आधत्त इन्द्रो यज्ञस्य देवतैतेनोहास्यैतत्सेन्द्रमग्न्यधेयं भवति । माश ,,,११; ,,,; ,,,;  ४,३।

*स यः पुरादित्यस्यास्तमयात् । आहवनीयमुद्धरत्येते वै विश्वे देवा रश्मयोऽथ यत्परं भाः प्रजापतिर्वा स इन्द्रो वै तदु ह वै विश्वे देवा अग्निहोत्रं जुह्वतो गृहानागच्छन्ति। माश , , ,

*तद्वा एष एवेन्द्रः । यदाहवनीयोऽथैष एव गार्हपत्यो यमो राजाथैष एव नडो नैषिधो यदन्वाहार्यपचनः ..... अथ यत्रैतत्प्रदीप्तो भवति । उच्चैर्धूमः परमया जूत्या बल्बलीति तर्हि हैष (अग्निः) भवतीन्द्रः माश २.३.२.२

*अथैन्द्राग्नी । उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या उभा राधसः सह मादयध्यै उभा दाताराविषां रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वामित्येष वा इन्द्रो य एष तपति स यदस्तमेति तदाहवनीयं प्रविशति तदुभावेवैतत्सह सन्ता उपतिष्ठत उभौ मे सह सन्तौ दत्तामिति तस्मादैन्द्राग्नी। माश ,,,१२,,,,१५ ।

*साकमेधपर्व-- अथर्षभमाह्वयितवै ब्रूयात् । स यदि रुयात्स वषट्कार इत्यु हैक आहुस्तस्मिन्वषट्कारे जुहुयादित्यथो इन्द्रमेवैतत्स्वेन रूपेण ह्वयति वृत्रस्य वधायैतद्वा इन्द्रस्य रूपं यदृषभस्तत्स्वेनैवैनमेतद्रूपेण ह्वयति वृत्रस्य वधाय स यदि रुयादा म इन्द्रो यज्ञमगन्त्सेन्द्रो मे यज्ञ इति ह विद्याद्यद्यु न रुयाद्ब्राह्मण एव दक्षिणत आसीनो ब्रूयाज्जुहुधीति सैवैन्द्री वाक्। माश २, ५, ,१८

*साकमेधपर्व-- मरुतो ह वै क्रीडिनो वृत्रं हनिष्यन्तमिन्द्रमागतं तमभितः परिचिक्रीडुर्महयन्त: । माश ,,,२०

*अथ यत्साकमेधैर्यजते । इन्द्रेणैवैतद्राज्ञेन्द्रेणानीकेनापरांश्चतुरो मासः प्रजयति.. माश ,,,

*स यद्वैश्वदेवेन यजते । अग्निरेव तर्हि भवत्यग्नेरेव सायुज्यं सलोकतां जयत्यथ यत्साकमेधैर्यजतऽइन्द्र एवं तर्हि भवतीन्द्रस्यैव सायुज्यं सलोकतां जयति । माश ,,,

*अथ राजानमादत्ते । मित्रो न एहि सुमित्रध इति शिवो नः शान्त एहीत्येवैतदाह तं यजमानस्य दक्षिण ऊरौ प्रत्युह्य वासो निदधातीन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणमित्येष वा अत्रेन्द्रो भवति यद्यजमान ३.३.३.१०

*अथ यास्तद्देवाः । जुष्टास्तनूः प्रियाणि धामानि सार्धं समवददिरे तदिन्द्रे संन्यदधतैष वा इन्द्रो य एष तपति न ह वा एषोऽग्रे तताप यथा हैवैदमन्यत्कृष्णमेवं हैवास तेनैवैतद्वीर्येण तपति तस्माद्यदि बहवो दीक्षेरन्गृहपतय एव व्रतमभ्युत्सिच्य प्रयच्छेयुः स हि तेषामिन्द्रभाजनम्भवति यद्यु दक्षिणावता दीक्षेत यजमानायैव व्रतमभ्युत्सिच्य प्रयच्छेयुरिदं ह्याहुरिन्द्रो यजमान इति - ३.४.२.[१५]

*आपो ह वै वृत्रं जघ्नुस्तेनैवैतद्वीर्येणापः स्यन्दन्ते तस्मादेनाः स्यन्दमाना न किं चन प्रतिघारयति ता ह स्वमेव वशं चेरुः कस्मै नु वयं तिष्ठेमहि याभिरस्माभिर्वृत्रो हत इति सर्वं वा इदमिन्द्राय तस्थानमास यदिदं किं चापि योऽयं पवते स इन्द्रोऽब्रवीत् । सर्वं वै म इदं तस्थानं यदिदं किं च तिष्ठध्वमेव म इति ता होचुः किं नस्ततः स्यादिति प्रथमभक्ष एव वः सोमस्य राज्ञ इति तथेति ता अस्मा अतिष्ठन्त तास्तस्थाना उरसि न्यगृह्णीत तद्यदेना उरसि न्यगृह्णीत तस्मान्निग्राभ्या नाम । माश ,, ,१४

*अन्तर्यामग्रहः-- अन्तर्यच्छ मघवन्पाहि सोममितीन्द्रो वै मघवानिन्द्रो यज्ञस्य नेता। माश ,,,१५; १६ ।।

*ऽन्तर्यामे मघवन्मादयस्वेतीन्द्रो वै मघवानिन्द्रो यज्ञस्य नेता। माश ,,,१६ ।।

*ऐन्द्रवायवग्रहः-- अथापगृह्य पुनरानयति । इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम्। इन्दवो वामुशन्ति हि । उपयामगृहीतोऽसि वायव इन्द्रवायुभ्यां त्वैष ते योनिः सजोषोभ्यां त्वेति सादयति स यदाह सजोषोभ्यां त्वेति यो वै वायुः स इन्द्रो य इन्द्रः स वायुः । माश ,,,१९ ।।

*तद्यन्मरुत्वतीयान्गृह्णाति । एतद्वा इन्द्रस्य निष्केवल्यं सवनं यन्माध्यन्दिनं सवनं तेन वृत्रमजिघांसत्तेन व्यजिगीषत मरुतो वा इत्यश्वत्थेऽपक्रम्य तस्थुः क्षत्रं वा इन्द्रो विशो मरुतो विशा वै क्षत्रियो बलवान्भवति तस्मादाश्वत्थे ऋतुपात्रे स्यातां कार्ष्मर्यमये त्वेव भवतः[६] तानिन्द्र ऽउपमन्त्रयां चक्रे । उप मावर्तध्वं युष्माभिर्बलेन वृत्रं हनानीति ते होचुः किं नस्ततः स्यादिति तेभ्य एतौ मरुत्वतीयौ ग्रहावगृह्णात् [७] ते होचुः । अपनिधायैनमोज उपावर्तामहा इति त एनमपनिधायैवौज उपाववृतुस्तद्वा इन्द्रोऽस्पृणुतापनिधाय वै मौज उपावृतन्निति [८] स होवाच । सहैव मौजसोपावर्तध्वमिति तेभ्यो वै नस्तृतीयं ग्रहं गृहाणेति तेभ्य एतं तृतीयं ग्रहमगृह्णादुपयामगृहीतोऽसि मरुतां त्वौजस इति त एनं सहैवौजसोपावर्तन्त तैर्व्यजयत तैर्वृत्रमहन्क्षत्रं वा इन्द्रो विशो मरुतो विशा वै क्षत्रियो बलवान्भवति। माश ,,,

*इन्द्रो ह वै षोडशी । तं नु सकृदिन्द्रं भूतान्यत्यरिच्यन्त प्रजा वै भूतानि ता हैनेन सदृग्भवमिवासुः इन्द्रो ह वा ईक्षां चक्रे । कथं न्वहमिदं सर्वमतितिष्ठेयमर्वागेव मदिदं सर्वं स्यादिति स एतं ग्रहमपश्यत् माश. ४.५.३.२

*शुक्रपात्रमेवानु मनुष्याः प्रजायन्ते । तद्वै तत्पुनर्यज्ञे प्रयुज्यते तस्मादिमाः प्रजाः पुनरभ्यावर्तं प्रजायन्त एष वै शुक्रो य एष तपत्येष उ एवेन्द्रः पुरुषो वै पशूनामैन्द्रस्तस्मात्पशूनामीष्टे । माश ,,,;,४ ।

*ते हेन्द्रमूचुः । त्वं वै नो वीर्यवत्तमोऽसि त्वं दक्षिणत आस्वाथाभयेऽनाष्ट्र ऽउत्तरतो यज्ञमुपचरिष्याम इति[४] स होवाच । किं मे ततः स्यादिति ब्राह्मणाच्छंस्या ते ब्रह्मसाम त इति तस्माद्ब्राह्मणाच्छंसिनं प्रवृणीत इन्द्रो ब्रह्मा ब्राह्मणादितीन्द्रस्य ह्येषा स इन्द्रो दक्षिणत आस्ता। माश ,, , ।।

*सहस्रं वाचः प्रजातं द्वे इन्द्रस्तृतीये तृतीयं विष्णुर्ऋचश्च सामानि चेन्द्रो यजूंषि विष्णुस्तस्मात्सदस्यृक्सामाभ्यां कुर्वन्त्यैन्द्रं हि सदः। माश ,,, ।।

*तद्वा एतद्वृषा साम । योषामृचं सदस्यध्येति तस्मान्मिथुनादिन्द्रो जातस्तेजसो वै
तत्तेजो जातं यदृचश्च साम्नश्चेन्द्रऽ इन्द्र इति ह्येतमाचक्षते य एष तपति - ४.६.७.[११]

*अथेन्द्राय ज्येष्ठाय हायनानां चरुं निर्वपति ।...अतिष्ठा वा एता ओषधयोयद्धायना अतिष्ठो वा इन्द्रस्तस्माद्धायनानां भवति। माश ,, ,।।

*अग्रेण मैत्रावरुणस्य धिष्ण्यम् । शार्दूलचर्मोपस्तृणाति सोमस्य त्विषिरसीति यत्र वै सोम इन्द्रमत्यपवत स यत्ततः शार्दूलः समभवत्तेन सोमस्य त्विषिः। माश ,,, ;,,११ ।

*अभिषेकः-- अथ धनुरधितनोति । इन्द्रस्य वार्त्रघ्नमसीति वार्त्रघ्नं वै धनुरिन्द्रो वै यजमानो द्वयेन वाऽएष इन्द्रो भवति यच्च क्षत्रियो यदु च यजमानः । माश ,, ,२७

*यदाहाव्यथायै त्वेति स्वधायै त्वेति रसाय त्वेत्येवैतदाहारिष्टो अर्जुन इत्यर्जुनो ह वै नामेन्द्रो यदस्य गुह्यं नाम द्वयेन वा एष इन्द्रो भवति यच्च क्षत्रियो यदु च यजमानस्तस्मादाहारिष्टो अर्जुन इति - ५.४.३.[७]

*स यो यं मध्ये प्राणः । एष एवेन्द्रस्तानेष प्राणान्मध्यत इन्द्रियेणैन्द्ध यदैन्द्ध तस्मादिन्ध इन्धो ह वै तमिन्द्र इत्याचक्षते परोऽक्षं परोऽक्षकामा हि देवास्त इद्धाः सप्त नाना पुरुषानसृजन् - माश ,,,

*अथाजम् । योगे योगे तवस्तरं वाजे वाजे हवामह इत्यन्नं वै वाजः कर्मणि कर्मणि तवस्तरमन्नेऽन्ने हवामह इत्येतत्सखाय इन्द्रमूतय इतीन्द्रियवन्तमूतय इत्येतत्तदजे वीर्यं दधाति। माश , ,, ।।

*स्तोमभागेष्टकोपधानम्-- प्रजापतेरेतदन्नमिन्द्रोऽभ्यध्यायत् सोऽस्मादुदचिक्रमिषत्मब्रवीत्कथोत्क्रामसि कथा मा जहासीति स वै मेऽस्यान्नस्य रसं प्रयच्छेति तेन वै मा सह प्रपद्यस्वेति तथेति....अथ यः स इन्द्रोऽसौ स आदित्यः । माश ,, ,

*लोकं पृण च्छिद्रं पृणेति ।....वाग्वा अनुष्टुब्वागिन्द्र इन्द्रो लोकम्पृणा । माश ,,, ।।

*स यः स इन्द्रः । एष सोऽप्रतिरथोऽथ यः स बृहस्पतिरेष स ब्रह्मा तद्यद्ब्रह्माप्रतिरथं जपतीन्द्रेण चैवैतद्बृहस्पतिना च दक्षिणतोऽसुरान्रक्षांसि नाष्ट्रा अपहत्याभयेऽनाष्ट्र एतं यज्ञं तनुते तस्माद्ब्रह्माऽप्रतिरथं जपति। माश , , ,।।

*एकादशाक्षरा वै त्रिष्टुप्त्रैष्टुभ इन्द्र इन्द्रो यज्ञस्यात्मेन्द्रो देवता । माश ,,, ३३

*तौ यौ ताविन्द्राग्नी एतौ तौ रुक्मश्च पुरुषश्च रुक्म एवेन्द्रः पुरुषोऽग्निस्तौ हिरण्मयौ भवतो । माश १०, ,,

*अथेन्द्राग्नी वा असृज्येताम् ब्रह्म च क्षत्रं चाग्निरेव ब्रह्मेन्द्रः क्षत्रं ..... यद्धि किं चाग्निना पचन्त्यग्निरेव तदथ  यत्पुरीषं  स इन्द्रः । माश १०,, ,

*मित्रविन्दा इष्टिः-- ते प्रजापतिमब्रुवन् हनामेमामेदमस्या ददामहा इति स होवाच स्त्री वा एषा यच्छ्रीर्न वै स्त्रियं घ्नन्त्युत त्वा अस्या जीवन्त्या एवाददत इति तस्या अग्निरन्नाद्यमादत्त सोमो राज्यं वरुणः साम्राज्यं मित्रः क्षत्रमिन्द्रो बलम् । माश ११,,,

*सा प्रजापतिमब्रवीत् आ वै म इदमदिषतेति स होवाच यज्ञेनैनान्पुनर्याचस्वेति....इन्द्रो बलं बलपतिः बलमस्मिन्यज्ञे मयि दधातु स्वाहा । माश ११,,, १२; तै २,,,४ ।।

*कतम इन्द्रः कतमः प्रजापतिरिति स्तनयित्नुरेवेन्द्रो यज्ञः प्रजापतिरिति कतम स्तनयित्नुरित्यशनिरिति कतमो यज्ञ इति पशव इति- माश ११,,,।।

*अथ यत् स्वरसाम्न उपयन्ति। अप एव देवता यजन्ते।....अथ यद्विषुवन्तमुपयन्ति। आदित्यमेव देवतां यजन्ते।...अथ यद्विश्वजितमुपयन्ति । इन्द्रमेव देवतां यजन्ते ।....अथ यत् गोआयुषी उपयन्ति। मित्रावरुणावेव देवते यजन्ते। माश १२, , ,१५

*विश्वरूपं वै त्वाष्ट्रमिन्द्रोऽहन्। तं त्वष्टा हतपुत्रोऽभ्यचरत्। सोऽभिचरणीयमपेन्द्रं सोममाहरत्। तस्येन्द्रो यज्ञवेशसं कृत्वा प्रासहा सोममपिबत्। स विष्वङ्व्यार्च्छत्। तस्येन्द्रियं वीर्यमङ्गादङ्गादस्रवत्॥ ..... अथ ह वै तर्हि नमुचिनैवासुरेण सह चचार। स ऐक्षत नमुचिः, अपुनर्वा अयमभूत्। हंत अस्येन्द्रियं वीर्यं सोमपीथमन्नाद्यं हराणीति। तस्यैतयैव सुरयेन्द्रियं वीर्यं सोमपीथमन्नाद्यमहरत्। स ह न्यर्णः शिश्ये। तं देवा उपसंजग्मिरे। श्रेष्ठो वै नोऽयमभूत्। तमिमं पाप्माऽविदत्। हन्त इमं  भिषज्यामेति १२.७.१.१०

*इन्द्रस्येन्द्रियम् अन्नस्य रसम्, सोमस्य भक्षं सुरयाऽऽसुरो नमुचिरहरत्.... तावश्विनौ च सरस्वती च अपां फेनं वज्रमसिञ्चन्। न शुष्को नार्द्र इति। तेनेंद्रो नमुचेरासुरस्य व्युष्टायां रात्रौ, अनुदित आदित्ये, न दिवा न नक्तमिति शिर उदवासयत् ....'अपां फेनेन नमुचेः शिर इन्द्रोदवर्तयः । विश्वा यदजय स्पृधः' (ऋ ८, १४,१३) इति पाप्मा वै नमुचिः । माश १२,,,।।

*सौत्रामणीयज्ञात्पुरुषोत्पत्तिः -- मन एवेन्द्रः। वाक् सरस्वती। श्रोत्रे अश्विनौ। यद् वै मनसा ध्यायति। तद्वाचा वदति। यद्वाचा वदति। तत् कर्णाभ्यां शृणोति। ....
प्राण एवेन्द्रः। जिह्वा सरस्वती। नासिके अश्विनौ। यद्वै प्राणेनान्नमात्मन् प्रणयते। तत् प्राणस्य प्राणत्वम्। जिह्वया वा अन्नस्य रसं विजानाति। नासिके उ वै प्राणस्य पंथाः।
... हृदयमेवेन्द्रः। यकृत् सविता। क्लोमा वरुणः। तद्यदैन्द्रे पुरोडाशे सति, अथैता देवताः सह यजति। एतान्येवैतत्सार्द्धं कृत्वाऽऽत्मन् धत्ते॥१२.९.१.१५ (तु. गो २,,११)।

*सौत्रामणीयज्ञात्पुरुषोत्पत्तिः-- हृदयमेवेन्द्रः। यकृत् सविता। क्लोमा वरुणः। तद्यदैन्द्रे पुरोडाशे सति, अथैता देवताः सह यजति। एतान्येवैतत्सार्द्धं कृत्वाऽऽत्मन् धत्ते॥१२.९.१.१५

*तं देवा अभ्यसृज्यन्त। यथा वित्तिं वेत्स्यमाना एवं तमिन्द्रः प्रथमः प्राप तमन्वङ्गमनु न्यपद्यत तं पर्यगृह्णात्तं परिगृह्येदं यशोऽभवद्यदिदमिन्द्रो यशो यशो ह भवति य एवं वेद[१२] स उ एव मखः स विष्णुः। तत इन्द्रो मखवानभवन्मखवान्ह वै तम्मघवानित्याचक्षते । माश १४,,,१३ । ।

*इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते स्वाहेति ।अयं वाऽइन्द्रो योऽयं पवते... तदिन्द्रमेवानु वसूंश्च रुद्रांश्चाभजत्यथो प्रातःसवनस्य चैवैतन्माध्यन्दिनस्य च सवनस्य रूपं क्रियते इन्द्राय त्वादित्यवते स्वाहेति अयं वा इन्द्रो योऽयं पवते .... तृतीयसवनस्यैवैतद्रूपं क्रियते । माश १४,,,

*अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं। ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुनं समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो। माश १४,,,१९ ।।

*इन्धो वै नामैष योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तं वा एतमिन्धं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोऽक्षेण...अथैतद्वामेऽक्षिणि पुरुषरूपम् । एषास्य  पत्नी विराट् । माश १४,,११,।।

*तं ते गर्भं दधामहे दशमे मासि सूतवे यथाग्निगर्भा पृथिवी यथा द्यौरिन्द्रेण गर्भिणी वायुर्दिशां यथा गर्भ एवं गर्भं दधामि ते। माश १४,,,२१ ।।

*दर्शपूर्णमासौ-- देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां आददे , इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणः सहस्रभृष्टिः शततेजा। मै ,,१०; काठ १,; क १,; तै १,,११,१-२; माश  १.३.४.३

*सोमक्रयः -- इन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणम् उशन्नुशन्तं स्योनः स्योनं। मै ,,; काठ २,; २४,; क ११,; तै १,,,१-२

*ग्रहाः -- इन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वते उक्थायुवम् (गृह्णामि) ।यत्त इन्द्र बृहद्वयस्तस्मै त्वा विष्णवे त्वा ॥ मै १,३,१४ ।।

*इन्द्र मरुत्व इह पाहि सोमं यथा शार्याते अपिबः सुतस्य । तव प्रणीती तव शूर शर्मन्नाविवासन्ति कवयः सुयज्ञाः ॥ ...इन्द्राय त्वा मरुत्वते (+स्वाहा ।मै ४,,८) । मै ,, १९; ,,८ ।

*ओजस्तदस्य तित्विष उभे यत्समवर्तयत् । इन्द्रश्चर्मेव रोदसी ॥ ....इन्द्राय त्वौजस्वते एष ते योनिः । मै , , ३२ ।।

*ग्रहाः-- इन्द्रमिद्धरी वहतोऽप्रतिधृष्टशवसम् । ऋषीणां च स्तुतीरुप यज्ञं च मानुषाणां ॥ उपयामगृहीतोऽसि , इन्द्राय त्वा हरिवते , एष ते योनिः , इन्द्राय त्वा हरिवते ॥  मै , , ३४।।

*अस्मास्विन्द्र इन्द्रियं दधात्व् अस्मान् रायो मघवानः सचन्ताम् । अस्माकं सन्त्वाशिषः ॥ आमाशिषो दोहकामा इन्द्रवन्तो हवामहे । धुक्षीमहि प्रजामिषं ॥ । मै ,,।।

*प्राची दिगग्निर्देवता ,.... दक्षिणा दिगिन्द्रो देवता.... प्रतीची दिङ् मरुतो देवता ,.... उदीची दिङ् मित्रावरुणौ देवता ,.... ऊर्ध्वा दिक् सोमो देवता  । मै ,,; काठ ७, ; तै ३,११,,१ ।।

*आधानम्  -- न पुरा सूर्यस्योदेतोर्मन्थितवा असुर्यो वि३देवा ( विदेवः ) आधीयत उद्यत्सु रश्मिषु (अग्निः) मथ्यस्तत् , सदेवः सेन्द्रः (इन्द्रः = सूर्यः, देवाः =रश्मयः) । मै ,,१०

*अग्निहोत्र-ब्राह्मणम् -- एतानि वै सर्वाणि (यमराज्यमग्निष्टोमेन सोमराज्यमुक्थ्येन, सूर्यराज्यं षोडशिना, स्वराज्यमतिरात्रेण) इन्द्रोऽभवत् । मै ,, ।।

*चित्तिः स्रुक्, चित्तमाज्यं, वाग्वेदिर् आधीतं बर्हिः, केतो अग्निर्, विज्ञातमग्नीद्, वाचस्पतिर्होता, मन उपवक्ता, प्राणो हविः, सामाध्वर्युर्, इन्द्रं गच्छ स्वाहा । मै , , ; काठ ९,८ ।।

*चतुर्होतारः -- अग्निर्यजुर्भिः , सविता स्तोमै , रिन्द्र उक्थामदै , र्बृहस्पतिश्छन्दोभिः..... (सहागच्छतु) । मै ,,; १,९,८; काठ ९.१०; तैआ ३,,१ ।

*प्राणो वै दशहोता , चक्षुश्चतुर्होता , श्रोत्रं पञ्चहोता , वाक् चात्मा च सप्तहोता , अग्निहोत्रं वै दशहोता , दर्शपूर्णमासौ चतुर्होता , चातुर्मास्यानि पञ्चहोता , सौम्योऽध्वरः सप्तहोता ,...... चतुर्होतारं वदेत् पुरस्तात् प्रयाजानां , चतुर्होत्रा वै देवा इन्द्रमजनयन् । मै ,,; काठ ९, १४ ।

*ते देवा अब्रुवन् , एतेमं यज्ञं तिर उपर्यसुरेभ्यो तंस्यामहा इति , तं एतावञ्श आदायोदक्रामन् , अग्निर्यजुर्भिः , सविता स्तोमैः , इन्द्र उक्थामदै , र्बृहस्पतिश्छन्दोभिरिति - मै १,९,८

*साकमेधः --असौ वा आदित्य इन्द्रो रश्मयः क्रीडयः (मरुतः), साकं रश्मिभिः प्रचरति विजित्यै, देवा वै वृत्रं हतं न व्यजानन् , तं मरुतः क्रीडयोऽध्यक्रीडन् , तस्मात् क्रीडयो । मै , १०, १६; काठ ३६,१० ।

*अथैष वैश्वकर्मणः , विश्वानि मे कर्माणि कृतानि आसन्न् इति , विश्वकर्मा हि , सोऽभवद् वृत्रं हत्वा। मै , १०, १६

*वाजपेयः -- इन्द्रा एकादशाक्षरया त्रिष्टुभम् उदजयच्चतुर्धा ह्येतस्य एकादशैकादशाक्षराणि। मै ,११,१० ।।

*तं वा इन्द्रमन्तरेव गर्भं  सन्तमयस्मयेन दाम्नापौम्भत्, सोऽपोब्धोऽजायत, तं वा एतेन बृहस्पतिरयाजयदैन्द्राबार्हस्पत्येन, तस्य (इन्द्रस्य) तद्दाम स्वयमेव व्यपद्यत, स इमा दिशो वज्रेणाभिपर्यावर्तत । मै ,,१२ ।।

*इन्द्राय मरुत्वते नैवारमेकादशकपालम् (पुरोडाशं निर्वपेत् ) । मै , , ।।

*प्रजापतिर्वै देवेभ्यो भागधेयानि व्यकल्पयत् , स इन्द्रोऽब्रवीत् , यदतिरिच्यते तन्ममेति , तद्वा इन्द्रियमेवात्यरिच्यत, तदिमांल्लोकान् ऊर्ध्वमनूदश्रयत,
तन् नैकेनाप्नोत् , न द्वाभ्यां , तत् तृतीयेनाप्त्वावारुन्द्ध , यत् त्रयः पुरोडाशा भवन्ति , एभ्यो वा एतल् लोकेभ्य इन्द्रियं वीर्यमाप्त्वावरुन्द्धे , उत्तर उत्तरः पुरोडाशो ज्यायान् भवति , उत्तर उत्तरो हि लोको ज्यायान्, इन्द्राय राज्ञे प्रथम , इन्द्राय स्वराज्ञे मध्यम , इन्द्रायाधिराजायोत्तम , एतानि वै सर्वाणीन्द्रोऽभवद् राज्यं स्वाराज्यमाधिराज्यं.इन्द्राय घर्मवते सूर्यवता एकादशकपालं निर्वपेत्तेजस्काम, स्तेजो वै घर्म, स्तेजः सूर्य,स्तेज एवावरुन्द्धे , इन्द्रायेन्द्रियवता एकादशकपालं निर्वपेत् पशुकाम , इन्द्रियं वै पशवो , इन्द्र इन्द्रियस्य प्रदाता
। मै ,,

*इन्द्राय घर्मवते सूर्यवता एकादशकपालं निर्वपेत् , इन्द्राय मन्युमते मनस्वता एकादशकपालं, इन्द्रायेन्द्रियवता एकादशकपालं, इन्द्रायार्कवतेऽश्वमेधवता एकादशकपालं , भूतिकामं याजयेत् , इदं वा इन्द्रस्य घर्मश्च सूर्यश्च , इदमस्य मन्युश्च मनश्च , इदमस्येन्द्रश्चेन्द्रियं च , इदमस्यार्कश्चाश्वमेधश्च , एतानि वै सर्वाणीन्द्रोऽभवत् मैसं २.२.९

*इन्द्रायांहोमुचा एकादशकपालं निर्वपेत् , आमयाविनं याजयेत् , एषा वा इन्द्रस्य भेषजा तनूर्यदंहोमुक्, तं एव भागधेयेनोपासरत् , स एनं अंहसो मुञ्चति , इन्द्राय त्रात्र एकादशकपालं निर्वपेद् यो ज्यान्या मारणादपरोधाद्वा बिभीयात् , इन्द्रो वै त्राता , इन्द्रोऽपरोद्धा, तं एव भागधेयेनोपासरत् , स एनं त्रायते , इन्द्रायान्वृजवा एकादशकपालं निर्वपेज् ज्येष्ठबन्धु, रिन्द्रियं वै ज्येष्ठबन्धु , रिन्द्रियेणैवैनानन्वृजून् कुरुते , इन्द्राय प्रवभ्रायैकादशकपालं निर्वपेत् संग्रामे, प्रवभ्रो वा इन्द्रो वृत्राय वज्रं प्राहरत् , प्रवभ्र एवैभ्यो वज्रं प्रहरति , इन्द्राय वैमृधायैकादशकपालं निर्वपेत् संग्रामे, मृधो वा एष विहन्ति यः संग्रामं जयति, मृध एव विहते , इन्द्रायाभिमातिघ्न एकादशकपालं निर्वपेत् संग्रामे , अभिमातीर्वा एष हन्ति यः संग्रामं जयति , अभिमातीरेव हते , इन्द्रायाभिमातिषाहा एकादशकपालं निर्वपेद्यः कामयेत विषहेया , अभयं मे स्यादिति । मै , , १०।।

*ऐन्द्रमेककपालं निर्वपेत् , निरुद्धं याजयेत् , आ प्रेहि परमस्याः परावता , इति याज्यानुवाक्ये स्याताम् , परावतं वा एष गतो यो निरुद्धः , परावत एवैनं अध्याप्त्वावगमयति, ऐन्द्रं त्रयोदशकपालं निर्वपेत् , निरुद्धं याजयेत् , अतिरिक्तं वै त्रयोदशम्, अतिरिक्तो निरुद्धो , अतिरिक्तादेवैनं अतिरिक्तमाप्त्वावगमयति , इन्द्राय वज्रिणा एकादशकपालं निर्वपेत् , इन्द्राय वृत्रघ्न एकादशकपालं, इन्द्राय वृत्रतूरा एकादशकपालं यस्य भ्रातृव्यः सोमेन यजेत, वज्रं वा एष भ्रातृव्यायोञ्श्रयति यः सोमेन यजते, ., इन्द्राय क्षेत्रंजयायैकादशकपालं निर्वपेद्यः क्षेत्रे पशुषु वा विवदेत् , इन्द्रो वै देवानां क्षेत्रंजय। मै ,, ११ ।।

*यस्य सान्नाय्यं चन्द्रमा अभ्युदियाद् ये पुरोडाश्याः स्युस् तांस्त्रेधा कुर्यात् , ये मध्यमास्तमग्नये दात्रेऽष्टाकपालं निर्वपेत् , ये स्थविष्ठास्तमिन्द्राय प्रदात्रे दधंश्चरुम् , ये क्षोदिष्ठास्तं विष्णवे शिपिविष्टाय शृते चरुम् , अग्निर्वै मध्यमस्य दाता , इन्द्रो ज्येष्ठस्य प्रदाता । मै ,,१३ ।।

*ये पुरोडाश्याः स्युस् तांस्त्रेधा कुर्यात् , ये क्षोदिष्ठास्तमग्नये सनिमतेऽष्टाकपालं निर्वपेत् , ये मध्यमास्तं विष्णवे शिपिविष्टाय शृते चरुम् , ये स्थविष्ठास्तमिन्द्राय प्रदात्रे दधंश्चरुम् , अग्निरेवास्मै तद्विन्दति यदीह, विष्णुस्तद्यदन्तरिक्षा , इन्द्रस्तद्यद्दिवि - मै ,,१३ ।।

*अग्निरेवास्मै तद्विन्दति यदीह, विष्णुस्तद्यदन्तरिक्षा , इन्द्रस्तद् (यजमानाय विन्दति) यद् दिवि । मै ,,१३

*इन्द्रियेण वा एष वीर्येण व्यृध्यते यो राजसूयेनाभिषिञ्चते, यावदेवेन्द्रियं वीर्यं तदस्मिन्न् आप्त्वा दधाति,....इन्द्रे हि तौ (अश्विनौ) तानीन्द्रियाणि वीर्याण्याप्त्वाधत्ताम् । मै , , ।।

*असौ वा आदित्यस्तेजोभिव्यार्ध्यत तत इदं सर्वं तमोऽभवत् , स प्रजापतिरेतान्

दश ऋषभानपश्यदथो आहुरिन्द्रो ऽपश्यदिति तानैन्द्रानालभत, तैरस्मिन् ( आदित्ये )

इन्द्रियाणि वीर्याण्याप्त्वादधात् .... यस्तेजस्कामः स्यात्स एतानैन्द्रान् ऋषभानालभेत। मै ,,१०

*राजसूयः-- आवित्तो अग्निर्गृहपति, आवित्ता इन्द्रो वृद्धश्रवाः (वृषा (माश.]).... । मै ,,; माश १,,,३३ ।।

*अग्निचितिः -- प्राची दिक् , वसन्त ऋतु, रग्निर्देवता, ब्रह्म द्रविणं , गायत्री छन्दो ,......दक्षिणा दिग् ग्रीष्म ऋतुरिन्दो देवता, क्षत्रं द्रविणं, त्रिष्टुप्छन्दो, बृहत्साम, पञ्चदशः स्तोमः स उ सप्तदशवर्तनिः, सनातना ऋषिर्दित्यवाड् वयस्त्रेतायानां दक्षिणाद्वातो वातः। प्रतीची दिक् , वर्षा ऋतु , र्विश्वे देवा देवता, विड् द्रविणं ,..... । मै ,, २०

*प्राच्या त्वा दिशा सादयामि, अग्निना देवेन देवतया गायत्रेण छन्दसाग्नेः शिरा उपदधामि,......दक्षिणया त्वा दिशा सादयामीन्द्रेण देवेन देवतया त्रैष्टुभेन छन्दसाग्नेः पक्षमुपदधामि..... ।। मै ,,११ ।।

*अग्निचितिः-- इन्द्रं दैवीर्विशो मरुतोऽनुवर्त्मानः यथेन्द्रं दैवीर्विशो मरुतोऽनुवर्त्मानोऽभवन्न् एवमिमं यजमानं दैवीश्च विशो मानुषीश्चानुवर्त्मानो भवन्तु । मै , ११,

*अग्निचिति-ब्राह्मणम् (वसोर्धारीयः) -- सोऽब्रवीत् , अर्ध्यो वा अहं देवतानामसानीति, ततो वा अजयन् , तस्मादेषोऽर्धभाग् देवतानां , यदर्धेन्द्राणि हूयन्ते विजित्यै , इन्द्रोत्तमानि भवन्ति , इन्द्रियं (+वै [मै.J) वीर्यमिन्द्रः । मै ,,; माश २,,,८ ।।

*अग्निर्वै यज्ञस्यान्तोऽवस्तात् , विष्णुः पुरस्तात् , उभयत एव यज्ञस्यान्ता आलब्ध, तदाहुर्न ऋत इन्द्राद्यज्ञोऽस्त्विति, यदष्टाकपालस्तेनाग्नेयो , यत् त्रिकपालस्तेन वैष्णवो , यदेकादशकपालः संपद्यते तेनैन्द्रो । मै , ,।।

*सोमक्रयः -- इन्द्रस्योरुमाविश दक्षिणं इति , ऐन्द्रो वै यज्ञ , इन्द्रः सोमस्य योनिः, स्व एवैनं योनौ दधाति , इन्द्रो वा एतमग्रा आगतं ऊरू न्यगृह्णीत, तां वा एतदनुकृतिम् ऊरा आसादयते । मै ,, ।।

*देवाश्च वा असुराश्चास्पर्धन्त, तेषां वा इन्द्रियाणि वीर्याण्यपाक्रामन् , ऋक्सामे वा एभ्यस्तदपाक्रामताम् , पशवो वाग् इन्द्रियं प्राणापानौ, तैर्वा इन्द्रोऽकामयत, सायुज्यं गछेयमिति ॥ हरिवं इन्द्रो धाना अत्तु ॥ इति ऋक्सामे वा इन्द्रस्य हरी, ऋक्सामाभ्यां एव सायुज्यमगच्छत् ॥ .... इन्द्रस्यापूपः ॥ इति इन्द्रियं वा इन्द्र , इन्द्रियेणैव सायुज्यमगच्छत् ॥ - मैसं. ३.१०.६

*सौत्रामणी -- वायुः पूतः पवित्रेण प्राक् सोमो अतिस्रुतः । इन्द्रस्य युज्यः सखा । वायोः पूतः पवित्रेण प्रत्यक् सोमो अतिस्रुतः । इन्द्रस्य युज्यः सखा । मै , ११, ।।

*. .... सरस्वत्यास्त्वा वीर्येण यशसेऽन्नाद्यायाभिषिञ्चामि , इन्द्रस्य त्वेन्द्रियेणौजसे बलायाभिषिञ्चामि, भूः स्वाहा ॥ । मै , ११,

*सौत्रामणी-- इन्द्रस्य रूपं ऋषभो बलाय कर्णाभ्यां श्रोत्रममृतं ग्रहाभ्यां । यवैर्न बर्हिर् भ्रुवि केसराणि कर्कन्धु जज्ञे मधु सारघं मुखे ॥इन्द्रस्य रूपं शतमानं आयुः शुक्रं न ज्योतिरमृतं दधाना ॥ सरस्वती योन्यां गर्भमन्तरश्विभ्यां पत्नी सुकृतं बिभर्ति ।
अपां रसेन वरुणो न साम्नेन्द्रं श्रियै जनयन्नप्सु राजा ॥
। मै ,११,।।

*इन्द्राय स्वपस्याय वेहत् । मै ,१३, । ।

*मशकान् केशै , रिन्द्रं स्वपसा, वहेन बृहस्पतिं..(प्रीणामि) । मै ,१५,; काठ ५३,८ ।

*.... त्वष्टुर्दशमी , इन्द्रस्यैकादशी, वरुणस्य द्वादशी, यमस्य त्रयोदशी ।.... धातुर्दशमी , इन्द्रस्यैकादशी, वरुणस्य द्वादशी, यम्यास्त्रयोदशी। मै ,१५,:५; काठ ५३,११।

*अश्वमेधः-- इन्द्राय त्रैष्टुभाय पञ्चदशाय बार्हताय ग्रैष्मायैकादशकपालः [ष्माय पुरोडाशमेकादशकपालम् (निर्वपति ! मै.J)] । मै ,१५,१०; काठ ४५, १० ।

*गोनामिकः -- भुवनं असि सहस्रमिन्द्राय त्वा सृमोऽददात् ॥ इति सृमो वै नामासुर आसीत् , तस्येयं पृथिवी पशुभिः पूर्णासीत् , तानिन्द्रोऽवृङ्क्त , तस्मादाहुः, ऐन्द्राः पशवा इति । - मै ,,

*कश्यपस्य कम्बुन्युद्धस्ता , , इन्द्रस्याक्लस्ता , अथो आहुः , प्रजापतेरिति , उभयं ज्येष्ठलक्ष्मं ज्यैष्ठ्यकामः कुर्वीत, । मै ,,

*चत्वारो वै पृश्नेः स्तना आसंस्ततस्त्रिभिर्देवेभ्योऽदुहत् कुशीभिरेकोऽनुनद्ध आसीत् , तं वा इन्द्र एवापश्यत् , तेनैन्द्रायैवादुहत् , तद्वा अस्य ( इन्द्रस्य ) कौशिकत्वम्  , यदाह ॥ ब्राह्मण कौशिका इव ॥ मै ,,

*क्रियौ वा एते यज्ञस्य यन्मरुत्वतीया , अक्षो मध्यमः, पक्षसी अभितो , मरुद्भिर्वै वीर्येणेन्द्रो वृत्रमहन, न ऋते मरुद्भ्योऽशक्नोद्वीर्यं कर्तुम् । मै , , ।।

*असा आदित्य इन्द्रः, समानं अग्निश्चासौ चादित्यो , विराजो वै तेज आग्नेयः, शक्वरीणामैन्द्रो , रेवतीनां सौर्यो - मैसं ४.७.३

तेजो वा अग्नि, रिन्द्रियमिन्द्रो, ब्रह्मवर्चसमसा आदित्य, स्तेजसा च वावास्मा एतद् ब्रह्मवर्चसेन चोभयत इन्द्रियं परिगृह्णाति ॥ मै ,,

*ग्नेश्च त्वा ब्रह्मणश्च तेजसा जुहोमि तेजोदाम्...इन्द्रस्य च त्वा क्षत्रस्य चौजसा जुहोमि... सूर्यस्य च त्वौषधीनां च वर्चसा जुहोमि । मै ,, ।।

*इन्द्रौजस्कारौजस्वां  स्त्वं सहस्वान् देवेष्वेध्योजस्वन्तं मां सहस्वन्तं मनुष्येषु कुरु । मै ,,

*प्रजापतिर्वै देवेभ्यो यज्ञान् व्यकल्पयत् , सोऽमन्यत , आत्मानं अन्तरगां इति, तेषां वा इन्द्रियाणि वीर्याणि पुनः समबृहत् , स षोडश्यभवत् , अथ वै तर्हीन्द्रो देवानामासीदवमतमः शिथिरतम, स्तस्मै वा एतं षोडशिनं प्रायच्छत् , तेनेन्द्रोऽभवत्। मै ,, ।।

*इन्द्रो वै वृत्रमहन् , स इमं लोकमभ्यजयत् , अमुं तु लोकं नाभ्यजयत् , तं विश्वकर्मा भूत्वाभ्यजयत् , यद् वैश्वकर्मणो ग्रहो गृह्यते , अमुष्य लोकस्याभिजित्यै..... अन्तमेव गत्वोभयोर् लोकयोः प्रतितिष्ठन्ति , आदित्येनास्मिंल्लोके, वैश्वकर्मणेनामुष्मिन् । मै ,,१०

*प्रवर्ग्यः -- इन्द्रस्यौजोऽसि प्रजापते रेतः ।ऋध्यासमद्य मखस्य शिरः ॥ मै ,,।।

आ यस्मिन्त्सप्त वासवा रोहन्ति पूर्व्या रुहः । ऋषिर्ह दीर्घश्रुत्तमा इन्द्रस्य घर्मो

अतिथिः । मै ,१२,।।

*इन्द्रो भूतस्य भुवनस्य राजेन्द्रो दाधार पृथिवीं उतेमां । इन्द्रे ह विश्वा भुवना श्रितानीन्द्रं मन्ये पितरं मातरं च ॥ इन्द्रः पृणन्तं पपुरिं चेन्द्रा इन्द्रः स्तुवन्तं स्तवितारमिन्द्रः । दधाति शक्रः सुकृतस्य लोक इन्द्रं मन्ये पितरं मातरं च ॥मै , १४, ।।

*इन्द्रो द्यौरुर्व्युत भूमिरिन्द्रा इन्द्रः समुद्रो अभवद्गभीरः । उर्वन्तरिक्षं स जनासा इन्द्रा इन्द्रं मन्ये पितरं मातरं च। मै ,१४, ।।

*इन्द्रो भूतस्य भुवनस्य राजेन्द्रो दाधार पृथिवीमुतेमाम् । इन्द्रे ह विश्वा भुवना

श्रितानीन्द्रं मन्ये पितरं मातरं च । मै ,१४, ।।

*इन्द्रो बभूव ब्रह्मणा गभीर इन्द्रा आभूतः परिभूष्विन्द्रः । इन्द्रो भविष्यदुत भूतमिन्द्रा  इन्द्रं मन्ये पितरं मातरं च । मै , १४, ।।

*इन्द्रो वृत्रं  वज्रेणावधीद्धीन्द्रो व्यंसमुत शुष्णमिन्द्रः । इन्द्रः पुरः शम्बरस्याभिनद्धीन्द्रं मन्ये पितरं मातरं च । मै , १४,

*इन्द्रोऽस्मं अवतु वज्रबाहुरिन्दे भूतानि भुवनानीन्द्रे । अस्माकमिन्द्रो भवतु प्रसाह इन्द्रं मन्ये पितरं मातरं च । मै , १४, ।।

*इन्द्रो देवानामधिपाः पुरोहितो विशां पतिरभवद् वाजिनीवान् । मै ,१४,१२

*बर्हिराहरणम्-- पूषा ते ग्रन्थिं ग्रथ्नातु स ते मास्थात् । इन्द्रस्य (इन्द्रस् ।मै ४,,J) त्वा बाहुभ्यामुद्यच्छे । तैसं ,,,; मै १,,; ,,; काठ १,; क १,२ । ।

*सोमक्रयणीहोमादि -- मित्रस् त्वा पदि बध्नातु  पूषाऽध्वनः पातु । इन्द्रायाध्यक्षाय । तैसं , ,,; काठ २,; क १,१७ ।

*हविर्होमानुमन्त्रण मन्त्राः -- इन्द्राग्नियोर् अहं देवयज्ययेन्द्रियाव्यन्नादो भूयासम्
इन्द्रस्याहं देवयज्ययेन्द्रियावी भूयासम्  । महेन्द्रस्याहं देवयज्यया जेमानम् महिमानं गमेयम् । तैसं ,,,; काठ ५,१ ।

*रोहितेन त्वाऽग्निर् देवतां गमयतु हरिभ्यां त्वेन्द्रो देवतां गमयत्व् एतशेन त्वा सूर्यो देवतां गमयतु । तैसं ,, , ; काठ ५,३ ।

*इन्द्रं वो विश्वतस् परि हवामहे जनेभ्यः । अस्माकम् अस्तु केवलः ॥ इन्द्रं नरो नेमधिता हवन्ते यत् पार्या युनजते धियस् ताः । शूरो नृषाता शवसश् चकान आ गोमति व्रजे भजा त्वं नः ॥ इन्द्रियाणि शतक्रतो या ते जनेषु पञ्चसु । इन्द्र तानि त आ वृणे ॥....आ यस्मिन्त् सप्त वासवास् तिष्ठन्ति स्वारुहो यथा । ऋषिर् ह दीर्घश्रुत्तम इन्द्रस्य घर्मो अतिथिः ॥  । तैसं ,,१२,; मै ४,१२,२।।

*इन्द्राय शुनासीराय द्वादशकपालः (पुरोडाशं द्वादशकपालम् [तैसं.]).... ऐन्द्रं दधि । तैसं ,,,; मै ११०, ; काठ १५, २।।

*अभिषेकजलसंस्कारमन्त्राः-- आविन्नो अग्निर् गृहपतिर् आविन्न इन्द्रो वृद्धश्रवाः... । तैसं ,,१२,।।

*दिग् व्यास्थापनमन्त्राः -- उग्रामातिष्ठ, त्रिष्टुप्त्वा छन्दसामवतु (सावतु (काठ.] पञ्चदशः स्तोमो, बृहत्सामेन्द्रो देवता, क्षत्रं द्रविणम् । तैसं ,,१३,; मे २,,१०; काठ १५,७ ।।

*रथेन विजयः-- इन्द्रस्य बलाय स्वाहा, मरुतामोजसे स्वाहा । तैसं ,, १५,; काठ १५, ८ ।।

*जितवतो राज्ञः सेवोपचारः -- ब्रह्मा3न् त्वम्̇ राजन् ब्रह्मासीन्द्रऽसि सत्यौजाः । तैसं ,,१६,; मै २,,१२; काठ १५,८ ।।

*जयादिहेतुपशुविधिः -- इन्द्राय मन्युमते मनस्वते ललामम् प्राशृङ्गम् आ लभेत संग्रामे संयत्ते ।  इन्द्रियेण वै मन्युना मनसा संग्रामं जयति । इन्द्रमेव मन्युमन्तं मनस्वन्तं  स्वेन भागधेयेनोपधावति, स (इन्द्रः) एवास्मिन् (यजमाने) इन्द्रियं मन्युं मनो दधाति, जयति तं सङ्ग्रामम् । तैसं ,, ,

*इन्द्राय मरुत्वते पृश्निसक्थम् आ लभेत ग्रामकामः । इन्द्रम् एव मरुत्वन्तम्̇ स्वेन भागधेयेनोप धावति स एवास्मै सजातान् प्र यच्छति ग्राम्य् एव भवति ।
यद् ऋषभस् तेन  ऐन्द्रः । यत् पृश्निस् तेन मारुतः। तैसं ,, ,

*अग्निः प्रथमो वसुभिर्नो अव्यात् सोमो रुद्रेभिर् अभि रक्षतु त्मना । इन्द्रो मरुद्भिर् ऋतुधा कृणोत्व् आदित्यैर् नो वरुणः सम्̇ शिशातु तैसं , ,११,; मै ४, १२, ; काठ १०,१२ ।

*सं नो देवो वसुभिर् अग्निः सम्  सोमस् तनूभी रुद्रियाभिः । सम् इन्द्रो मरुद्भिर् यज्ञियैः सम् आदित्यैर् नो वरुणो अजिज्ञिपत् ॥ । तैसं ,,११,।।

*प्रजापतिर् देवेभ्यो ऽन्नाद्यं व्यादिशत् सो ऽब्रवीत् । यद् इमाँल्लोकान् अभ्य् अतिरिच्यातै । तन् ममासद् इति तद् इमाँल्लोकान् अभ्यत्यरिच्यतेन्द्रम्̇ राजानम् इन्द्रम् अभिराजम् इन्द्रम्̇ स्वराजानम् । ततो वै स इमाँल्लोकाम्̇स् त्रेधाऽदुहत् - तैसं ,,,।।

*अन्नादनशक्तिकामस्येष्टिविधिः--इन्द्राय राज्ञे पुरोडाशम्  एकादशकपालम् इन्द्रायाधिराजायेन्द्राय स्वराज्ञे । अयं वा इन्द्रो राजाऽयमिन्द्रोऽधिराजोऽसाविन्द्रः स्वराडिमानेव लोकान्त्स्वेन भागधेयेनोपधावति, त एवात्मा अन्नं प्रयच्छन्ति । तैसं ,,,।।

*इन्द्रियसामर्थ्यशरीरसामर्थ्यकामस्येष्टिविधिः-- यद् इन्द्राय राथंतराय निर्वपति यद् एवाग्नेस् तेजस् तद् एवाव रुन्द्धे यद् इन्द्राय बार्हताय यद् एवेन्द्रस्य तेजस् तद् एवाव रुन्द्धे यद् इन्द्राय वैरूपाय यद् एव सवितुस् तेजस् तत्  एवाव रुन्द्धे यद् इन्द्राय वैराजाय यद् एव धातुस् तेजस् तद् एवाव रुन्द्धे यद् इन्द्राय शाक्वराय यद् एव मरुतां तेजस् तद् एवाव रुन्द्धे यद् इन्द्राय रैवताय यद् एव बृहस्पतेस् तेजस् तद् एवाव रुन्द्धे ।  तैसं , ,,

*आयुष्कामेष्टिविधिः -- इन्द्रस्य प्राणोऽसीत्याहेन्द्रियमेवास्मिन् (आमयाविनि) एतेन दधाति । तैसं ,,११, ।।

*इन्द्रो वा अस्येन्द्रियेणापक्रामति वरुण एनं वरुणपाशेन गृह्णाति यः पाप्मना गृहीतो भवति । तैसं ,,१३,१-२ ।।

*विजयार्थेष्टिः -- इन्द्रमब्रुवन् ( देवाः ) त्वं वै नो वीर्यावत्तमोऽसि त्वाम् अनु समारभामहा इति  सो ऽब्रवीत्  तिस्रो म इमास् तनुवो वीर्यावतीस् ताः प्रीणीताथासुरान् अभि भविष्यथेति ता वै ब्रूहीत्य् अब्रुवन्  इयम् अम्̇हो मुग् इयं विमृधेयम् इन्द्रियावती
इत्य् अब्रवीत्  । तैसं ,, ,

*त इन्द्रायांऽहोमुचे पुरोडाशमेकादशकपालं निरवपन्निन्द्राय वैमृधायेन्द्रायेन्द्रियावते त्रयस्त्रिंशत्कपालं पुरोडाशं निरवपन्( देवाः, त्रयस्त्रिंशद् वै देवताः । तैसं ,, ,

*प्राच्यां दिशि त्वम् इन्द्रासि राजोतोदीच्यां वृत्रहन् वृत्रहासि । यत्र यन्ति स्रोत्यास् तत्
जितं ते दक्षिणतो वृषभ एधि हव्यः ।
- तैसं. २.४.१४.१

*संवत्सरम् इन्द्रं यजेत संवत्सरम्̇ हि व्रतं नाति स्वा एवैनं देवतेज्यमाना भूत्या इन्द्धे वसीयान् भवति- तैसं २.५.४.४

*अभ्युदयेष्टिः, दाक्षायणयज्ञः-- त्रेधा तण्डुलान् वि भजेद् ये मध्यमाः स्युस् तान् अग्नये दात्रे पुरोडाशम् अष्टाकपालं कुर्याद् ये स्थविष्ठास् तान् इन्द्राय प्रदात्रे दधम्̇श् चरुम् । ये ऽणिष्ठास् तान् विष्णवे शिपिविष्टाय शृते चरुम् अग्निर् एवास्मैप्रजाम् प्रजनयति वृद्धाम् इन्द्रः प्र यच्छति यज्ञो वै विष्णुः पशवः शिपिर् यज्ञ एव पशुषु प्रति तिष्ठति  । तैसं , , ,

*उपाम्̇शोः पात्रम् असि सोमो देवता त्रिष्टुप् छन्दो ऽन्तर्यामस्य पात्रम् असीन्द्रो देवता जगती छन्... तैसं , ,,;

*आग्रयणस्य पात्रम् असीन्द्रो देवता ककुच् छन्द -- तैसं , ,,

*पवमानग्रहत्रयम् -- उपयामगृहीतो ऽसि प्रजापतये त्वा इति द्रोणकलशम् अभिमृशेत् । इन्द्राय त्वेत्याधवनीयम् । विश्वेभ्यस् त्वा देवेभ्यः । इति पूतभृतम्। तैसं , ,,

*स्तोत्रोपाकरणप्रतिगराङ्गमन्त्राः -- वायुर् हिंकर्ताऽग्निः प्रस्तोता प्रजापतिः साम बृहस्पतिर् उद्गाता विश्वे देवा उपगातारो मरुतः प्रतिहर्तार इन्द्रो निधनं । तैसं ,,,; जै १, ३०४ ।

*अदाभ्यांशुग्रह मन्त्राः -- ...रुद्रास्त्वा प्रवृहन्तु त्रैष्टुभेन छन्दसेन्द्रस्य प्रियं पाथ उपेहि । तैसं , , ,

*अभ्यातानाः -- अग्निर् भूतानाम् अधिपतिः स माऽवत्व् इन्द्रो ज्येष्ठानाम् .... । तैसं ,,,।।

*सौमिकब्रह्मत्वविधिः -- ऋषयो वा इन्द्रम् प्रत्यक्षं नापश्यन् तं वसिष्ठः प्रत्यक्षमपश्यत् सो ऽब्रवीद् ब्राह्मणं ते वक्ष्यामि यथा त्वत्पुरोहिताः प्रजाः प्रजनिष्यन्ते ऽथ मेतरेभ्य ऋषिभ्यो मा प्र वोच इति तस्मा एतान्त् स्तोमभागान् अब्रवीत्
ततो वसिष्ठपुरोहिताः प्रजाः प्राजायन्त । तैसं ,,,।।

*सौमिकब्रह्मत्वविधिः-- अभिजिदसि युक्तग्रावेन्द्राय त्वेन्द्रं जिन्व इत्याहाभिजित्यै  । तैसं ,,,; ,,,; काठ ३७, १७ । ।

*अक्ष्णयास्तोमीया इष्टकाः -- इन्द्रस्य भागोऽसि, विष्णोराधिपत्यं (+ क्षत्रं स्पृतं, पञ्चदशः स्तोमः तैसं., मै.) । तैसं ,, , ; मै २,,; काठ २१, १ ।

*सृष्टीष्टकाः -- पञ्चदशभिरस्तुवत, क्षत्रमसूज्यतेन्द्रोऽधिपतिरासीत् । तैसं ,,१०,; मै २,,६।।

*नाकसदा इष्टकाः -- राज्ञ्य् असि प्राची दिग् वसवस् ते देवा अधिपतयो....विराडसि दक्षिणा दिग्, रुद्रास्ते देवा अधिपतया (य [तैसं.J) इन्दो हेतीनां प्रतिधर्ता पञ्चदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्यां श्रयतु, प्रउगमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु बृहत् साम प्रतिष्ठित्यै । तैसं ,,,; मै २, ,९ ।।

*यज्ञतन्वाख्या इष्टकाः -- वरुण उपनद्धः । ... मित्रः क्रीतः.... अग्निर् आग्नीध्रे
बृहस्पतिर् आग्नीध्रात् प्रणीयमानः । इन्द्रो हविर्धाने (सोमः)...... । तैसं ,,,

चित्रा नक्षत्रमिन्द्रो देवता.... रोहिणी नक्षत्रम् इन्द्रो देवता ....श्रविष्ठा नक्षत्रं वसवः देवता शतभिषं ( षङ् तैसं.) नक्षत्रमिन्द्रो देवता । तैसं ,,१०,; मै २, १३,२०।।

*ऋतव्या इष्टकाः -- उग्रा च भीमा च पितॄणां (तृ (तैसं]) यमस्येन्द्रस्य। ध्रुवा च पृथिवी च देवस्य सवितुर् मरुतां वरुणस्य ...... । तैसं , ,११, ; काठ २२,५।।

*अश्वमेधे कवचस्वीकारादि -- दिवः पृथिव्याः परि  ओज उद्भृतं वनस्पतिभ्यः पर्य् आभृतम्̇ सहः । अपाम् ओज्मानम् परि गोभिर् आवृतम् इन्द्रस्य वज्रम्̇ हविषा रथं यज ॥ इन्द्रस्य वज्रो मरुताम् अनीकम्। तैसं ,,,; काठ ४६.१ ।

वसोर्धाराभिधानम्-- अर्धेन्द्राणि जुहोति     देवता एवाव रुन्द्धे यत्सर्वेषामर्धमिन्द्रः प्रति तस्मादिन्द्रो देवतानां भूयिष्ठभाक्तमः । इन्द्रम् उत्तरम् आह ।     इन्द्रियम् एवास्मिन्न् उपरिष्टाद् दधाति  तैसं , , ,

*.. द्युतानस् त्वा मारुतो मरुद्भिर् उत्तरतः पातु । देवास् त्वेन्द्रज्येष्ठा वरुणराजानो ऽधस्ताच् चोपरिष्टाच् च पान्तु।। तैसं ,,,

*असुराणाम्  वा इयम् अग्र आसीत् । यावद् आसीनः परापश्यति तावद् देवानाम् । ते देवा अब्रुवन् ।  अस्त्व् एव नो ऽस्याम् अपीति। कियद् वो दास्याम इति ।   यावद् इयम्̇ सलावृकी त्रिः परिक्रामति तावन् नो दत्तेति। स इन्द्रः सलावृकी रूपं कृत्वेमां त्रिः सर्वतः पर्य् अक्रामत्। तद् इमाम् अविन्दन्त। यद् इमाम् अविन्दन्त तद् वेद्यै वेदित्वम॥। तैसं , ,, ।।

*ऐन्द्रवायवग्रहकथनम्  -- वाग् वै पराच्य् अव्याकृतावदत्     ते देवा इन्द्रम् अब्रुवन् ।     इमां नो वाचं व्याकुर्व् इति     सो ऽब्रवीत् ।     वरं वृणै मह्यं चैवैष वायवे च सह गृह्याता इति     तस्माद् ऐन्द्रवायवः सह गृह्यते     ताम् इन्द्रो मध्यतो ऽवक्रम्य व्याकरोत्     तस्माद् इयं व्याकृता वाग् उद्यते   तस्मात् सकृद् इन्द्राय मध्यतो गृह्यते द्विर् वायवे । तैसं ,,, ।।

*गर्गत्रिरात्राभिधानम्  -- अथ या सहस्रतम्य् आसीत् तस्याम् इन्द्रश् च विष्णुश् च व्यायच्छेताम् ।     स इन्द्रो ऽमन्यत ।     अनया वा इदं विष्णुः सहस्रं वर्क्ष्यत इति  तस्याम् अकल्पेताम् ।     द्विभाग इन्द्रस् तृतीये विष्णुस्     तद् वा एषाभ्यनूच्यते ।
    
उभा जिग्यथुर् इति  ।    तां वा एताम् अच्छावाकः     एव शम्̇सति । । तैसं ,, ,; कौ ५,४ ।

*प्रजापतिर्देवासुरानसृजत । स इन्द्रमपि नासृजत । तं देवा अब्रुवन् । इन्द्रं नो जनयेति । सोऽब्रवीत् । यथाहं युष्माँस्तपसासृक्षि । एवमिन्द्रं जनयध्वमिति
ते तपोऽतप्यन्त । त आत्मन्निन्द्रमपश्यन् । तमब्रुवन् । जायस्वेति । सोऽब्रवीत् । किम्भागधेयमभिजनिष्य इति । ऋतून्त्संवत्सरम् । प्रजाः प्रशून् । इमाँल्लोकानित्यब्रुवन् । तं वै माहुत्या प्रजनयतेत्यब्रवीत्
तं चतुर्होत्रा प्राजनयन् । यः कामयेत वीरो म आजायेतेति । स चतुर्होतारं जुहुयात् । - तै.ब्रा. २.२.३.३

*षोडणाक्षराणि स्तोभति। ततो यानि पञ्चदश स वज्रः पञ्चदशः। अथ यत् षोडषम् अक्षरं स इन्द्रः। इन्द्रो वज्रस्योद्यन्ता षोडशः। तम् इन्द्रं यजमानम् अकृत्। तद् उद्गाता यजमानस्य पञ्चदशेन वज्रेण द्विषन्तं पाप्मानं भ्रातृव्यं स्तृणाति। चतुर्दश-चतुर्दशोत्तरयोः। स ह स वज्र ऊनो नारम्भणः। - जै.ब्रा. १.३३१

*इदमहमिन्द्रज्येष्ठेभ्यो रुद्रेभ्यो यज्ञं प्रब्रवीमि। - आप.श्रौ.सू. ४.२.२

 

इन्द्र--

१. अग्निहोत्रेण दर्शपूर्णमासाभ्यामिन्द्रमसृजत । कौ ६,१५।

२. अतिष्ठा वा इन्द्रो देवतानाम् । काश ७, , , ६ ।

३. अथ य इन्द्रस्सा वाक् । जैउ १,११,,२।।

५. अथ यत्र (अग्निः) वर्षिष्ठं ज्वलति तद्धेन्द्रो भवति । काश ३, ,,१।।

११. अथ ह वै वैखानसा इत्यृषिका इन्द्रस्य प्रिया आसुः....तदिन्द्रो ह वै विखानाः। जै ३,१९० ।

१२. अथ हाभियुग्वानो नामाष्टौ देवानां सहचरा आसुरष्टौ पितॄणामष्टौ मनुष्याणामष्टावसुराणाम् । तेषां (असुराणाम् ) स्मेन्द्रो माययाऽष्टमो भवति वृत्रं जिघांसन् । जै २, १५५ ।

१५. अथो इन्द्रस्यैष आत्मा यन्महाव्रतम् । शांआ १.१ ।

२२. अर्धेन्द्राणि जुहोति तस्मादिन्द्रो देवतानां भूयिष्ठभाक् । काठ २१, ११ ।।

२३. अश्वरथेनेन्द्र अजिमधावत्तस्मात्स उच्चैर्घोष उपब्दिमान्क्षत्रस्य रूपम् । ऐ ४,९ ।

२७. अस्मिन्वा इदमिन्द्रियं प्रत्यस्थादिति । तदिन्द्रस्येन्द्रत्वम् । तै २,, १०,४ ।।

३१. इदमदर्शमिती ३। तस्मादिदन्द्रो नामेन्द्रो है वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते  परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवाः। ऐआ २,,; ऐउ १, ३, १४ ।

३२. इन्द्रं वयं शुनासीरमस्मिन् यज्ञे हवामहे । काठ २१, १४ ।

३४. इन्द्र आसीत्सीरपतिः शतक्रतुः । तै २,,,७ ।

३५. इन्द्र इति ह्येतमाचक्षते य एष (सूर्यः) तपति । माश ४,,, ११ ।।

३७. इन्द्र इन्द्रियेण (एवैनमवति) । तै १,,,६ ।।

३९. इन्द्र उ वै परुच्छेपः (प्रजापतिः [शांआ.J) । कौ २३,; शांआ १, १ ।।

४०. इन्द्र उ (इन्द्रो (गो.) वै वरुणः स उ वै पयोभाजनः । कौ ५, ; गो २,, २२; । ४१. इन्द्र उ वै वसुक्रः । शांआ १,३ । ।

४२. इन्द्र उ वै वातापिः स हि वातमाप्त्वा शरीराण्यर्हन्प्रतिपरैति । कौ २७,४ ।

४३. इन्द्र उ वै वेनः (षोडशी [कौ १७,; ४!) । कौ ८,; १७,; ४ ।।

४४. उज्जिति मन्त्राः -- इन्द्र एकादशाक्षरेण (क्षरया [काठ..) त्रिष्टुभमुदजयत् । तैसं ,,११,; काठ १४, ४ ।

४५ इन्द्र एष यदुद्गाता । जैउ १, , ,२ ।।

४७. इन्द्रः खलु वै श्रेष्ठो देवतानामुपदेशनात् । तै २, ,,३ ।

४८ इन्द्रः पशूनां प्रदाता । काठ १०,; ११,२ ।।

५० इन्द्रं देवताम् (प्रजापतिर्बाहुभ्यामेवोरसः असृजत) । जै १, ६८ ।।

५२ इन्द्रमच्छ सुता इम इतीन्द्रियस्य वीर्यस्यावरुध्यै । तां ११,१०,४। ।

इन्द्रमदेव्यो माया असचन्त स प्रजापतिमुपाधावत्तस्मा एतं विघनं (क्रतुम् ) प्रायच्छत्तेन सर्वा मृधो व्यहत। तां १९,१९,१ ।

५७. इन्द्रं बलेन ( अवकीर्णी प्रविशति)। जै १,३६२; तैआ २,१८,१ ।।

५८. इन्द्रं मध्ये करोति, वायुमभितः, प्राणापानयोर्विधृत्यै। इन्द्रियं वै व्यानः । क ४२,३ ।।

५९. इन्द्रश्च नः शुनासीरौ... । शुनासीरौइन्द्रवन्तौ हविरिदं जुषेथाम् । तै २,,,७ ।

६०. इन्द्रश्च वै नमुचिश्चासुरः समदधातां न नौ नक्तं न दिवाहनन्नार्द्रेण न शुष्केणेति तस्य  व्युष्टायामनुदित आदित्येऽपां फेनेन शिरोऽछिनत् । तां १२,,८।

६२. इन्द्रस्त्रिष्टुभा निधनवन्ति (सामान्यसृजत) । जै १, २९९ ।।

६३. इन्द्रस्त्वा रुद्रैर्दक्षिणतो रोचयतु त्रैष्टुभेन छन्दसा । तैआ ४,,१ ।।

६४, इन्द्रस्य क्रोडः (गौरमृगः [मै ३,१४,१३]) । मै ३,१४,१३, १५,; काठ ५३,६ ।

६६. इन्द्रस्य तृतीया (पुरोडाशः माश.)। मै ३,१५,; माश ४,,,२२ ।

६७. इन्द्रस्य त्वा जठरे सादयामि । गो २, ,२ ।।

६९. इन्द्रस्य त्वेन्द्रियेण व्रतपते व्रतेनादधामि । तै १,,,८ ।।

७४. इन्द्रस्य बृहत् (साम) । मै २,,७।

७६. इन्द्रस्य माध्यन्दिनं सवनम् । कौ १४,५ ।।

७७. इन्द्रस्य (विष्णोः ) युज्यः सखा । मै १,,१४,,,; काठ ३,; क २,१० ।

७९. इन्द्रस्य रोहिणी ( ज्येष्ठानक्षत्रमिति )। तै १,,,४।।

८१. इन्द्रस्य वा एतौ हरी । यदुभे बृहद्रथन्तरे। जै १, ३४३ । (तु. तां ९, , ८) । ८२. इन्द्रस्य वा एषा यज्ञिया तनूर्यद् यज्ञः । तैसं ३,,,३ ।।

८३. इन्द्रस्य वै मरुतः । कौ ५,,५ ।

८४. इन्द्रस्य (वरुणस्य) शतभिषक् (नक्षत्रम् )। तै १,,,५।।

८६. इन्द्रस्याहं विमृधस्य देवयज्ययाऽसपत्नो भूयासम् । काठ ५,१ ।।

८८. इन्द्रस्याहमिन्द्रियावतो देवयज्यया पशुमान् भूयासम् । काठ ५, १ ।

८९. इन्द्रस्येन्द्रियेणाभिषिञ्चामि । ऐ ८,७ ।।

९०. इन्द्रस्येन्द्रियेणेन्द्रियावान् भूयासम् । काठ ५,५ ।

९२. इन्द्रस्यैवैतच्छन्दो यत् त्रिष्टुप् । शांआ १,२ ।

९४. इन्द्रस्यौजसे स्वाहा । मै २, ,१२ ।।

९६. इन्द्रः सप्तहोता (होत्रा [तै २,,,J) । तै २,,,५  ३, , १ ।

९७. प्रवर्ग्यकर्मणि तानूनप्त्रम्-- इन्द्रः सर्वा देवता इन्द्रश्रेष्ठा देवाः । माश ३,, ,; (तु. जै १,३२१) ।

९८, इन्द्रः सुनीत्या सह मा पुनातु । काठसंक ९६: ६ ।।

१०१. इन्द्राद् बृहत् (सामापाक्रामत् ) । काठ १२,५।।

१०२. इन्द्राय कृण्वती भागम् इतीन्द्रियमेवास्मिंस् (यजमाने) तद्दधति । जै १,५८।

१०९. इन्द्राय नमस्त्रिष्टुभे नमः पञ्चदशाय नमो बृहते नमो ग्रीष्माय नमो दक्षिणायै दिशे  नमो व्यानाय नमो रुद्रेभ्यो नमः । काठ ५१,२ ।।

११०. इन्द्राय मन्युमत एकादशकपालं निर्वपेत् सङ्ग्रामे, मन्युना वै वीर्यं करोतीन्द्रियेण जयति । काठ १०,८ ।।

१११. इन्द्राय मन्युमते मनस्वते पुरोडाशमेकादशकपालं निर्वपेत् संग्रामे संयत्ते । तैसं २,,,२ ।

११३. इन्द्राय राज्ञे त्रयश्शितिपृष्ठाः (पशवः) । काठ ४९, ७ ।

११५. इन्द्राय सुत्राम्णे पुरोडाशमेकादशकपालम् । तै १,,,७।।

११६. इन्द्राय (+ राज्ञे काठ., तैसं.]) सूकरः । तैसं ५,,११,; मै ३,१४,२१; काठ ४७,१।।

११८. इन्द्राय स्वराजे (याधिराजाय) त्रयश्शितिभसदः (तिककुदः) । काठ ४९,७ । ११९, इन्द्राय हि सोम आह्रियते । तैसं ६,,,१ ।।

१२०. इन्द्रायांहोमुचे (+ एकादशकपालं निर्वपेदामयावी [काठ.J) । काठ १०,; तै १,,,७।

१२३. इन्द्रियम् (+ वा [मै ४,,१०; ,८ ४,; काठ., क.) इन्द्रः । मै ४,,; काठ २९,; क ४५,; ।।

१२५, इन्द्रेण देवाः (अन्वभूयन्त ) । काठ ३५, १५ ।।

१२८, इन्द्रो (एवैनम् ) ज्येष्ठानाम् (सुवते) । तै १,, ,१।।

१३०, इन्द्रो ज्येष्ठामनु नक्षत्रमेति । तै ३,, ,१ ।।

१३१. इन्द्रो ज्योतिर्ज्योतिरिन्द्र इति तदन्तरिक्षलोकं लोकानामाप्नोति माध्यन्दिनं सवनं यज्ञस्य ।। कौ १४,१ ।।

१३२. इन्द्रो देवता (राजन्यस्य) । तां ६,, ८ ।

१३५. इन्द्रो देवानामोजिष्ठः । काठ ११, ३ ।।

१३६. इन्द्रो देवानां भूयिष्ठभाक् । तै ५,,५।।

१३८. इन्द्रो धाना अत्तु । क ४५, २ ।

१४०. इन्द्रो नौधसम् (साम) । जै १,३३५।।

१४५. इन्द्रो मरुद्भिः (व्युदक्रामत् )। मै २,,; माश ३, ,,१ ।

१४७. इन्द्रो माध्यन्दिनं  सवनम् । तै ५,,६।।

१४८. इन्द्रो मृधां विहन्ता । कौ ४,१ ।।

१४९. इन्द्रो मे बले श्रितः । तै ३, १०,,८ ।

१५०, इन्द्रो यजमानः । काठ ७, १०, ३७,८ ।।

१५१. इन्द्रो यज्ञस्य देवता ( नेता [माश ४,,,१५]) । ऐ ५,३४;,; माश २,,,११;

, ,,१५।।

१५३. इन्द्रो यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छत्तेषां त्रय उदशिष्यन्त रायोवाजो बृहद्गिरिः पृथुरश्मिः । तां ८,,४ ।।

१५४. इन्द्रो यतीन् सालावृकेयेभ्यः प्रायच्छत्तमश्लीला वागभ्यवदत् स प्रजापतिमुपधावत्तस्मा

एतमुपहव्यं प्रयच्छत् । तां १८,,९।

१५५. इन्द्रो यतीन् सालावृकेयेभ्यः प्रायच्छत्तमश्लीला वागभ्यवदत्सोऽशुद्धोऽमन्यत स एते शुद्धाशुद्धीये (सामनी) अपश्यत्ताभ्यामशुध्यत् । तां १९,,७ (तु. तां १४,११,२८) । १५६. इन्द्रो यतीन् सालावृकेयेभ्यः प्रायच्छत्तेषां त्रय उदशिष्यन्त पृथुरश्मिर्बृहद्गिरी रायोवाजः ।। तां १३, ,१७ ।।

१५७. इन्द्रो रुद्रैः (उदक्रामत्) । ऐ १,२४ ।

१५९ इन्द्रो वज्रस्योद्यन्ता षोडशः । जै १, १९५; ३३१ ।

१६१. इन्द्रो वा अधृतश्शिथिल इवामन्यत, सोऽग्नौ चैव बृहस्पतौ चानाथत, तमेतयेष्ट्यायोजयतां यदाग्नेयस्तेज एवास्मिंस्तेन पुरस्तादधत्तां, यदैन्द्र (पुरोडाशः) इन्द्रियमेवास्मिं स्तेन मध्यतोऽधत्तां, यद् बार्हस्पत्य उपरिष्टादेवास्मिंस्तेन ब्रह्मवर्चसमधत्ताम् । काठ ११, १ ।

१६२. इन्द्रो वा अश्वः । कौ १५, ४।।

१६३. इन्द्रो वा असुरान् हत्वाऽपूत इवामेध्योऽमन्यत, सोऽकामयत शुद्धमेव मासन्तं शुद्धेन साम्ना स्तुयुरितिः ....''ततो वा इन्द्रः पूतः शुद्धो मेध्योऽभवत् । जै ३,२२८ ।।

१६५. इन्द्रो वा एतस्या (सृतवशायाः) अजायत । काठ १३,४ ।।

१६८. इन्द्रो विश्वजिदिन्द्रो हीदं सर्वं विश्वमजयत्। कौ २४,१ ।

१६९. इन्द्रो वृत्रं वज्रेणाध्यस्य नास्तृषीति मन्यमानः स ऊतीकानेव प्राविशत् । तस्मै

एवोतिमविन्दन् । जै १,३५४ ।

१७१. इन्द्रो वृत्रं हत्वा देवताभिश्चेन्द्रियेण च व्यार्धत् । तै १,,,७।

१७२. इन्द्रो वृत्रमहन् (एकविंशेन षोडशिना) । जै १,१९५ ।

१७३. इन्द्रो वृत्रहेन्द्रोऽभिमातिहेन्द्रो वृत्रतूरुन्नीयमानः (सोमः) । काठ ३४, १५ ।

१७५. इन्द्रो वै गोपाः (चतुर्होता [तै.J) । ऐ ६, १०; गो २,, २०; तै २, ,,३ ।।

१७७. इन्द्रो वै त्रिशिरसं त्वाष्ट्रमहन् । तां १७, , १ ।।

१७८. इन्द्रो वै त्वष्टा । ऐ ६,१०। ।

१८०, इन्द्रो वै देवानामधिराजः । मै २,,११ ।

१८१. इन्द्रो वै देवानामोजिष्ठो बलिष्ठः (+सहिष्ठः सत्तमः पारयिष्णुतमः [ऐ.) । कौ ६, १४,  गो २,,; ऐ ७,१६,,१२।।

१८२. इन्द्रो वै प्रदाता स एवास्मै यज्ञं प्रयच्छति । कौ ४,२ ।

१८३. इन्द्रो वै प्रासहस्पतिस्तुविष्मान् । ऐ ३,२२ ।

१८५. इन्द्रो वै मरुतः क्रीडिनः । गो २,,२३ ।।

१८६, इन्द्रो वै मरुतः सान्तपनाः । गो २,१.२३ ।

१८९. इन्द्रो वै यतीन् सालावृकेयेभ्यः प्रायछत् (+ तेषां वा एतानि शीर्षाणि यत् खर्जूराः ।  मै १,१०,१२; काठ ८,५। (तु. १५३-१५६ इहोद्धारा अपि) ।

१९०, इन्द्रो वै युधाजित् । तां ७,,१४ ।।

१९१. इन्द्रो वै वरुणः स उ वै पयोभाजनः । गो २,,२२ ।

इन्द्रो वै वाजी । ऐ ३,१८ ।।

१९२. इन्द्रो वै विलिस्तेङ्गां दानवीमकामयत, सोऽसुरेष्वचरत् स्त्र्येव स्त्रीष्वभवत् पुमान् पुंसु स निर्ऋतिगृहीत इवामन्यत । काठ १३, ५।।

१९३. इन्द्रो वै वृत्रं हत्वा महान् (विश्वकर्मा [ऐ.J) अभवत् । ऐआ १.१,; ऐ ४,२२ । १९४. इन्द्रो वै वृत्रं हत्वा स महेन्द्रोऽभवत् । क ४४,३ ।

१९५. इन्द्रो वै वृषा (वृत्रहा कौ]}। काठ २७, ; क ४२,; तां ९,,; कौ ४, ३ ।।

१९६. इन्द्रो वै वेधाः । ऐ ६,१०; गो २,,२० ।

१९७. इन्द्रो वै श्रेष्ठी देवतानाम् । जै १, ३०४ ।

१९८. इन्द्रो वै संग्रामस्य विनेतेन्द्रो विजापयिता । काठ १३,५ ।।

२०३. इन्द्रो हि देवानां वसु । तैसं २,,,७ ।।

२०४. इन्द्रो हि षोडशी । काठ १४, ; माश ४, , , १४ ।

२०५. इन्द्रौजसां पते । तै ३, ११,,; ।।

२०८. इयं (पृथिवी) वा इन्द्रो मघवा विरप्शी । ऐ ३,३८।।

२१२, उष्णिक्ककुब्भ्यां वा इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छद् गायत्र्योस्तिष्ठन् । जै १,१५८ ।।

२१३. ऋक्सामे वा इन्द्रस्य हरी । मै ३,१०,; ,,; ऐ २,२४; तै १,,,९।

२१४. ऋचश्च सामानि चेन्द्रः (स्वभागरूपेणाभजत) । यजूंषि विष्णुः । माश ४, ,,३ ।

२१५. ऋतमसि सत्यं नामेन्द्रस्याऽऽधिपत्ये क्षेत्रं मे दाः । तैसं ३,,, १ ।।

२१६. ऋभवो वा इन्द्रस्य प्रियं धाम । तां १४, ,५ ।।

३१७. ऋषभमिन्द्राय (+सुत्राम्ण आलभते [माश.]) । मै ३,३१,; माश ५,,,१।

२१८. ऋषभेण क्रीणाति, सेन्द्रमेव क्रीणाति । मै ३,७,७ ।

२१९. एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भं महिमानमिन्द्रम् । तेन दस्यून् व्यसहस्त देवा हन्ताऽसुराणामभवच्छचीभिः । तैसं ४, ,११, ३ ।।

२२०. एतद् वा आसाम् (शक्वरीणाम् = महानाम्नीनाम् ) एकं नाम यद् इन्द्राः । जै ३, १०८।।

२२३. एतस्यां (एकाष्टकायाम् ) वा इन्द्रोऽजायत, स देवानां वीर्यावतमः तस्माद् य एकाष्टकायां पशूनां जायते स वीर्यावान् भवति । काठ १३,३ ।

२२५. एते इन्द्रस्यान्त्ये तन्वौ यदर्कवती । काठ १०,९ ।

२२६. एतेन (पारुच्छेपेन रोहिताख्येन छन्दसा) वा इन्द्रः सप्त स्वर्गाँलोकानरोहत् । ऐ ५, १० ।

२२७. एष इन्द्र एष प्रजापतिः (य एष तपति) । जै १,८ ।।

२३२. एष वा एतर्हीन्द्रो यो यजते । तै १,,, ३ । ।

२३४. एषा वा इन्द्रस्य भेषजा तनूर्यदंहोमुक् । मै २,,१०।।

२३५. एषा ह खलु वै यजमानस्य नेदिष्ठं देवता यदिन्द्रः । जै १,२०० ।।

२३६. एषो (इन्द्रः)ऽर्धभाग्देवतानाम् । मै ३, , १। 

२३७. ओकः सारी वा इन्द्रः । ऐ ६,१७; २२; गो २,,१५।

२३८. ओकः सारी हैवैषामिन्द्रो भवति यथा गौः प्रज्ञातं गोष्ठम् । गो २,,४ ।

२३९. ओजस्विनी नामासि दक्षिणा दिक, तस्यास्त इन्द्रोऽधिपतिः, पृदाकुः । तैसं ५,, १०, १ ।

२४०. ओजो वा इन्द्रः । तैसं ५, , , २ ।।

२४१. ओहो वै नामेन्द्रः । जै १, ३३८ ।।

२४२. कालकञ्जा वै नामासुरा आसन् । ते सुवर्गाय लोकायाग्निमचिन्वत । पुरुष इष्टकामुपादधात् पुरुष इष्टकाम् । स इन्द्रो ब्राह्मणो ब्रुवाण इष्टकामुपाधत्त । एषा मे चित्रा नामेति । ते सुवर्गलोकमाप्रारोहन् । स इन्द्र इष्टकामवृहत् । तेऽवाकीर्यन्त येऽवाकीर्यन्त । त ऊर्णनाभयो ऽभवन् । द्वावुदपतताम् । तौ दिव्यौ श्वानावभवताम् । तै १,,, ४-६ । (तु. मै १,,; काठ ८,१) ।।

२४३. किं खलु वै तेऽस्तीति (प्रजापतिरिन्द्रम् ) अब्रवीत्। 'स्तो न्वै म इमौ प्राणापानौ' इति (इन्द्रः प्रत्युवाच) । जै २,४०९ ।।

२४४. क्षत्रं वा इन्द्रः मै १,१०,१३;,,; काठ १०,११; ११,; २९,; क ४६, ; कौ १२,; तै ३,,१६,; माश २,,, २७; ,,,;,,,१६;,,,६ ।।

२४५. क्षत्रमिन्द्रः । जै १,१८२ ।।

२४७. चत्वारो वरा देया ब्रह्मण उद्गात्रे होत्रेऽध्वर्यवे । एते वै यज्ञस्येन्द्राः । तानेव प्रीणाति । काठ ३५,१६; क ४८,१४ ।।

२५१. जगृह्मा ते दक्षिणमिन्द्र  हस्तम् । मै ४,१४,८ ।।

२५४. तं हेन्द्र उवाच विश्वामित्र वरं वृणीष्वेति स होवाच विश्वामित्रस्त्वामेत्र विजानीयामिति, द्वितीयमिति, त्वामेवेति, तृतीयमिति, त्वामेवेति । शांआ १,६।।

२५६. त एकविंशमेवायतनमचायंस्त इन्द्रमजनयन् । काठ ९,११ ।।

२५७. त एनम् (इन्द्रम् ) अध्यक्रीडन् (मरुतः) । तै १,,,५।।

२५९, ततो वा इदमिन्द्रो विश्वमजयद्यद्विश्वमजयत्तस्माद्विश्वजित् । तां १६,,५ ।।

२६०. ततो वा इन्द्र उदतिष्ठत् , सोदीची दिक् । तैआ १, २३,६।।

२६१. ततो वा इन्द्रो देवानामधिपतिरभवत् । तै २.२,१०,३।।

२६२. ततो हैव गौरो भूत्वा (इन्द्रः) अर्णवमवचस्कन्द । जै २,७९ ।

२६४. तदिन्द्रं यजमानमकृत् । जै १, ३३१ ।।

२६५. तम् (दशरात्रम् , इन्द्रः ) आहरत् तेनायजत, ततो वै सोऽन्याभिर्देवताभिर्व्यावृतमगच्छत् । तैसं ७,,,२ ।।

२६६. तमिन्द्र उवाच (विश्वामित्रम् ) प्राणे वा अहमस्म्यृषे प्राणस्त्वम् प्राणः सर्वाणि भूतानि । ऐआ २,,३ ।।

२६७, तमिन्द्र उवाच ( प्रतर्दनं दैवोदासिम् ) 'मामेव विजानीह्येतदेवाहं मनुष्याय हिततमं मन्ये । शांआ ५,; कौउ ३,१।

२६९. तयैव (इष्ट्या ) अस्मिन् ( इन्द्रे ) तेज इन्द्रियं ब्रह्मवर्चसमधत्ताम् (अग्नीषोमौ )। तैसं २,३.३,१-२ ।

२७०. तव स्तोमेनेतीन्द्रम् (अब्रुवन् देवाः)! जै १,२११ ।

२७१. तस्मादाहुरिन्द्रा वागिति । माश ११,, ,१८ ।।

२७२. तस्माद् (प्रजापतेः) देवता व्युदक्रामस्तमिन्द्र एव देवतानां नाजहात्। जै २, ४०९।

२७३. तस्मादाहेन्द्रो ब्रह्मेति । कौ ६,१४ ।।

२७४. तस्मै (इन्द्राय) शक्वर्यः प्रायच्छत् (प्रजापतिः)। ततो वा इन्द्रो वृत्रमहन् । जै १, १९४ ।

२७५. तस्य ह (क्षत्रियस्य) दीक्षमाणस्येन्द्र एवेन्द्रियमादत्ते । ऐ ७, २३ ।।

२७६. तस्यासौ (इन्द्रस्य, द्यु- ) लोको नाभिजित आसीत्तं (इन्द्रः) विश्वकर्मा भूत्वाभ्यजयत् । तै १,,,३ ।।

२७७ तस्येन्द्रो वम्रिरूपेण ( अरुणकेतुकस्याग्नेः ) धनुर्ज्यामच्छिनत् स्वयं तदिन्द्रधनुरित्यज्यम् । अभ्रवर्णेषु चक्षते । एतदेवशंयोर्बार्हस्पत्यस्य । एतद्द्रुस्य धनुः रुद्रस्य त्वेव धनुरार्त्निः । शिर उत्पिपेष । स प्रवर्ग्योऽभवत् । तै १,,२।।

२७९. तान् (पशून् ) इन्द्रः पञ्चदशेन स्तोमेन नाप्नोत् । तै २,, १४,२ ।

२८०. ताभ्यः (महानाम्नीभ्यः= शक्वरीभ्यः) तत् (स्वंनाम) प्रायच्छत् तस्मादेता इन्द्रा नामैतद्ध वा आसां प्रियं गुह्यं नाम यदिन्द्राः । जै ३,१११।।

२८१. तामब्रुवन् (गाम् ) इन्द्राय उदेहि:::इति सा शबली पष्ठौह्युदैत् सैषेन्द्रेष्या दीयते । तां २१,,५ ।।

२८३. तिस्रो म (इन्द्रस्य) इमास्तनुवो वीर्यावतीः इयमंहोमुगियं विमृधेयमिन्द्रियावती । तैसं २,,,१।।

२८४. तेज एवास्मिन् (इन्द्रे) अग्निराग्नेयेनादधादिन्द्रियं सोमः सौम्येन । काठ १०,२ ।

२८५. ते ये शतं देवानामानन्दाः । स एक इन्द्रस्यानन्दः । तैआ ८,,; तैउ २,, ३ ।।

२८६. तेषां है स्मेन्द्रो मेधातिथेर्मेषस्य रूपं कृत्वा सोमं व्रतयति । जै ३,२३४ ।।

२८८. (इन्द्र उवाच) त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुर्मुखान् यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छं बह्वीः सन्धा अतिक्रम्य दिवि प्रह्लादीयानतृणमहमन्तरिक्षे पौलोमान् पृथिव्यां कालकाञ्जांस्तस्य मे तत्र न लोम च नामीयते । कौउ ३,; (तु. शांआ ५,१) ।

२८९. त्रिष्टुप्छन्दस्तद्धिरण्यमिन्द्रो देवता । मै २, १३, १४; काठ ३९, ४ ।।

२९०. त्रिष्टुब्वा इन्द्रस्य स्वं छन्दः । काठ ११,३।।

२९१. त्रैष्टुभ इन्द्रः । कौ ३,; २२,; जै १, ३३१ ।

२९६. देवलोको (पञ्चदशो [जै.J) वा इन्द्रः । कौ १६,; ,२० ।

३०२. द्वौ तव भागौ इतीन्द्रम् (प्रजापतिः) अब्रवीत् । जै २, २४३ ।।

३०३. धर्म इन्द्रो राजेत्याह तस्य देवा विशस्तऽइमऽआसत इति श्रोत्रिया अप्रतिग्राहका उपसमेता भवन्ति तानुपदिशति सामानि वेदः सोऽयमिति । माश १३, ,,१४ ।

३०५. नमुचिर्ह वै नामासुर आस तमिन्द्रो निविव्याध तस्य पदा शिरोऽभितष्टौ स यदभिष्ठित उदबाधत से उच्छ्वङ्कस्तस्य पदा शिरः प्रचिच्छेद ततो रक्षः समभवत् । माश ५,,,९।

३०६. न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यं पश्यते । जैउ १,१४,,६ ।।

३०७. नित्यास्ते (अग्नि-वायु-संवत्सराः) ऽनुचरास्तव (हे इन्द्र ) । तैआ १,१२,३ ।।

३०९. पुत्रवती दक्षिणत इन्द्रस्याधिपत्ये, प्रजां मे दाः । मै ४,, ; तैआ ४,, ३ ।

३१०. प्रजापतिर्वै देवेभ्यो भागधेयानि व्यादिशत्, तदिन्द्रियमत्यरिच्यत, तदिन्द्रोऽब्रवीन्मयीदमस्त्विति, तदस्मिनदधात् । काठ १०, १० ।

३१२. प्राण (+एव [माश १२,,,१४]) इन्द्रः । माश ६,,,२८; १२,,, १४ ।

३१३. प्राणापानौ वा अस्य (इन्द्रस्य) हरी तौ हीदं सर्वं हर्त्तारौ हरतः । जै २,७९ ।। ३१४. बल इन्द्रम् (प्रजापतिरावेशयत् ) । शांआ ११, १।।

३१५. बृहतीमिन्द्राय वाचं वद । काठ २,११; क २,; ४०,२।

३१६. बृहस्पतिर्विश्वकर्मेन्द्रो गन्धर्वस्तस्य मरुतोऽप्सरसा ओजो नाम । मै २,१२, २ । ।

३१७. अतिग्राह्य मन्त्राः -- अग्ने तेजस्विन् .... इन्द्रौजस्विन्न् ओजस्वी त्वं देवेषु भूया ओजस्वन्तम् माम् आयुष्मन्तं वर्चस्वन्तम् मनुष्येषु कुरु ब्रह्मणश् च त्वा क्षत्रस्य च
ओजसे जुहोमि.... सूर्य भ्राजस्विन्...। तैसं ,,,१-२

३१९. मन्युना वै युजेन्द्रोऽसुरानवाबाधत । मै ४, ,३ ।।

३२०. मयीन्द्र इन्द्रियं दधातु । तैआ ४,४२,२ (तु. तां १,,; माश १, ,,४२)।

३२२. मरुत्वान् वा इन्द्रः । जै १,११६ ।

३२४. महाँ इन्द्रो य ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमाँ इव...वावृधे । काठ ४,; क ३, ६ ।।

३२५. महानाम्नीभिर्वा इन्द्रो वृत्रमहन् । कौ २३,२ ।।

३२६. मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च (अजायत) । तैआ ३, १२,६ ।।

३२७. मेधातिथेर्ह मेषो भूत्वा (इन्द्रः) राजानं (सोमम् ) पपौ। जै २, ७९ । ।

३२८. य एवासौ (आदित्यः)तपत्येष एवेन्द्रः । जै १, ३३८ ।।

३२९. यतरस्मिन् खलु वै संग्राम इन्द्रो भवति स जयति । मै १, ९.६ ।।

३३०. यतरेषामिन्द्रो भवति ते संग्रामं जयन्ति । काठ ९,१४ ।।

३३२. यत्पुरस्ताद्वासीन्द्रो राजा भूतो वासि। जैउ ३,, ,२ ।।

३३३. यत्र देवास्तदिन्द्रः । मै ४,,६ । ।

३३४. यत्र वा अद इन्द्रं  सोमोऽत्यपवत ततः शार्दूलः समभवत् तस्मादाह सोमस्य त्विषिरसीति । काश ७,,,३। ।

३३६. यत्रेन्द्रं देवताः (यज्ञेषु) पर्यवृन्जन् , (यतः स इन्द्रः) विश्वरूपं त्वाष्ट्रमभ्यमंस्त वृत्रमस्तृत यतीन्त्सालावृकेभ्यः प्रादादरुर्मघानवधीद् बृहस्पतेः प्रत्यवधीदिति तत्रेन्द्रः सोमपीथेन व्यार्द्धत । ऐ ७,२८ ।।

३३७. यत्रेन्द्रस्य मेषस्य हविषः प्रिया धामानि ...तत्रैतान्  प्रस्तुत्येवोपस्तुत्येवोपावस्रक्षत् । काठ १८, २१ । ।

३४०. यदा वृत्रमतरच् शूरा इन्द्रो अथैकराजो अभवज्जनानाम् । मै ४,१४,१३ ।।

३४२. यदिन्द्रोऽपिबच्छचीभिः । अहं तस्य मनसा शिवेन । सोम राजानमिह भक्षयामि । तै १,,,३ ।।

३४३. यदिन्द्रो युधाजीवन्नेतत्सामापश्यत् तद् यौधाजयस्य यौधाजयत्वम् । जै ६,१२२ ।

३४४. यदेकादशेऽहन् प्रवृज्यते । इन्द्रो भूत्वा त्रिष्टुभमेति । तैआ ५, १२,३ ।।

३४५. यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमीरुत स्युः । न त्वा वज्रिन् सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी । काठ १२,१५।।

३३६. यद्ध वा (इन्द्रः) असुरैर्महासंग्रामं संयेते, तद्ध वेदान् निराचकार । तान् (वेदान् ) ह विश्वामित्रादधिजगे । ततो हैव कौशिक ऊचे । जै २, ७९ ।।

३४७. यद्वा इदं किंच, तदिन्द्रस्य परिषूतम् । काठ ३१, १ । ।

३४८. यश्छन्दसामृषभो विश्वरूपः । छन्दोभ्योऽध्यमृतात्संबभूव स मेन्द्रो मेधया स्पृणोतु (प्रीणयतु) । तै ७,,; तैउ १,,१ ।

३४९. या रोहिणी तामरुणा, तां गौरी, तां बभ्रूः । तदिन्द्रा उदाजत वसुर्नाम रूपं पशूनाम् । मै ४,,४ ।

३५०. यावद्ध वा इन्द्र एतमात्मानं न विजज्ञे तावदेनमसुरा अभिबभूवुः, स यदा विजज्ञेऽथ हत्वा ऽसुरान्विजित्य सर्वेषां च देवानां श्रैष्ठ्यं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्यैत् । शांआ ६, २०; कौउ ४,२० ।

३५१. यासामिन्द्र उदाजत वसु नाम रूपं पशूनामुषसं धाम पश्यमानः तासामयं योनिः । मै ४,,११ ।

३५२. युक्ता ह्यस्य (इन्द्रस्य) हरयः शतादशेति । सहस्रं हैत आदित्यस्य रश्मयः (इन्द्रः =आदित्यः) । जैउ १,१४,,५ ।।

३५४. योऽयं चक्षुषि पुरुष एष इन्द्रः । जैउ १,१४,,१० ।

३५५. यो वै कश्च यज्ञस्तायत इन्द्रस्यैव सः । काश ३,,, ४ ।।

३५७. यो ह खलु वाव प्रजापतिस्स एवेन्द्रः (स उ वेवेन्द्रः [तै.J) । काठ ३३,; तै १, ,,५ ।।

३५९. रेत ( शिश्नम् [माश १२,९.१,१६]) इन्द्रः । माश १२, ,,१६:१७।।

३६०, वज्रः पञ्चदशः इन्द्रो वज्रस्योद्यन्ता षोडशः । जै १,३३१ ।।

३६१. वाग् (+एव [जै.]; वा कौ.J) इन्द्रः । कौ २,७: १३,; जै २,७७; माश ८,,,६ ।।

३६२. वाजिमद्वा इन्द्रस्य रूपम् । ऐआ १, ,१ ।।

३६३. वायाविन्द्रो वैकुण्ठः । शांआ ६,; कौउ ४,२ ।

३६६. विश्वानि मे कर्माणि कृतान्यासन्निति विश्वकर्मा हि सोऽभवद् (इन्द्रः) वृत्रं  हत्वा । मै १,१०,१६ । ।

३६७. वीर्यम् (+वा मै २,,; गो., तां.) इन्द्रः । मै १,,; ,,;,; काठ ९,११; गो २,, ; तां ९, , ; ; तै १,,,२।।

३६८. वृद्धानामिन्द्रः प्रदापयिता । तै १,,,३ ।।

३६९ वृद्धाम् (प्रजाम् ) इन्द्रः प्रयच्छति । तैसं २,,,२ ।

३७०. वृषणश्वस्य ह मेनस्य मेनका नाम दुहितास तां  हेन्द्रश्चकम् । ष १, १ ।

३७१. वृषणश्वस्य ह मेना भूत्वा मघवा (इन्द्रः) कुल उवास । जै २,७९।।

३७२. वृषण्वद्वा इन्द्रस्य रूपम् । ऐआ १,,१ ।।

३७३. वृषा वा इन्द्रः । कौ २०, ३ ।

३७४. वैखानसा वा ऋषय इन्द्रस्य प्रिया आसंस्तान् रहस्युर्देवमलिम्लुङ् मुनिमरणेऽमारयत् । - तां १४,,७।

३७६. स (इन्द्रः) आत्मन एवाधि तृतीयसवनं निरमिमीत। जै १,१५६ ।।

३७७ स इन्द्र आत्मनः शीतरूरावजनयत् , तच्छीतरूरयोर्जन्म । तैसं २, ,,३ ।

३८०. स (इन्द्रः) एतमिन्द्राय ज्येष्ठायै ( ज्येष्ठानक्षत्राय) पुरोडाशमेकादशकपालं निरवपन्महाव्रीहीणां ततो वै स ज्यैष्ठ्यं देवानामभ्यजयत् । तै ३, , , २।।

३८१. स (इन्द्र:) एतं माहेन्द्रं ग्रहमब्रूत माध्यन्दिनं सवनानां निष्केवल्यमुक्थानां त्रिष्टुभं छन्दसां पृष्ठं साम्नाम् । ऐ ३,२१।

३८२, स एतेन (आदित्य = प्राण-) रूपेण सर्वा दिशो विष्टोऽस्मि तस्य मे (इन्द्रस्य)ऽन्नं मित्रं दक्षिणं तद्वैश्वामित्रमेष तपन्नेवास्मीति होवाच । ऐआ २, , ३ ।।

३८३. स एषोऽपहतपाप्मा तपति (आदित्यः) । एष (आदित्यः) ह वा इन्द्रः । जै २,१३४ ।

३८५. सत्यं हीन्द्रः । कौ ३, ; शांआ ५,१।।

३८६. स प्रजापतिरिन्द्रं ज्येष्ठं पुत्रमपन्यधत्त नेदेनमसुरो बलीयांसोऽहन्निति । तै १,,, १ ।।

३८७. स प्रजापतिरेतान् दश ऋषभानपश्यदथो आहुरिन्द्रोऽपश्यदिति, तानैन्द्रानलभत, तैरस्मिन् ( इन्द्रे = आदित्ये) इन्द्रियाणि वीर्याण्याप्त्वादधात् । मै २,,१०।।

३८८. स (परमात्मा) ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । तैआ १०, ११ । ३९०. समिन्द्रो रातहव्यो मरुद्भिः (नोऽव्यात् )। मै ४,१२,; काठ १०, ३७ ।

३९२. स यस्स इन्द्र एष एव स य एष (सूर्य्यः) एव तपति । जैउ १,,,, १०,,५ ।

३९४. स यस्स इन्द्रस्सामैव तत् । जैउ १,१०,, १ ।।

३९५. स यो मनसश्च वाचश्च स्वरो जायते स इन्द्रः । जै १,३२०-३२१ ।।

३९९. सह (सूर्यो वा [काठ ७,४] ) इन्द्रः । काठ ७,; २९,; क ४६,२।।

४००, स ह स सर्वजिदेव स्तोमः । इन्द्र एव सः । स हीदं सर्वमजयत्। जै १, ३१२ ।

४०१. सेना वा इन्द्रस्य प्रिया जाया वावाता प्रासही नाम । ऐ ३,२२ (तु. गो २,,९) । ४०२. सोऽकामयत (प्रजापतिः) इन्द्रो मे प्रजायां  श्रेष्ठः स्यादिति तामस्मै स्रजं प्रत्यमुञ्चत्ततो  वा इन्द्राय प्रजाः श्रैष्ठ्यायातिष्ठन्त तच्छिल्पं पश्यन्त्यः । तां १६,,३।।

४०३. सोऽग्रं(इन्द्रः) देवतानां पर्येत् । अगच्छत स्वाराज्यम् । तै १, , ,२ ।

४०४. सो ऽब्रवीत् (इन्द्रो देवान् ) तिस्रो म इमास्तन्वो वीर्यावतीस्ता मे प्रीणीताथैतान् (असुरान्) अभिभविष्याम इति, ता वै ब्रुहीत्यब्रुवन् (देवाः) इयं विमृधेत्यब्रवीद् (इन्द्रः ), इयमंहोमुगियमिन्द्रियावतीति । त इन्द्राय विमृधायैकादशकपालं निरवपन्निन्द्रायांहोमुच एकादशकपालमिन्द्रायेन्द्रियवत एकादशकपालम् । काठ १०,१०।

४०५. सो ऽब्रवीद् (इन्द्रः) अहं विश्वाभ्या आशाभ्या इति । मै ४,,४ ।

४०६. सोऽब्रवीद् (इन्द्रः) उग्रं साम्नो वृणे श्रियमिति । जैउ १,१६,,८ ।

४०७. स्तनयद्वा इन्द्रस्य रूपम् । ऐआ १, ,१।।

४०९. स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः (दधातु) । तैआ १, , , ।।

४११. हरिव आगच्छेति पूर्वपक्षापरपक्षौ वा इन्द्रस्य हरी ताभ्यां  हीदं सर्वं हरति । ष १,१।।

४१२. हरिवाँ इन्द्रो धाना अत्तु । ऐ २,२४ ।।

 [न्द्र- अंहस् -३; अक्षर-२; अक्षि-३; अग्नि ६३३; अग्नीषोम-९; ११; २२; ३३; अन्तरिक्ष-९३; अन्नाद्य - ३; अप्- २६६; अपूप- १; अभिमातिहन्- १; अरुण- २; अर्कवती-; अर्काश्वमेधवत् -; अश्विन्- ४०; अहल्या-; अहोरात्र- २६; आदित्य- २७: ४४; ६०; १७८; ३१८; ३४२; ३५३; ३५४;

आमयाविन्- ८; आहनीय- १२; आहुति- १४ द्र.]।।

इन्द्रघोष

१. इन्द्रघोषस् ( षास् [काठ.J) त्वा वसुभिः (सवः काठ.]) पुरस्तात् पातु (न्तु काठ.J)। तैसं १, ,१२,; काठ २,; माश ३,,,४ (तु. मै ३,,; क २,३) ।

२. इन्द्रघोषा वो वसुभिः पुरस्तादुपदधताम् । तैआ १,२०,१।।

इन्द्र-तम- मधु हुतमिन्द्रतमेऽअग्नाविति मधु हुतमिन्द्रियतमेऽग्नावित्येवैतदाह । माश १४,,,४२ ॥ [ म- अग्नि- ३९६; ५९१ द्र. ]।।

इन्द्र-तुरीय- स इन्द्रस्तुरीयमभवत् । यदिन्द्रस्तुरीयमभवत् । तदिन्द्रतुरीयस्येन्द्रतुरीयत्वम् । तै १,,,३ ।।

इन्द्र-नक्षत्र- एता वाऽइन्द्रनक्षत्रं यत्फल्गुन्यः । माश २,,,११ ।।

इन्द्र-निहव- मन इन्द्रनिहवः । कौ १५, ३ ।

इन्द्र-योनि- अन्तरेण तालुके । य एष स्तन इवावलम्बते । सैन्द्रयोनिः । यत्रासौ केशान्तो  विवर्तते । व्यपोह्य शीर्षकपाले । तैआ ७,,; तैउ १,,१।।

इन्द-प्रजापति- इन्द्रप्रजापती (ब्रह्मलोकस्य) द्वारपालौ । शांआ ३, ; कौउ १,३ ।

 

 

 

वैदिक दर्शन

-    डा. फतहसिंह

पृ. १३५

(च) इन्द्र-हम देख चुके हैं कि पिण्डाण्ड में इन्द्र के अन्तर्गत सारी कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों की देव-शक्तियां आ जाती हैं। उसके बिना ये सारे देवता व्यर्थ हैं । इसी प्रकार ब्रह्माण्ड में भी इन्द्र के अन्तर्गत अग्नि तथा सोम दोनों आ जाते हैं। अग्नि अपने दाहकत्व गुण द्वारा पिण्डाण्ड तथा ब्रह्माण्ड दोनों को उष्णता और पाचकता देकर क्रिया-शक्ति प्रदान करता है । सोम अपने प्रकाशत्व गुण द्वारा पिण्डाण्ड में 'मनोमय को संचारीभाव, स्थायी भाव आदि । संवेद तथा संवेग देकर तथा अन्नमय को शरीरव्यापी शुक्र' ( वीर्य ) का प्रकाश देकर 'इच्छा-शक्ति जुटाता है। उसी तरह वह ब्रह्माण्ड में सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि के स्वः' रूपी मनोमय को उज्ज्वल प्रकाश देता है और स्थूल पृथिवी तथा अन्तरिक्ष को वही दिव्य प्रकाश जल में कृष्ण बनाकर देता है।  अतः जिस प्रकार पिण्डाण्ड में कर्मेन्द्रियों की इन्द्रशक्ति के अन्तर्गत अग्नि' तथा ज्ञानेन्द्रियों को इन्द्रशक्ति के अन्तर्गत संवेदात्मक सोम' आ जाता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्ड के इन्द्र में अग्नि की उष्णता तथा दाहकता द्वारा प्राप्त विश्व की सारी क्रियाशक्ति और सोम के प्रकाशत्व द्वारा सम्पादित सूर्य आदि का उज्ज्वल प्रकाश तथा उसका जल रूप में कृष्णीकृत सोम दोनों ही आ जाते हैं। अतः वैश्वानर अग्नि इन्द्र के अश्वों में से एक है और इन्द्र के भीतर सोम विद्यमान बताया गया है ( १०, ४८, १० ) इन्द्र ही सूर्यमनु तथा सोम रूप धारण करता हुआ ( ४, २६, ; १०,६६, २) कहा गया है। इन्द्र की सूर्यरूप में पूजा की जा सकती है (४, ३. ५-६ ), क्योंकि इन्द्र का अनीक' ( चेहरा ) यथार्थ में सूर्य का ही है (१०, ४८, ३) और इन्द्र स्वयं सूर्य ही है ( श० ब्रा० १, , , १८ तै. सं ० ४, १२) तथा सूर्य के तीव्रगामी अश्वों के साथ विश्व भर में पर्यटन (१०, १९, ७ ) करता है। अतः इन्द्र सुनहरे रंग का है ( १, , २,  ८, ५५, ; , ३४, ४ ) और वह अत्यन्त सुन्दर रूप सूर्य की प्रभा धारण कर लेता है ( १०, ११२, ३) तथा विभिन्न रूप अपनी इच्छानुसार ( ३, ४८, , ५३, , , ४७, १८ ) धारण कर लेता है।

सारा विश्व अग्नि तथा सोम से ही बना हुआ है अतः उनके संयुक्त रूप इन्द्र को भी सर्वव्यापक, सर्वमय तथा सर्वोच्च कहा जाता है। वह इतना बड़ा है कि दोनों बृहत् लोक उसकी मुट्ठी में आ सकते हैं ( ३, ३०, ५) और वह आकाश अन्तरिक्ष तथा पृथिवी से भी बड़ा (३, ४६, ३) है । द्यावापृथिवी उसके आधे के बराबर भी नहीं (४, ३०, ; १०,१ ।९, ७ ), वे उसके कटिबन्ध के लिये भी पर्याप्त नहीं हैं ( १, १७३, ६), पृथिवी से तो वह दसियों गुना बड़ा (१, ५२, ११ ) है। उसकी समता सहस्रों सूर्य तथा दोनों लोक भी नहीं कर सकते (८, ५९, ५ ); वह विश्व में अपनी माया के द्वारा प्रत्येक वस्तु में समाया हुआ है और वह सब का प्रेरक है।।

इन्द्र का सोम के साथ उक्त सम्बन्ध होने से, सोम के अन्तर्गत आने वाले प्रकाश-तत्त्व तथा जल-तत्त्व का भी इन्द्र के साथ घनिष्ठ तात्विक सम्बन्ध बतलाया जाता है। वह प्रकाश तथा 'आप' दोनों को प्राप्त करने वाला है (३, ३४, }; वृत्र-वध करके वह 'आप' को मुक्त करता है तथा आकाश, सूर्य और उषा को ( १, ३२, ; , ३०,५) उत्पन्न करता है । वह अन्धकार का उषा तथा सूर्य द्वारा भेदन (१, ६१, ५) करता है और उषा तथा आपः' का एक साथ सृजन करता है( १, ३२, ; ,४, ६, ३०, ५,   १०, १३८, १-२ ) । जब उसने वृत्र का सुनहरे वज्र द्वारा वध किया, तो उसने आपः' को छुटकारा दिलाया और सूर्य को आकाश में स्थापित किया (१, १५१, , ५२,८)

इन्द्र अपने भूमि-तत्त्व में वायु-रूप में रहता है इसीलिये इन्द्र  तथा वायु इस दृष्टि से एक समझे जाते हैं। सोम का भूमि-तत्त्व आपः' अग्नितत्व से मिलने पर 'वायव्य रूप ही हो जाता है। अतः  अग्नि और सोम दोनों को अपने में समावेश कर लेने वाला इन्द्र निश्चय ही वात या वायु कहा जायेगा । ट्यूटानिक देवता वोदेन ( Woden ) तथा नार्वेजियन ओदेन (Oden ) भाषा-विज्ञान की दृष्टि से वायु या वात का ही रूपान्तर है और प्रत्येक बात में इन्द्र से  मिलता है। पिण्डाण्ड में वायु प्राण बनकर रहता है और हमारे जीवन का कारण है। इसलिये उससे प्रार्थना की जाती है कि वह अरोग्यप्रद  होकर हमारे हृद्देश में बहे और अपनी अमृत-निधि से हमें दीर्घ आयु  तथा जीवन प्रदान करें:

वात आ वातु भेषजं शंभु मयोभु नोहृदे।

प्र ण आयूंषि तारिषत् ।। १ ।।

उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा ।।

सनो जीवातवे कृधि ॥ २ ॥

यदपो वात मे गृहे ३मृतस्य निधिर्हितः ।।

ततो नो देहि जीवसे ।। ३ ।।

 ( ऋ० वे० १०, १८६ )

ब्रह्माण्ड में इसका गगनचुम्बी रथ घोर शब्द करता हुआ,  अरुणिमा उत्पन्न करता हुआ, पृथिवी पर धूल उठाता हुआ चलता है। उसके पीछे पीछे वात के अनेक झकोरे दौड़ते हैं, जिनसे संयुक्त होकर एक ही रथ पर, इस विश्व का राजा (इन्द्र) अन्तरिक्ष मार्ग से चलता हुआ एक दिन भी नहीं टलता, वह सारे देवों की आत्मा है और स्वेच्छानुसार ( यथावश ) घूमता है; उसका केवल शब्द सुनाई पड़ता है, रूप नहीं दिखाई देताः

वातस्य हिमानं रथस्य रुजन्नेति स्तनयन्नस्य घोषः।

दिविस्पृग्यात्यरुणानिकृण्वन्नुतो एति पृथिव्या रेणुमस्यन् ।।१।।

सं प्रेरते अनुवातस्य विष्ठा एनं गच्छन्ति समनं न योषाः ।

ताभिः सयुक् सरथं देव ईयतेऽस्य विश्वस्य भुवनस्य राजा ।।२।।

अन्तरिक्षे पथिभिरीयमानो न निविशते कतमच्चनाह ।।

अपां सखा प्रथमजा ऋतावा क्वस्विज्जातः कुत आबभूव ॥३॥

आत्मा देवानां भुवनस्य गर्भो यथावशं चरति देव एषः ।

घोषा इदस्य शृण्विरे न रूपं तस्मै वाताय हविषा विधेम ॥४॥

 

परन्तु यह तो इन्द्र वायु का स्थूल रूप ( भूमितत्व ) है, जिसका वेद में 'वात' नाम दिया गया है और जो नार्वे में वोदेन कहलाता है। इन्द्र-वायु का सूक्ष्म रूप ही यथार्थ में वायु' कहा जाता है। वातरूप में वह सोम के भूमितत्त्व 'आपः' से सम्बन्ध रखता है और इसीलिये अपां' सखा' कहा कहा जाता हैं । वायु-रूप में वह सोम के द्यु-तत्व प्रकाश से सम्बन्ध रखता है; अतः पुरधि' को जगाता है, आकाश तथा पृथिवी को प्रकाशित करता है और उषाओं को चमकाता है, जो अद्भुत वस्त्रों का वितान नवीन रश्मियों में फैला देती हैं। वास्तव में वायु-वात या इन्द्र-वायु एक ही देवता है जो आयुओं में यही साधारण ( आप्य सोम  ) भाग पाता है, परन्तु देवों में उस सोम ( सूर्यश्वित् सोम ) का भाग ग्रहण करता है, जो सरश्मि तथा ऋत्विय है और सूर्य में स्थित है । देवों में पाया जाने वाला तथा सूर्यश्वित् सोम ही वास्तविक तथा शुद्ध सोम है इसी शुचि सोम का पान करने के कारण इन्द्र-वायु शुचिपा' कहलाता है । ऊपर मनु-यज्ञ' के प्रसंग में हम देख चुके हैं कि अदिति की सलिल अवस्था में प्रगूढ सूर्य जब व्यक्त होता है, तो उसी से सारे आदित्य या देव उत्पन्न होते हैं; अतः सूर्य से उत्पन्न नानारूपात्मक प्रकाश-सोम को तो सारे देवता पीते हैं; परन्तु सोम का सर्वप्रथम रूप तो वही रेतस् है, जिसको सूर्यश्वित्' ( सूर्य में शून होने वाला ) कहा गया है। इन्द्र-वायु का सरश्मि ऋत्विय भाग' सूर्य में बतलाया गया है और इसीलिये वह सोम का पूर्वपा' या प्रथम पीने वाला भी कहा गया है। क्योंकि सूर्य ही सूर्यश्वित' का सर्वप्रथम उपभोग कर सकता है।

अतः जिस प्रकार प्रथम यज्ञकर्ता मनु सूर्य है, उसी प्रकार पूर्वपा इन्द्रवायु' भी सूर्य ही हैं। फलतः वायु को मनु भी कहा गया है, जिसके लिये पहले अनवद्य देवों ने सूर्य से उषा को उत्पन्न किया था । जैसा कि आदित्यों की उत्पत्ति के प्रसंग में कहा जा चुका है, सूर्य के दो रूप हैं। पहला प्रगूढ, अव्याकृत, सलिल रूप, जिसमें सारे देवता सुसंरब्ध स्थिति में हैं और विज्ञानमय की उन्मनी शक्ति के समकक्ष है; दूसरा व्यक्त, व्याकृत सूर्य है जिससे मार्ताण्ड तथा उसकी सप्त-रश्मि रूपी आदित्यों के द्वारा सारे देवता उत्पन्न हो जाते हैं और जो विज्ञानमय' की समनी-शक्ति के समकक्ष है। इनमें से दूसरे सूर्य से उत्पन्न होने वाला मार्ताण्ड सूर्य ही प्रथम यज्ञ-कर्ता मनु तथा सोमपा इन्द्रवायु है, यही इन्द्रवायु का 'द्यु' रूप है, जबकि स्वयं व्याकृत सूर्य ( दूसरा रूप ) 'मनुर्हितं रेतस' या सोम का सूर्यश्वित् रेतस' तथा इन्द्र या वामदेव की गर्भावस्था है, जो सप्तरश्मि सहित मार्ताण्ड सूर्य के रूप में होकर विविध देवों या आदित्यों को जन्म देता है, मनु होकर यज्ञ द्वारा देवों, ऋषियों, पितरों आदि की सृष्टि करता है, इन्द्र-जन्म ग्रहण करके वृत्र-वध द्वारा प्रकाश तथा आपः को मुक्त करता है अथवा वायु होकर अनेक इन्द्रमादन करने वाले वायु देवों ( वायव, इन्द्र-मादनास, आदेवासः ) को पैदा करता है, जो सूर्य-किरणों ( सूरिभिः ) द्वारा वृत्रों का वध करते हैं। यही इन्द्रवायु के पुत्र ( वायवः ) सोमपक्ष में मरुत' हैं, जो वायुओं द्वारा वाहित रथों पर सवार होने वाले (३, ५४, १३; , ३४, ; , ५८, ७) इन्द्र का वज्र धारण करने वाले ( ७, , ३१ ) तथा इन्द्र के साथ वृत्र-वध करके सोम को दोनों रूपों ( प्रकाश तथा 'आपः' ) में उत्पन्न करने वाले हैं । इसलिये वायु को 'मरुद्गण' को उत्पन्न करने वाली  कहा गया है (१, १३४, ४ ) । अग्नि पक्ष में यहीं अंगिरस हैं, जो मरुत की भांति ही इन्द्र के साथ वृत्र-वध करते हैं तथा उससे उत्पन्न प्रकाश तथा 'आपः' को मुक्त करते हैं । अतः वायवों ( अंगिरस तथा मरुत् ) के गण के सहित व्याकृत तथा सरश्मि मार्ताण्ड रूपी इन्द्र ही वायु अथवा इन्द्रवायु है, क्योंकि यही नानात्वमुखी प्रगति की अवस्था है, जो वा' धातु से निष्पन्न वायु' शब्द से व्यक्त होती है। परन्तु , इन्द्र की गर्भावस्था अपेक्षाकृत स्थिरता की अवस्था है, जिसमें देवता लोग सुसंरब्ध' कहे गये हैं, जबकि उक्त नानाकृत अवस्था में वे नाचते हुए से बतलाये गये हैं। अतः गर्भावस्था का इन्द्र केवल इन्द्र कहलाता है।

 

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