पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Pitaa to Puurnabhadra  )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Pitaa- Pitriyaana ( words like  Pitaa / father, Pitaamaha / grandfather etc. )

Pitrivartee - Pishangajata ( Pinaaki, Pipeelikaa / ant, Pippalaa, Pippalaada etc.)

Pishaacha - Peevari ( Pishaacha, Pishta / ground, Peetha / chair, Peeta / yellow, Peevari etc.)

Punshchalee - Punyajana ( Punjikasthalaa, Pundareeka, Pundra, Punya etc.)

Punyajani - Punarvasu ( Punyasheela, Putra / son, Putri / Putree / daughter, Punarvasu etc.)

Punnaaga - Pureesha (Pura / residence, Puranjana, Puranjaya, Purandara, Puraana, Pureesha etc. ) 

Puru - Purusha ( Puru, Purukutsa, Purusha / man etc. )

Purusha - Pulaka  ( Purushasuukta, Purushaartha, Purushottama, Puruuravaa, Purodaasha, Purohita etc.)

Pulastya - Pulomaa ( Pulastya, Pulinda, Pulomaa etc.)

Pulkasa - Pushkaradweepa (  Pushkara etc. )

Pushkaraaksha - Pushpa ( Pushkaraavarta, Pushkarini /pushkarinee, Pushkala, Pushti, Pushpa / flower etc.)

Pushpaka - Pushya ( Pushpaka, Pushpadanta, Pushpabhadra, Pushya etc.)

Pushyamitra - Puujaa (Puujaa / worship)

Puutanaa - Puurnabhadra (  Puurana, Puuru /pooru, Puurna / poorna / complete, Puurnabhadra /poornabhadra etc.)

 

 

Puraanic contexts of words like  Pushkara etc. are given here.

Comments on Pushkara

पुल्कस ब्रह्माण्ड ३.४.२१.७९( भण्डासुर के सेनापति पुत्रों में से एक ), भागवत ९.२१.१०( पुल्कस द्वारा रन्तिदेव से शेष पानी की प्राप्ति का कथन ) pulkasa

 

पुष्कर अग्नि १०९.५( पुष्कर तीर्थ का माहात्म्य पुष्करतीर्थ के अन्तर्वर्ती तीर्थ), १२१.५७( त्रिपुष्कर योग विचार - त्रिपादेषु च ऋक्षेषु यदा भद्रा तिथिर्भवेत् ॥ भौमादित्यशनैश्चारि विज्ञेयं तत्त्रिपुष्करं । ), २११.८(ज्येष्ठ पुष्कर में   वृषभ दान का महत्त्व), २१८ - २३७ ( पुष्कर द्वारा परशुराम को राजधर्म का वर्णन ), ३८३.१८( ज्येष्ठ पुष्कर में सौ कपिला दान का फल  अग्नि पुराण पठन के बराबर होने का उल्लेख - कपिलानां शते दत्ते यद् भवेज्ज्येष्ठपुष्करे । तदाग्नेयं पुराणं हि पठित्वा फलमाप्नुयात् ।। ), कूर्म १.३७.३७( पुष्कर तीर्थ की त्रेता युग में विशिष्टता - कृते तु नैमिषं तीर्थं त्रेतायां पुष्करं परम् । द्वापरे तु कुरुक्षेत्रं कलौ गङ्गां विशिष्यते ।।  ), १.५०.१( पुष्कर द्वीप का वर्णन ), गरुड १.९०( वरुण - पुत्र, प्रम्लोचा से मानिनी कन्या की उत्पत्ति - अतीवरूपिणी कन्या मत्प्रसाद्वराङ्गना ॥ जाता वरुणपुत्रेण पुष्करेण महात्मना ॥ ), २.६.११८(पुष्कर में वृषोत्सर्ग का निर्देश - अतस्त्वं पुष्करं गत्वा वृषोत्सर्गं विधाय च ॥), २.२२.६०( पुष्कर द्वीप की शरीर में नखों में स्थिति, अन्य अवयवों में अन्य द्वीपों की स्थिति ) २.२२.६०चौखम्बा/२.३२.११४नाग( नखों में पुष्कर द्वीप की स्थिति का उल्लेख - त्वचायां शाल्मलिर्द्वीपो प्लक्षः रोम्णां च सञ्चये । नखस्थः पुष्करद्वीपः सागरास्तदनन्तरम् ॥ ), ३.१३.५२(कर्म तत्त्वाभिमानी - पर्जन्यानन्तरं ब्रह्मा दशवर्षादनन्तरम् । पुष्करं जनयामास कर्मतत्त्वाभिमानिनम् ॥), ३.२२.२८(पुष्कर के ९ लक्षणों से युक्त होने का उल्लेख - शनिस्तु दशसंख्याकैः पुष्करो नवभिर्युतः ॥) ३.२९.३६(पुष्कर का कर्मात्मा रूप में उल्लेख, शनि से साम्य - कर्मात्मा पुष्करो ज्ञेयः शनेरथ यमो मतः ।), गर्ग ७.२०.३१( प्रद्युम्न - सेनानी, लक्ष्मण से युद्ध ), देवीभागवत ७.३८.२०( पुष्कराक्ष तीर्थ में देवी पुरुहूता के वास का उल्लेख - पुरुहूता पुष्कराक्षे आषाढौ च रतिस्तथा ॥ ), ८.४.२६( शुद्धोदक सिन्धु से परिवेष्टित पुष्कर द्वीप के राजा वीतिहोत्र द्वारा स्वकन्या ऊर्जस्वती उशना को प्रदान करने का कथन - पुष्करद्वीपके शुद्धोदकसिन्धुसमाकुले । वीतिहोत्रो बभूवासौ राजा जनकसम्मतः ॥ ), ८.१३.२७( पुष्कर द्वीप की महिमा का वर्णन - पुष्करद्वीपनामायं शाकद्वीपद्विसंगुणः । स्वसमानेन स्वादूदकेनायं परिवेष्टितः ॥ ), नारद २.७१.१९( पुष्कर तीर्थ का माहात्म्य, वसु व मोहिनी संवाद का प्रसंग - ज्येष्ठे तु पुष्करे स्नात्वा गां च दत्त्वा द्विजातये ।। भुक्त्वेह भोगानखिलान्ब्रह्मलोके महीयते ।। ....), पद्म १.१५.२०( ब्रह्मा द्वारा स्वयं की उत्पत्ति के स्थान पुष्कर वन में प्रवेश, पुष्कर वन के पादपों को वरदान - अहं यत्र समुत्पन्नः पद्मं तद्विष्णुनाभिजम् पुष्करं प्रोच्यते तीर्थमृषिभिर्वेदपाठकैः ), १.१५.६३( ब्रह्मा द्वारा पुष्कर का भूमि पर क्षेपण, पुष्कर तीर्थ की उत्पत्ति, पुष्कर में दान आदि का महत्त्व - स्थित्वा वर्ष सहस्रं तु पुष्करं प्रक्षिपद्भुवि क्षितिर्निपतिता तेन व्यकंपत रसातलम् ), १.१५.१५१( ज्येष्ठ पुष्कर के ब्रह्म दैवत्य, मध्यम के विष्णु व कनिष्ठ के रुद्र दैवत्य होने का उल्लेख - ज्येष्ठं तु प्रथमं ज्ञेयं तीर्थं त्रैलोक्यपावनम् ख्यातं तद्ब्रह्मदैवत्यं मध्यमं वैष्णवं तथा कनिष्ठं रुद्रदैवत्यं ब्रह्मपूर्वमकारयत्), १.१५.१५९( पुष्कर में निवास की विधि का वर्णन : भक्ति के प्रकार, सांख्य, योग का कथन, पुष्कर में वास का महत्त्व ), १.१६( पुष्कर में ब्रह्मा के यज्ञ का वर्णन ), १.१९.१२( ज्येष्ठ पुष्कर के महत्त्व का वर्णन ), १.१९.५७( पुष्कर में अगस्त्य द्वारा आश्रम की स्थापना का वर्णन ), १.२०.२( कनिष्ठ पुष्कर के माहात्म्य के संदर्भ में राजा पुष्पवाहन के पूर्वजन्म का वृत्तान्त : चाण्डाल द्वारा द्वादशी को विष्णु पूजा हेतु कमल अर्पित करने से जन्मान्तर में राजा बनना ), १.२०.४०( ज्येष्ठ पुष्कर में गौ, मध्यम में भूमि तथा कनिष्ठ में काञ्चन दान का निर्देश - ज्येष्ठे गावः प्रदातव्या मध्यमे भूमिरुत्तमा कनिष्ठे कांचनं देयमित्येषा दक्षिणा स्मृता), १.२०.४१( ज्येष्ठ पुष्कर के ब्रह्मदैवत्य, मध्यम के वैष्णव तथा कनिष्ठ के रुद्र दैवत्य होने का उल्लेख - प्रथमं ब्रह्मदैवत्यं द्वितीयं वैष्णवं तथा तृतीयं रुद्रदैवत्यं त्रयो देवास्त्रिषु स्थिताः ), १.३२( पुष्कर तीर्थ की महिमा, पुष्कर तीर्थ के अन्तर्गत सरस्वती की महिमा ), १.३२.१३( पृथु ब्राह्मण द्वारा पुष्कर में स्नान के पश्चात् पांच प्रेतों के दर्शन, संभाषण व प्रेतों के उद्धार का वृत्तान्त ), १.३२.७४( ग्रह - नक्षत्र योग का नाम -- विशाखासु यदा भानुः कृत्तिकासु च चंद्रमाः स योगः पुष्करो नाम पुष्करेष्वतिदुर्लभः ), १.३२.११२( ज्येष्ठ व मध्यम पुष्कर के मध्य पश्चिमोन्मुखी सरस्वती तथा उदङ्गमुखी गङ्गा के सङ्गम का महत्त्व - ज्येष्ठमध्यमयोर्मध्ये संगमो लोकविश्रुतः पश्चान्मुखी ब्रह्मसुता जाह्नवी तु उदङ्मुखी ), १.३४.५( ब्रह्मा के पुष्कर में आयोजित यज्ञ के ऋत्विजों के नाम व सूक्ष्म कार्य, यज्ञ में लक्ष्मी, गौरी आदि द्वारा सावित्री को लाने का उद्योग ), १.३४.१३१( पुष्कर में ब्रह्मा की सुरश्रेष्ठ नाम से स्थिति का उल्लेख - पुष्करेहं सुरश्रेष्ठो गयायां च चतुर्मुखः कान्यकुब्जे देवगर्भो भृगुकक्षे पितामहः ), १.३४.१७४( पुष्कर में सन्ध्या के महत्त्व का कथन - यैः कृत्वा पुष्करे संध्यां सावित्री समुपासिता स्वपत्नीहस्तदत्तेन पौष्करेण जलेन तु), १.३४.२२५( पुष्कर की प्रशंसा - कृते युगे पुष्कराणि त्रेतायां नैमिषं स्मृतम् द्वापरे च कुरुक्षेत्रं कलौ गंगां समाश्रयेत्), १.४०.९३( विश्वेदेव गण में से एक का नाम - दक्षश्चैव महाबाहुः पुष्करस्तम एव च चाक्षुषश्च ततोत्रिश्च तथा भद्रमहोरगौ॥ ), २.२७.२२( ब्रह्मा द्वारा वरुण - पुत्र पुष्कर का पश्चिम् दिशा के दिक्पाल पद पर  अभिषेक का उल्लेख - पश्चिमायां तथा ब्रह्मा वरुणस्य प्रजापतेः पुत्रं च पुष्करं नाम सोऽभ्यषिंचत्प्रजापतिः ), ३.११.२०( पुष्कर तीर्थ का महत्त्व ), ६.२१८.३५( ज्येष्ठ भ्राता के धन का अपहरण करने वाले दुराचारी भरत द्वारा पुष्कर तीर्थ में मृत्यु से सद्गति प्राप्ति का वृत्तान्त ), ६.२१९.३२( विष्णु द्वारा माघ स्नान के अन्त में पुण्डरीक द्विज को इन्द्रप्रस्थ में पुष्कर तीर्थ में स्नान कराने का वृत्तान्त - उत्तिष्ठ जाह्नवीतोय माघे स्नानं कुरु द्विज माघांते स्नापयामि त्वां पूर्णिमायां तु पुष्करे), ब्रह्मवैवर्त्त २.७.११० (लक्ष्मी के तप का स्थान), ब्रह्माण्ड १.२.१४.१४( पुष्कर द्वीप के जनपदों व वर्षों के नाम - पुष्कराधिपतिं चैव सवनं कृतवान्प्रभुः ।। पुष्करे सवनस्याथ महावीतः सुतोऽभवत् ।।), १.२.१८.४५( सीता नदी द्वारा प्लावित जनपदों में से एक - पुष्कराश्च कुलिन्दांश्च अचोंलद्विचराश्च ये ।। कृत्वा त्रिधा सिंहवंतं सीताऽगात्पश्चिमोदधिम् ।। ), १.२.१९.१०८( पुष्कर  द्वीप का वर्णन - पुष्करं सप्तमं द्वीपं प्रवक्ष्यामि निबोधत ।। पुष्करेण तु द्वीपेन वृतः क्षीरोदको बहिः ।।... ), २.३.५.७( पुष्कर में कश्यप के अश्वमेध यज्ञ में हिरण्यकशिपु के प्राकट्य का कथन ), २.३.७.२६७( रावण को जीतने के पश्चात् वाली द्वारा पुष्कर में बहुत से यज्ञ करने का कथन - वाली विजित्य बलवान् पुष्करे राक्षसेश्वरम्। आजहार बहून्यज्ञानन्नपानसमावृतान् ॥  ), २.३.३४( मध्य पुष्कर में परशुराम द्वारा मृग - मृगी संवाद का श्रवण ), २.३.३५.३९(परशुराम का कनिष्ठ पुष्कर में अगस्त्य के पास गमन), भविष्य २.२.८.१२८( पुष्कर में महाकार्तिकी पूर्णिमा के विशेष फल का उल्लेख - महाभाद्री बदर्यां च कुजोऽपि स्यान्नरस्तथा ।। महाकार्त्तिकी पुष्करे च कान्यकुब्जे तथोत्तरं ।। ), ३.४.२४.७८( द्वापर के आद्य पद में पुष्कर द्वीप के नरों से पूर्ण होने का उल्लेख - द्वापराद्यपदे पूर्णे भवेद्द्वीपः स पुष्कर ।), ३.४.२५.१७७( ब्रह्मा के पद्म के उत्पत्ति स्थान की पुष्कर क्षेत्र संज्ञा का कथन - यतो जातं विधेः पद्मं तद्वै पद्मसरोवरम् । प्रसिद्धं पुष्करक्षेत्रं तत्पद्मसरसं सुराः । । ), भागवत ५.१.३२( प्रियव्रत के रथ की नेमि से बने ७ द्वीपों में से एक, पुष्कर द्वीप के स्वामी आदि का कथन - जम्बूप्लक्षशाल्मलिकुशक्रौञ्चशाकपुष्करसंज्ञा ), ५.२०.२९( ब्रह्मा के आसन रूप पुष्कर द्वीप की महिमा का वर्णन - यस्मिन्बृहत्पुष्करं ज्वलनशिखामलकनकपत्रायुतायुतं भगवतः कमलासनस्याध्यासनं परिकल्पितम्), ९.१२.१२( सुनक्षत्र - पुत्र, अन्तरिक्ष - पिता, कुश वंश - भविता मरुदेवोऽथ सुनक्षत्रोऽथ पुष्करः । तस्यान्तरिक्षः तत्पुत्रः सुतपास्तद् अमित्रजित् ॥), ९.२१.२०( पुष्करारुणि : दुरितक्षय के ब्राह्मण गति को प्राप्त ३ पुत्रों में से एक - दुरितक्षयो महावीर्यात् तस्य त्रय्यारुणिः कविः ॥ पुष्करारुणिरित्यत्र ये ब्राह्मणगतिं गताः । ), ९.२४.४३( वृक व दुर्वाक्षी के पुत्रों में से एक - तक्षपुष्करशालादीन्दुर्वाक्ष्यां वृक आदधे  ), १०.९०.३४( कृष्ण के १८ महारथी पुत्रों में से एक - .... पुष्करो वेदबाहुश्च श्रुतदेवः सुनन्दनः । ), मत्स्य १३.३०( पुष्कर में देवी की पुरुहूता नाम से स्थिति का उल्लेख - पुष्करे पुरुहूतेति केदारे मार्गदायिनी। ), ४९.३९( पुष्करि : उरुक्षव व विशाला के ब्राह्मणत्व को प्राप्त ३ पुत्रों में से एक - त्र्युषणं पुष्करिं चैव कविं चैव महायशाः।। उरुक्षवाः स्मृता ह्येते सर्वे ब्राह्मणताङ्गताः। ), १००.४( राजा पुष्पवाहन द्वारा शासित पुष्कर द्वीप के पुष्कर नाम का कारण - कल्पादौ सप्तमं द्वीपं तस्य पुष्करवासिनः। लोके च पूजितं यस्मात् पुष्करद्वीपमुच्यते।।  ), १०९.३( पृथिवी पर नैमिष व अन्तरिक्ष में पुष्कर तीर्थों के पुण्य होने का उल्लेख - पृथिव्यां नैमिषं पुण्यमन्तरिक्षे च पुष्करम्। त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते।। ), १२३.१२( पुष्कर द्वीप का वर्णन ), १२५.१२( पर्वतों के पक्षों का नाम, इन्द्र द्वारा छेदन - शक्रेण पक्षाश्छिन्ना वै पर्वतानां महौजसा। कामगानां समृद्धानां भूतानां नाशमिच्छताम्।। पुष्करा नाम ते पक्षा बृहन्तस्तोयधारिणः। ), २०१.३५( ५ कृष्ण पराशरों में से एक - पुष्करः पञ्चमश्चैषां कृष्णाज्ञेयाः पराशराः ।।  ), २४८.१३( भगवान् की देह से पुष्कर द्वीप के उत्थित होने का उल्लेख - तव देहाज्जगज्जातं पुष्करद्वीपमुत्थितम्। ब्रह्माणमिह लोकानां भूतानां शाश्वतं विदुः ।। ), मार्कण्डेय ९८.३/९५.३( प्रम्लोचा व वरुण - पुत्र पुष्कर से उत्पन्न कन्या मालिनी का संदर्भ - जाता वरुणपुत्रेण पुष्करेण महात्मना । । ), वराह ८९.४( इक्षु रस के समुद्र को आवृत करने वाले पुष्कर द्वीप पर मानस पर्वत की स्थिति का उल्लेख - समुद्रश्चेक्षुरसस्तद्द्विगुणेन पुष्करेणावृतः। तत्र च पुष्कराख्ये मानसो नाम पर्वतः। ), वामन ११.४६( पुष्कर द्वीप में स्थित नरकों के नाम ; पुष्कर द्वीप के निवासियों के पैशाच धर्म में रत होने का कथन - किमर्थं पुष्करद्वीपो भवद्भिः समुदाहृतः। दुर्दर्शः शौचरहितो घोरः कर्मान्तनाशकृत्।। ), २२.१९( पुष्कर के वेदियों में प्रतीची वेदी होने का उल्लेख - प्रतीची पुष्करा वेदिस्त्रिभिः कुण्डैरलंकृता। समन्तपञ्चका चोक्ता वेदिरेवोत्तराऽव्यया।।), ५७.९०( अजिशिरा द्वारा स्कन्द को प्रदत्त गणों में से एक ), ६५.१९( गालव द्वारा मध्यम पुष्कर में स्नान के समय मत्स्य - प्रोक्त प्रबोधन का श्रवण कर जल से बाहर न निकलने का वृत्तान्त ), ७२.१७( सात मुनि - पत्नियों द्वारा राजा के पुष्कर पर गिरे हुए शुक्र के पान से ७ मरुतों को जन्म देने का वृत्तान्त - तद् दृष्ट्वा पुष्करे न्यस्तं प्रत्यैच्छन्त तपोधन। मन्यमानास्तदमृतं सदा यौवनलिप्सया।।  ), ९०.१४( पुष्कर में विष्णु का अब्जगन्ध नाम से वास - स्वयंभुवं मधुवते अयोगन्धिं च पुष्करे।।), ९०.४३( पुष्कर द्वीप में विष्णु का वामन नाम - सहस्रांशुः स्थितः शाके धर्मराट् पुष्करे स्थितः।। ), वायु ३३.१४( प्रियव्रत - पुत्र सवन को पुष्कर द्वीप का अधिपति नियुक्त करने का उल्लेख - पुष्कराधिपतिञ्चापि सवनं कृतवान् प्रभुः। पुष्करे सवनस्यापि महावीतः सुतोऽभवत्। ), ४२.६९( अलकनन्दा नदी के शतशतङ्ग पर्वत से निकल कर पुष्कर में तथा पुष्कर से निकल कर द्विराज पर्वत पर गिरने का उल्लेख - शतश्रृङ्गान्महाशैलं पुष्करं पुष्पमण्डितम् ।। पुष्कराच्च महाशैलं द्विराजं सुमहाबलम् । ), ४९.१०४( पुष्कर द्वीप के अन्तर्वर्ती पर्वतों का वर्णन - पुष्करे पर्वतः श्रीमान् एक एव महाशिलः। चित्रै र्मणिमयैः शीलैः शिखरैस्तु समुच्छ्रितैः ।। ) ५०.११९( भास्कर का पुष्कर मध्य से सर्पण सम्बन्धी कथन - एवं पुष्करमध्येन यदा सर्पति भास्करः। त्रिंशांशकन्तु मेदिन्या मुहूर्तेनैव गच्छति ॥ ), ५१.३७( पक्षधारी पुष्कर मेघों की महिमा - पुष्करावर्त्तका नाम ये मेघाः पक्षसम्भवाः ।। शक्रेण पक्षाश्छिन्ना ये पर्वतानां महोजसाम्। ), ६७.५३( पुष्कर में कश्यप के अश्वमेध यज्ञ में हिरण्यकशिपु के प्राकट्य का वृत्तान्त - कश्यपस्याश्वमेधोऽभूत् पुण्यो वै पुष्करे पुरा। ), ७७.४०( श्राद्धोपयुक्त स्थानों में से एक - पुष्करेष्वक्षयं श्राद्धं तपश्चैव महाफलम्। ), ८८.१९०/२.२६.१८९( भरत - पुत्र पुष्कर की पुरी पुष्करावती का उल्लेख - तक्षस्य दिक्षु विख्याता रम्या तक्षशिला पुरी। पुष्करस्यापि वीरस्य विख्याता पुष्करावती ।। ), ९९.१६३/२.३७.१५९( पुष्करि : उभक्षय व विशाला के ३ पुत्रों में से एक - तस्य भार्या विशाला तु सुषुवे वै सुतांस्त्रयः ।। त्रय्यारुणिं पुष्करिणं तृतीयं सुषुवे कपिम्। ), विष्णु २.४.५३( क्रौञ्च द्वीप में ब्राह्मण जाति का नाम - पुष्कराः पुष्कला धन्यास्तिष्याख्याश्च महामुने । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शद्राश्चानुक्रमोदिताः ॥ ), २.४.७३( क्षीराब्धि के पुष्कर द्वीप से आवृत्त होने तथा पुष्कर में सवन - पुत्र महावीर के राजा? होने का उल्लेख ; पुष्कर के वर्ष पर्वतों के नाम - क्षीराब्धिः सर्वतो ब्रह्मन्पुष्कराख्येन वेष्टितः । ), २.४.८५( पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध के ब्रह्मा का स्थान होने का उल्लेख : पुष्कर द्वीप के स्वादूदक उदधि से परिवेष्टित होने का उल्लेख - न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । ), विष्णुधर्मोत्तर १.१०९.२( पुष्कर तीर्थ में पृथु का अभिषेक - आजग्मुः पुष्करं तीर्थमभिषेक्तुं तदा पृथुम् ।। तं चाभिसिषिचुर्देवा रत्नचित्रवरासने ।। ), १.२२३.७( वरुण - पुत्र, ज्योत्स्ना - पति, रावण से युद्ध - पुष्करः प्रददौ युद्धं रावणस्य दुरात्मनः ।। वरुणस्य सुतः श्रीमाञ्जामाता बलिनस्तथा ।। सोमपुत्र्या महाराज ज्योत्स्नया यः स्वयं वृतः ।।), २.१+ ( पुष्कर द्वारा परशुराम को राजधर्म का कथन - राष्ट्रस्य कृत्यं धर्मज्ञ राज्ञ एवाभिषेचनम् ।। अनिन्द्रमबलं राष्ट्रं दस्यवोऽभिभवन्त्युत ।। ), ३.७३.१०( पुष्कर की मूर्ति का रूप - पुष्करश्च तथा कार्यः पद्मपत्रसमप्रभः ।।खड्गं च पुस्तकं चोभौ करयोस्तस्य कारयेत ।।), ३.२२१.३९( पञ्चमी तिथि को पुष्कर की अर्चना से सोमयज्ञ फल प्राप्ति का उल्लेख - वारुणैः पुष्करस्यार्चां पञ्चम्यां यः समाचरेत् ।। सर्वकामसमृद्धस्य सोमयज्ञफलं भवेत् ।। ), शिव २.५.८.९( शिव के रथ में पुष्कर का अन्तरिक्ष बनना - ऋतवो नेमयः षट् च तयोर्वै विप्रपुंगव ।। पुष्करं चांतरिक्षं वै रथनीडश्च मंदरः ।। ), ५.१८.५९( क्षीराब्धि को परिवेष्टित करने वाले तथा स्वादूदक अब्धि से आवृत पुष्कर द्वीप पर स्थित मानस वर्ष तथा न्यग्रोध वृक्ष का कथन - क्षीराब्धिस्सर्वतो व्यास पुष्कराख्येन संवृतः ।। द्विगुणेन महावर्षस्तत्र ख्यातोऽत्र मानसः।। ), स्कन्द २.३.७.१( बदरी क्षेत्र की नैर्ऋत् दिशा में स्थित प्रभास, पुष्कर आदि ५ धाराओं का माहात्म्य - प्रभासं पुष्करं चैव गयां नैमिषमेव च ।। कुरुक्षेत्रं विजानीहि द्रवरूपं षडानन ।। ), २.४.२.२६( कार्तिक मास में पुष्कर स्मरण का निर्देश - प्रयागो माघमासे तु पुष्करं कार्तिके तथा ।। अवन्ती माधवे मासि हन्यात्पापं युगार्जितम् ।।), २.४.२.३२टीका( पापी व पुण्यात्मा पुष्कर पुरुष , नाम स्मरण का माहात्म्य ), ५.२.६५.३५( ब्रह्मेश्वर शिव के दर्शन का पुष्कर में तप करने से अधिक फल का उल्लेख - यः पुष्करं नरो गत्वा तपो वर्षशतं चरेत् ।। अन्यो ब्रह्मेश्वरं पश्येत्तस्य पुण्यं ततोऽधिकम् ।।  ), ५.३.५९( पुष्करिणी में आदित्य तीर्थ का माहात्म्य - कुरुक्षेत्रे यथा वृद्धिर्दानस्य जगतीपते । पुष्करिण्यां तथा दानं वर्धते नात्र संशयः ॥ ), ५.३.१३९.१०( इन्द्रियग्राम का संनिरोध करने पर वहीं पुष्कर आदि तीर्थों के स्थित हो जाने का उल्लेख - संनिरुध्येन्द्रियग्रामं यत्रयत्र वसेन्मुनिः ।तत्रतत्र कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च ॥ ), ५.३.१९५.४( पृथिवी पर कुरुक्षेत्र, अन्तरिक्ष में त्रिपुष्कर तथा द्युलोक में पुरुषोत्तम तीर्थों के परम तीर्थ होने का उल्लेख - कुरुक्षेत्रं भुवि परमन्तरिक्षे त्रिपुष्करम् । पुरुषोत्तमं दिवि परं देवतीर्थं परात्परम् ॥), ५.३.१९८.६७( पुष्कर में देवी की पुरुहूता नाम से स्थिति का उल्लेख - पुष्करे पुरुहूता च केदारे मार्गदायिनी ॥), ५.३.१९८.८१( प्रभास तीर्थ में देवी की पुष्करावती नाम से स्थिति का उल्लेख - सोमेश्वरे वरारोहा प्रभासे पुष्करावती । वेदमाता सरस्वत्यां पारा पारातटे मुने ॥ ), ६.४५( त्रिपुष्कर का माहात्म्य, विश्वामित्र द्वारा ज्येष्ठ, मध्यम व कनिष्ठ पुष्कर के दर्शन, पद्मों की स्थितियों द्वारा पुष्करों का अभिज्ञान, बृहद्बल राजा का वृत्तान्त - तत्रोर्ध्वास्यैः सरोजैश्च विज्ञेयं ज्येष्ठपुष्करम् ॥ पार्श्ववक्त्रैर्द्विजश्रेष्ठ मध्यमं परिकीर्तितम् ॥अधोवक्त्रैस्तथा ज्ञेयं कनिष्ठं पुष्करं क्षितौ ॥), ६.४५.३७( कार्तिक पूर्णिमा को त्रिपुष्कर स्नान का माहात्म्य, कार्तिक पूर्णिमा को ज्येष्ठ पुष्कर में कमल में अङ्गुष्ठ मात्र पुरुष के दर्शन होने का वृत्तान्त - तदा निष्क्रामति श्रेष्ठं कमलं जलमध्यतः ॥ तन्मध्येंऽगुष्ठमात्रस्तु पुरुषो दृश्यते जनैः ॥), ६.१७९.३७( ब्रह्मा के पद्म क्षेप से तीन पुष्करों की उत्पत्ति , ब्रह्मा का यज्ञ  - पत त्वं पद्म भूपृष्ठे कलिर्यत्र न विद्यते ॥ येनानयामि तत्रैव पुष्करं तीर्थमात्मनः ॥ ), ७.१.१०.८(पुष्कर तीर्थ का वर्गीकरण तेज - अमरेशं प्रभासं च नैमिषं पुष्करं तथा ॥.आदि गुह्याष्टकं ह्येतत्तेजस्तत्त्वे प्रतिष्ठितम् ॥) ७.१.११५( पुष्करेश्वर का माहात्म्य, सनत्कुमार द्वारा पूजित पुष्कर का संक्षिप्त माहात्म्य ), ७.१.१३४.१( पुष्करावर्त तीर्थ व नदी का माहात्म्य, ब्रह्मा द्वारा सन्ध्या कार्य हेतु प्रभास में पुष्कर का आह्वान - यावत्स्थास्याम्यहं मर्त्ये कस्मिंश्चित्कारणांतरे ॥ तावत्संध्यात्रयं वंद्यं नित्यमेव त्रिपुष्करे ॥ ), ७.१.१४४( तृतीय पुष्कर में पुष्कर कुण्ड का माहात्म्य ), ७.१.१७३( पुष्करेश्वर लिङ्ग का संक्षिप्त माहात्म्य - कुशकेश्वरनामेति लिंगं वै प्रथमं स्मृतम् ॥ गर्गेश्वरं द्वितीयं तु तृतीयं पुष्करेश्वरम् ॥ ), ७.१.२९४.१( कैवर्त द्वारा पुष्कर में अजोगन्ध शिव के मन्दिर पर जाल व ध्वजा फहराने से जन्मान्तर में राजा बनने का वृत्तान्त - गव्यूतिपंचके देवि पुष्करंनाम नामतः ॥ यत्र सिद्धो महादेवि कैवर्तो मत्स्यघातकः ॥ ), ७.३.५४( अर्बुद पर्वत पर त्रिपुष्कर का माहात्म्य ), हरिवंश ३.१२०.१६( कृष्ण और हंस - डिम्भक में युद्ध का स्थल ), महाभारत अनुशासन ९४.८( अगस्त्य द्वारा प्राप्त पुष्करों की चोरी पर ऋषियों व राजर्षियों के शपथ वचन ), योगवासिष्ठ १.२५.२१( नियति के हाथ में डमरु रूपी पुष्कर मेघ  - प्रमत्तपुष्करावर्तडमरोड्डामरारवैः ), ३.४०.५३( संसार वन में चित्त रूपी पुष्कर - चित्तपुष्करबीजान्तर्निलीनानुभवाङ्कुरः ।।), वा.रामायण १.६२.२(विश्वामित्र द्वारा ज्येष्ठ पुष्कर में शुनःशेप की रक्षा, मेनका का विघ्न), ७.२३.२८( वरुण - पुत्र पुष्कर आदि की रावण से युद्ध में पराजय ), लक्ष्मीनारायण १.२०९.२७( श्रीहरि द्वारा बदरी क्षेत्र में निर्मित दण्डपुष्करिणी तीर्थ के महत्त्व का कथन ), १.३८०.१( मध्यम पुष्कर में उत्पन्न मृगी के पातिव्रत्य का वृत्तान्त, परशुराम के दर्शन से जातिज्ञान होना आदि ), १.४९५.२८( विश्वामित्र के भय से अग्नि का पुष्कर में जल में छिपने तथा मत्स्य द्वारा देवों को अग्नि की स्थिति की सूचना देने का कथन ), १.४९८.१०( मकर सङ्क्रान्ति को पुष्कर दान के महत्त्व का कथन, रानी दमयन्ती द्वारा दान की कथा ), २.३०.८२( प्रतीची वेदी के रूप में पुष्कर का उल्लेख - प्राग्वेदिका गयावेदिर्विरजा दक्षिणा तु वै ।। प्रतीची पुष्करा वेदिस्त्रिभिः कुण्डैरलंकृता ।), २.२५०.६४( पुष्कर अरण्य में दरिद्र विप्र विशालिक द्वारा लोमश की कृपा से धन प्राप्ति तथा धन की व्यर्थता के दर्शन का वृत्तान्त ), ३.५१.३३( च्यवन की कृपा से कृष्णता दूर करने वाले हंस रूप धारी तीर्थों में से एक - त्रयश्चान्ये तु हंसास्ते रेवा गोदा च पुष्करम् । ), ३.१३९.७७( विशोक द्वादशी को पुष्कर दान से लुब्धक व उसकी पत्नी का जन्मान्तर में राजा पुष्करवाहन व उसकी रानी बनने का वृत्तान्त ), ४.८०.१६( नागविक्रम राजा के सर्वमेध यज्ञ में पौष्कर विप्रों के हवनार्थी होने का उल्लेख ), कथासरित् ६.२.११३( पुष्करावती के राजा गूढसेन के पुत्र द्वारा स्वयंवर में भाग लेने हेतु गमन तथा मार्ग में शाप प्राप्ति का वृत्तान्त - अनाख्याय कथां सुप्तः पापोऽयं तच्छपाम्यहम् । परिद्रक्ष्यत्यसौ हारं प्रातस्तं चेद्ग्रहीष्यति ।। ), ७.३.२२( प्रालेय शैलाग्र पर पुष्करावती नगरी की विद्याधरी अनुरागपरा का वृत्तान्त ), ८.२.८३( काल नामक द्विज द्वारा पुष्कर तीर्थ में जप सिद्धि का कथन ), ९.६.२९४( नल - दमयन्ती आख्यान के अन्तर्गत पुष्कर द्वारा अग्रज नल को द्यूत में हराने का कथन ) pushkara

पुष्कर १) क्षेत्र । तीर्थगुरु ( आदि० २२० । १४) । अर्जुन ने अपने वनवास का शेष समय यहीं व्यतीत किया था  ( आदि० २२० । १४) । पुलस्त्यजी द्वारा इसका विशेष वर्णन ( वन० ८२ । २०--४०) - दुष्करं पुष्करं गन्तुं दुष्करं पुष्करे तपः।
दुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम् ।।  । धौम्य द्वारा इसके माहात्म्य का वर्णन ( वन० ८९ । १६- १८) । पुष्कर में जाकर मृत्यु ने घोर तप किया था( द्रोण० ५४ । २६) । यहाँ ब्रह्माजी का यज्ञ हुआ था, जिसमें सरस्वती सुप्रभा नाम से प्रकट हुई थी ( शल्य० ३८ । ५-१४) - पितामहेन यजता आहूता पुष्करेषु वै। सुप्रभा नाम राजेन्द्र नाम्ना तत्र सरस्वती।।। पुष्कर में जाकर दान देना, भोगों का त्याग करना, शान्त भाव से रहना, तपस्या और तीर्थ के जल से तनमन को पवित्र करना चाहिये ( शान्ति० २९७ । ३७) । यहाँ स्नान करने से मनुष्य विमान पर बैठकर स्वर्गलोक में जाता है और अप्सराएँ स्तुति करती हुई जगाती हैं ( अनु० २५ । ९) ( ) वरुणदेव के प्रिय पुत्र, इनके नेत्र विकसित कमल के समान दर्शनीय हैं; इसीलिये सोम की पुत्री ने इनका पतिरूपसे वरण किया है ( उद्योग० ९८ । १२)- रूपवान्दर्शनीयश्च सोमपुत्र्या वृतः पतिः ।। ज्योत्स्नाकालीति यामाहुर्द्वितीयां रूपतः श्रियम् ।   ( ) ये राजा नल के छोटे भाई थे ( वन० ५२ । ५६) । इन्हें कलियुग का राजा नल के साथ जूआ खेलने के लिये आदेश देना ( वन० ५९ । ४) । इनका राजा नल के साथ जूआ खेलना ( वन ०५९ । ९) । पुष्कर ने राजा नल का सर्वस्व जीत लिया था ( वन० ६१ । १) । इनका राजा नल के साथ पुनः जूआ खेलना और सर्वस्व हारना ( वन० ७८ । ४-२०) - द्वयोरेकतरे बुद्धिः क्रियतामद्य पुष्कर । कैतवेनाक्षवत्यां वा युद्धे वा नम्यतां धनुः ।। । नल से क्षमा माँगकर इनका अपनी राजधानी को लौट जाना (वन० ७८ । २७-२९) ( ) एक द्वीप, इसका विशेषरूप से वर्णन  ( भीष्म० १२ । २४-३७) - पुष्करे पुष्करो नाम पर्वतो मणिरत्नवान् ।। तत्र नित्यं प्रभवति स्वयं देवः प्रजापतिः । । ( ) पुष्करद्वीप का एक पर्वत, जो मणियों तथा रत्नों से भरा-पूरा है ( भीष्म० १२ । २४-२५)

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पुष्करद्वीप विष्णु २.४.७३( क्षीराब्धि के पुष्कर द्वीप से आवृत्त होने तथा पुष्कर में सवन - पुत्र महावीर के राजा? होने का उल्लेख  ), २.४.८५( पुष्कर द्वीप में न्यग्रोध के ब्रह्मा का स्थान होने का उल्लेख ; पुष्कर द्वीप के स्वादूदक उदधि से परिवेष्टित होने का उल्लेख - धातकीखण्डसंज्ञेऽथ महावीरे च वै मुने ॥ न्यग्रोधः पुष्करद्वीपे ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । ), द्र. पुष्कर