PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(From vowel i to Udara)

Radha Gupta, Suman Agarwal and Vipin Kumar

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I - Indu ( words like Ikshu/sugarcane, Ikshwaaku, Idaa, Indiraa, Indu etc.)

Indra - Indra ( Indra)

Indrakeela - Indradhwaja ( words like Indra, Indrajaala, Indrajit, Indradyumna, Indradhanusha/rainbow, Indradhwaja etc.)

Indradhwaja - Indriya (Indradhwaja, Indraprastha, Indrasena, Indraagni, Indraani, Indriya etc. )

Indriya - Isha  (Indriya/senses, Iraa, Iraavati, Ila, Ilaa, Ilvala etc.)

Isha - Ishu (Isha, Isheekaa, Ishu/arrow etc.)

Ishu - Eeshaana (Ishtakaa/brick, Ishtaapuurta, Eesha, Eeshaana etc. )

Eeshaana - Ugra ( Eeshaana, Eeshwara, U, Uktha, Ukhaa , Ugra etc. )

Ugra - Uchchhishta  (Ugra, Ugrashravaa, Ugrasena, Uchchaihshrava, Uchchhista etc. )

Uchchhishta - Utkala (Uchchhishta/left-over, Ujjayini, Utathya, Utkacha, Utkala etc.)

Utkala - Uttara (Utkala, Uttanka, Uttama, Uttara etc.)

Uttara - Utthaana (Uttara, Uttarakuru, Uttaraayana, Uttaana, Uttaanapaada, Utthaana etc.)

Utthaana - Utpaata (Utthaana/stand-up, Utpala/lotus, Utpaata etc.)

Utpaata - Udaya ( Utsava/festival, Udaka/fluid, Udaya/rise etc.)

Udaya - Udara (Udaya/rise, Udayana, Udayasingha, Udara/stomach etc.)

 

 

 

The divine powers lying dormant in a human being are worthy to be raised. These are called Ukthyas. Several forms of these appear in a sacrifice or the most efficient work. Several Ukthas ultimately help elevating the soma, a form of divine pleasure. Thus soma is Ukthya.  Before elevation of soma, semen remains in an elevated state When life force enters the body, the body itself is the Uktha, and the elevation process takes place through the waxing and waning of lungs. The raised divine powers demand food for themselves. It can be said that our gross body becomes food for them on which these forces survive.

–        Fatah Singh

 

उक्थ  / उक्थ्य

टिप्पणी : ( उक्थ और उक्थ्य के विषय में : ) मनुष्य व्यक्तित्व में जो दिव्य शक्ति छिपी है , वही उक्थ्य (ऊपर उठाने अर्थात् प्रकट करने योग्य ) है । इसके विभिन्न रूपांतर हमारे श्रेष्ठतम कर्म रूपी यज्ञ में प्रकट होते हैं । वही अनेक उक्थ हैं जो मनुष्य व्यक्तित्व में छिपे हुए होने पर अन्तर्हित यज्ञकाण्ड कहे जाते हैं – अपच्छिदिव वा एतदग्निकाण्डम् यद् उक्थानि - ताण्ड्य ब्राह्मण ११.११.२,१३.६.२ ,१४.६.१ । इन अनेक उक्थों की सहायता से ही ब्रह्मानन्द रूप सोम का भी उत्थापन संभव है ( तै.सं.२.२.८.७ ) । इस स्थिति में सोम ही उक्थ्य है , सोम के प्रादुर्भाव से पूर्व ओज नामक वीर्य ही अनेक उक्थों के रूप में उठा रहता है ( काठक सं.३७.८ ) । इन्हीं उक्थों के द्वारा मनुष्य की दिव्य शक्तियां ( देवा:) उसकी आंतरिक असुर शक्तियों के विरुद्ध उठ खडी होती हैं ( जै.ब्रा.१.१७९ ) । मोटे तौर पर प्राण जब शरीर में प्रवेश करते हैं , तो स्वयं शरीर ही उक्थ होता है , क्योंकि उसमें फेफडे फूलने आदि के रूप में उत्थापन क्रिया होती है ( ऐतरेय आरण्यक २.१.४ ) । इस दृष्टि से प्राण उक् ( उत्थापक ) होता है और अन्नमय कोश रूपी शरीर थम् ( उत्थितम् ) कहा जाता है - प्राणो वा उक् तस्य अन्नमेव थम् ( शतपथ ब्राह्मण १०.१.२.१०) । मनुष्य के आचरण रूप यज्ञ में प्रयुक्त वाक् ( षड्-विंश ब्राह्मण .१.५ ) आदि सभी अंगभूत शक्तियां उक्थ हैं , जब कि इनका आधारभूत शिर उक्थ्य कहा जाता है ( काठक सं.२७.१०) । श्रेष्ठतम कर्म अथवा आचरण ही वह यज्ञ है जहां प्राणाग्नि उक् है और उसमें पडने वाली कामादि की आहुतियां ही थम् है और दोनों के योग से होने वाला श्रेष्ठतम कर्म ही यज्ञ है ( शतपथ ब्राह्मण १०.६.२.८ ) । यज्ञ में जो श्रेष्ठतम उक्थ्य ( उठाये जाने योग्य तत्त्व ) है उसी व्यक्तित्व में सोमराज्य की स्थापना होती है ( मैत्रायणी सं.१.८.६ )। सोमराज्य की स्थापना का अर्थ है कि मनुष्य - व्यक्तित्व में होने वाले योगयज्ञ में प्रयुक्त होने वाली सभी अङ्गभूत शक्तियां श्रेष्ठतम कर्म रूप योगयज्ञ की पात्र बन जाती हैं और उनमें आत्मारूप इन्द्र का इन्द्रियं कहलाने वाला सोम उन सब यज्ञपात्रों का उक्थ्य पात्रम् हो जाता है ( सर्वेषां वा एतत् पात्राणां इन्द्रियं यदुक्थ्यपात्रम् - तै.सं.७.२.७.४, काठक सं.३०.१ ) –- फतहसिंह

The key to understand the word Uktha is the statement that Ukthya voice  is one by which all names get raised. This statement has been interpreted by Shri Vaasudeva in the way that a sleeping person is awakened by calling his name, This awakens his sleeping life forces. It has been stated that other life forces can be awakened by form and action for which observation/perception and atman have to be made Ukthyas( meaning – worthy to be raised). It is not sufficient merely to raise the life forces. It is also necessary to feed them after awakening. Uktha itself has been called the food. How is this true, is yet to be investigated. This food has to be ripened throughout the whole year.

          There are two types of sacrifices – Agnishtoma and Uktha. Agnishtoma is performed for Aadityaas, while Uktha is performed for Angirasaas. Aadityaas move fast, while Angirasaas proceed slowly. This is the main difference between the two. It is possible to state this fact in the way that there may be some life forces which may be awakened easily. For them, the first type of sacrifice, the faster one, will work. Those life forces which get awakened with difficulty, for them, Uktha type of ritual will work. The unconscious Aatmaa has been stated to be Ukthya, worthy to be raised. It has been stated that there are five Ukthas for raising Aatmaa – earth, air, sky, water and lights. Regarding earth, one can think of a Viraaja cow which is milked by all beings of the realm – by gods, humans, demons etc.

          There is a soma sacrifice lasting for 6 days. It’s first 3 days are termed as Jyooti/light, gau/cow and aayu/duration of life. These three have been equated with Agnishtoma, Uktha and Raatri/night. This throws light on what a vedic cow can be. According to this statement, a cow is the resultant of slow - awakening of life  forces. It is important to note that at another place, all the three have been stated to be worthy of being raised(Ukthya).

          One statement indicates that Ukthas are the gradual states after awakening from abstract meditation.

          The process of raising of consciousness can be equated with excitation of an electron in a cavity in modern day science. The fundamental requirement is that the  frequency of electron and the frequency of  excitation signal should match. And in resonant state, the electron may survive in it’s raised state for indefinite time. In the same way, there can be life forces which when once raised, may not decay to their original position. On the other hand, there may be other life forces which may decay to their earlier position early.

 

उक्थ ऋग्वेद के बहु प्रयुक्त शब्दों में से एक है । उक्थ शब्द की निरुक्ति इस प्रकार की गई है कि प्राण उक् बन सकता है, जबकि अन्न थम् है ( शतपथ ब्राह्मण १०.४.१.४,१५,२१ -२३ ,१०.६.२.८) । उक्थ को समझने की कुंजी हमें बृहदारण्यक उपनिषद १.६.१ से प्राप्त होती है जहां कहा गया है कि उक्थ्य वाक् वह है जिससे सारे नाम उठ खडे होते हैं । इस वाक्य की श्री वासुदेव कृत टीका में स्पष्ट किया गया है कि सोते हुए मनुष्य को उसका नाम लेकर जगाया जाता है । इससे उसके सोए हुए प्राण जाग उठते हैं । बृहदारण्यक उपनिषद में अन्य प्राणों को जगाने का उपाय रूप तथा क्रिया कहा गया है जिनके लिए क्रमशः चक्षु व आत्मा को उक्थ्य ( उक्थ बनने योग्य ) बनाने का निर्देश है । उक्थ शब्द की निरुक्ति से लगता है कि प्राणों को केवल उठाना या जगाना ही पर्याप्त नहीं है , अपितु जगे हुए प्राणों को जगाए रखने के लिए उनके लिए चाय - पानी का , अन्न का प्रबन्ध भी करना पडता है । पौराणिक साहित्य में उक्थ को दीपावली के पश्चात् गोवर्धन व अन्नकूट उत्सवों के माध्यम से समझा जा सकता है । पहले नाम आदि लेकर सारे देवताओं को , प्राणों को जगाकर गौ का रूप दिया जाता है ( पुष्टि के लिए , उदाहरणार्थ , ऋग्वेद ९.८७.३ ) । फिर उस गौ को इस योग्य बनाया जाता है कि वह सारे अन्नों का , सर्वश्रेष्ठ अन्नों का हमारे लिए भरण कर सके । वैदिक साहित्य में तो सार्वत्रिक रूप से ही उक्थ को अन्न कहा गया है  जिसे उत्पन्न करने के लिए सारे संवत्सर में अथवा ऋतुओं में पकाना पडता है ( शतपथ ब्राह्मण २.३.३.२० , ४.२.३.५ ) । यह एक जटिल प्रश्न लगता है कि अन्न व्यावहारिक रूप में कैसे उत्पन्न होगा ? ऐसा हो सकता है कि १२ स्तोत्रों वाले अग्निष्टोम में १२ स्तोत्र १२ मासों के , सूर्य की कला के प्रतीक हैं तो १५ स्तोत्रों वाले उक्थ में १५ स्तोत्र चन्द्रमा की कलाओं  संबंधित हो सकते हैं । चन्द्रमा को सूर्य का अन्न कहा जाता है ( शतपथ ब्राह्मण १०.६.२.९ ) ।

          वैदिक साहित्य में यज्ञों / क्रतुओं का क्रम प्रायः इस प्रकार आता है - अग्निष्टोम , उक्थ्य , षोडशी और अतिरात्र । अग्निष्टोम को अग्नि का स्तोम कहा जाता है। स्तोम शब्द स्तुति के अर्थों में है । जैमिनीय ब्राह्मण २.१२१ के अनुसार  अग्निष्टोम यज्ञ आदित्य हैं जबकि उक्थ यज्ञ अंगिरस हैं । अन्यत्र उल्लेख आता है कि आदित्य का मार्ग साधना में त्वरित गति का अनुसरण करके स्वर्ग पंहुचने का मार्ग है , जबकि अंगिरस प्राण मन्द गति से प्रगति का । जैमिनीय ब्राह्मण ३.३५९ के अनुसार उक्थ विभिन्न दिशाओं में स्थित होकर आदित्य के लिए स्तम्भ का कार्य करते हैं । ताण्ड्य ब्राह्मण १८.८.६ के अनुसार आत्मा / स्व द्वारा अग्निष्टोम की प्राप्ति की जाती है , जबकि पशु या विशः उक्था हैं । ताण्ड्य ब्राह्मण १९.५.११ में आत्मा को अग्निष्टोम तथा पशुओं को छन्द कहा गया है जिनकी आत्मा में प्रतिष्ठा करनी होती है ।

          तैत्तिरीय संहिता ३.१.२.४ के अनुसार स्तोम उक्थों के लिए पात्र का कार्य करते हैं । ऐसा संभव है कि जो प्राण पहले ही जाग्रत हैं अथवा सरलता से जाग्रत किए जा सकते हैं , उन्हें अग्निष्टोम की संज्ञा दी गई हो , जबकि मन्द गति से जाग्रत होने वाले प्राणों को उक्थ कहा गया हो । चेतन प्राणों के रूप में हम सामान्य रूप से केवल चेतन व अचेतन मन से ही परिचित हैं । लेकिन ऐतरेय आरण्यक २.३.१ का यह कथन कि पृथिवी , वायु , आकाश , आपः व ज्योvतियां , यह आत्मा के ५ उक्थ हैं, यह संकेत करता है कि अचेतन प्राणों को चेतन करने के यह चरण कहे गए हैं । यह उक्थों के विकास का ऊर्ध्वमुखी मार्ग हो सकता है । पृथिवी को उक्थ बनाने के संदर्भ में अथर्ववेद व पुराणों में वर्णित विराज गौ का उदाहरण दिया जा सकता है जिसे दुहकर विश्व के देवता , मनुष्य , ऋषि, सर्प , पितर आदि सभी मनोवांछित प्रकार का दुग्ध प्राप्त करते हैं । शतपथ ब्राह्मण ४.२.३.१ , ४.५.४.७ में अनिरुक्त आत्मा को उक्थ्य कहा गया है । वर्तमान समय में हम जिसे अचेतन कहते हैं , वैदिक भाषा में वह अनिरुक्त हो सकता है ।

          तैत्तिरीय संहिता १.६.९.१ में अग्निष्टोम की तुलना अग्निहोत्र से व उक्थ्य की पौर्णमासी से की गई है । ताण्ड्य ब्राह्मण २५.१०.७ में पौर्णमासी को गोष्टोम का स्तोम होने व बृहत् साम का उक्थ्य के रूप में होने का उल्लेख है । इसी प्रकार अमावास्या के दिन आयुष्टोम का स्तोम व रथन्तर साम का उक्थ्य के रूप में उल्लेख है । लेकिन तैत्तिरीय ब्राह्मण १.३.४.२ तथा ३.१२.५.६ में पृथिवी लोक की जय के लिए अग्निष्टोम तथा प्राणापानौ या अन्तरिक्ष की जय के लिए उक्थ्य का उल्लेख किया गया है जिसका स्पष्टीकरण अपेक्षित है । ऐतरेय आरण्यक २.१.२ में पृथिवी , अन्तरिक्ष तथा द्यौ , तीनों की ही उक्थ के रूप में व्याख्या की गई है । जैमिनीय ब्राह्मण २.३७५ आदि में अग्निष्टोम को ज्योvति, उक्थ्य को गौ तथा रात्रि को आयु कहा गया है , जबकि ताण्ड्य ब्राह्मण २२.१७.१ में दशरात्र क्रतु के संदर्भ में ज्योvति , गौ व आयु , तीनों का ही उक्थ्यों के रूप में उल्लेख है ।

          हरिवंश पुराण आदि में उक्थ को वज्रनाभ का पिता कहने के संदर्भ में , ब्राह्मण ग्रन्थों में सार्वत्रिक रूप से उल्लेख आता है ( उदाहरणार्थ , ऐतरेय ब्राह्मण ४.१, जैमिनीय ब्राह्मण १.२०१ ) कि उक्थ पशु हैं जबकि उक्थ्य के पश्चात् निष्पादित होने वाला षोडशी नामक क्रतु वज्र है जिससे पशुओं का नियंत्रण किया जाता है । ऋग्वेद ९.४७.३ के अनुसार सोम जो इन्द्रिय रस है, उक्थ बनने पर वज्र बन जाता है । ताण्ड्य ब्राह्मण २०.२.१, २०.३.१,२०.९.१ आदि में अग्निष्टोम के पश्चात् प्रत्यवरोहण करने वाले उक्थों का उल्लेख यह संकेत करता है कि उक्थ समाधि से व्युत्थान की क्रमिक अवस्था हैं जिनकी शक्ति का मूल स्रोत समाधि में ही है । गोपथ ब्राह्मण १.५.११ आदि में उक्थ अह / दिनों को सूत्र में मणि या मणि में सूत्र की भांति कहा गया है । अतः यह एक पहेली है कि सूत्र रूपी अग्निष्टोम मुख्य है या उक्थ रूपी मणि ।

          ऋग्वेद की ऋचाओं में उक्थ शब्द का प्रयोग बहुधा बहुवचन में किया गया है । ऋग्वेद १.१००.१४, १.१००.१७, ३.५३.३, ४.६.११ आदि में उक्थ का प्रयोग एकवचन में किया गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार जो एक उक्थ है , वह षोडशी है ।

          पुराणों में उक्थ को अनल - पुत्र कहने की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है कि अनल / अनर स्थिति नृत्य से रहित अवस्था , अग्निष्टोम क्रतु की अवस्था है , जबकि उक्थ नृत्य की । पुराणों में उक्थ की ब्रह्मा के दक्षिण आदि मुख से उत्पत्ति के कथन का वैदिक स्रोत अन्वेषणीय है । यदि शतपथ ब्राह्मण ४.२.२.१ के आधार पर दक्षिण और उत्तर , साधना की दो दिशाएं मानी जाएं तो समस्या का समाधान हो सकता है । जैमिनीय ब्राह्मण २.२९६, २.३२१ , २.३३३, २.३४७ आदि में तो अग्निष्टोम को ब्रह्म और पशुओं को उक्थ्य कहा गया है ।

          अग्निपुराण में उक्था को सामगान के ४ प्रकारों में से एक कहा गया है । ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं जैसे ८.३३.१३,८.५२.३ , ८.६३.२ ,८.९३.२७ में भी उक्था शब्द का प्रयोग हुआ है और एकमात्र अग्नि पुराण ही इस शब्द की सम्यक् व्याख्या करता है ।

          महाभारत में तीन उक्थों व एक उक्थ के उल्लेखों की व्याख्या का प्रयास बृहदारण्यक उपनिषद १.६.१ में वाक् , चक्षु व आत्मा तथा ५.१३.१ में प्राण को उक्थ कहने के आधार पर किया जा सकता है ।

          ब्राह्मण ग्रन्थों जैसे शतपथ ब्राह्मण ८.६.१.६ में यज्ञ की सोम प्रकार की संस्थाओं में बहिष्पवमान उक्थ, आज्य उक्थ, प्रउग उक्थ, मरुत्वतीय , निष्केवल्य , वैश्वदेव व अग्निमारुत उक्थों का उल्लेख आता है जो ५ दिशाओं से संबंधित हैं । इन ५ प्रकार के उक्थों का तात्पर्य अन्वेषणीय है । ब्राह्मण ग्रन्थों जैसे शतपथ ब्राह्मण ४.२.३.७ -९ , ९.५.२.१२ , १०.५.२१, जैमिनीय ब्राह्मण ३.३७९ में उक्थ को ऋग्वेद से, उद्गीथ को सामवेद से और अर्क को यजुर्वेद से सम्बद्ध किया गया है । ऋग्वेद १०.५४ से १०.५६ तक के सूक्त बृहदुक्थ वामदेव्य ऋषि के हैं ।

          जड जगत से सम्बन्धित वर्तमान भौतिक विज्ञान में परमाणुओं में इलेक्ट्रान आदि के उत्थान के लिए अनुनादित अवस्था को प्राप्त किया जाता है , वह अवस्था जिसमें इलेक्ट्रान की अपनी स्वयं के दोलन की आवृत्ति तथा बाहर से प्रयुक्त ऊर्जा की आवृत्ति एक जैसी हो जाएं । ऐसी अवस्था में इलेक्ट्रान का उत्थान हो जाता है । चेतना के विज्ञान में चेतना के उत्थान के लिए बाह्य अनुनादित ऊर्जा के रूप में स्तुति / स्तोम का प्रयोग किया जाता होगा , ऐसा अनुमान है । उत्थित होने वाली चेतना का नाम घर्म हो सकता है ( शतपथ ब्राह्मण ९.२.३.९ ) । भौतिक विज्ञान में इलेक्ट्रान आदि का उत्थान करते समय कुछ ऊर्जा का क्षय हो सकता है । जिन स्थितियों में उत्थान की प्रक्रिया में क्षय उपस्थित हो , उनकी तुलना चेतना विज्ञान के उक्थ्य से की जा सकती है ( ? ) । भौतिक जगत में उक् व थम् के मिलन की संभावनाओं का पता लगाया जाना अभी बाकी है ।

           ऋग्वेद की बहुत सी ऋचाओं जैसे १.८.१०, १.१३६.५, ३.५.२ , १०.४४.८ ,१०.४८.९, १०.६७.१ आदि में स्तोम व उक्थ का शंसन करने का उल्लेख एक साथ आता है । गोपथ ब्राह्मण २.६.१६ तथा ऐतरेय ब्राह्मण ६.३६ में ऐसे भी उक्थों का उल्लेख है जिनके लिए शंसन की आवश्यता नहीं पडती ।

 

          जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है , वैदिक साहित्य में आदित्यों की प्रगति स्तोमों द्वारा तथा आत्मा की उक्थों द्वारा कही गई है । डा कृष्ण चन्द्र शुक्ल , इन्दौर के अनुसार ब्रह्म के ईश्वर और जीव , दो भाग हो जाते हैं । भौतिक विज्ञान के माध्यम से इसकी व्याख्या का प्रयास इस प्रकार किया जा सकता है कि जहां केन्द्र या नाभि के परितः आवेश का वितरण पूर्ण रूप से वृत्ताकार या गोलीय है , वह ईश्वर की अवस्था के तुल्य है , जबकि उन दशाओं में जहां केन्द्र के परितः आवेश का वितरण अपने केन्द्र से विस्थापित है , वह अवस्था जीव को जन्म देती है । विस्थापित आवेश को केन्द्र के परित स्थापितः करने के लिए ही सारे जीव जगत का जन्म होता है । इस विस्थापित आवेश के कारण ही अहंकार , राग , द्वेष आदि उत्पन्न होते हैं ।

 

संदर्भ

उक्थ

१वाय उक्थेभिर्जरन्ते त्वामच्छा जरितारः। सुतसोमा अहर्विदः ॥ - ऋग्वेद १.२.२

२त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो। त्वां वर्धन्तु नो गिरः ॥ - ऋ.१.५.८

३एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या। इन्द्राय सोमपीतये ॥ - ऋ.१.८.१०

४ उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे। शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत् सस्येषु च ॥ - ऋ.१.१०.५

५इन्द्रः सहस्रदाव्नां वरुणः शंस्यानाम्। क्रतुर्भवत्युक्थ्यः ॥ - ऋ.१.१७.५

६स रेवाँ इव विश्पतिर्दैव्यः केतुः शृणोतु नः। उक्थैरग्निर्बृहद्भानुः ॥ - ऋ.१.२७.१२

७मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततनः। गाय गायत्रमुक्थ्यम् ॥ - ऋ.१.३८.१४

८प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्। - - ऋ.१.४०.५

९उक्थेभिरर्वागवसे पुरूवसू अर्कैश्च नि ह्वयामहे। - ऋ.१.४७.१०

१०सास्मासु धा गोमदश्वावदुक्थ्यमुषो वाजं सुवीर्यम् ॥ - ऋ.१.४८.१२

बृहत् स्वश्चन्द्रममवद् यदुक्थ्यमकृण्वत भियसा रोहणं दिवः। - ऋ.१.५२.९

११उक्था वा यो अभिगृणाति राधसा दानुरस्मा उपरा पिन्वते दिवः ॥ - ऋ.१.५४.७

१२अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः। - ऋ.१.६१.१३

१३धनस्पृतमुक्थ्यं विश्वचर्षणिं तोकं पुष्येम तनयं शतं हिमाः ॥ - ऋ.१.६४.१४

१४वीळु चिद् दृह्ळा पितरो न उक्थैरद्रिं रुजन्नङ्गिरसो रवेण। - ऋ.१.७१.२

१५सहस्राघो विचर्षणिरग्नी रक्षांसि सेधति। होता गृणीत उक्थ्यः ॥ - ऋ.१.७९.१२

१६तस्मिन् ब्रह्माणि पूर्वथेन्द्र उक्था समग्मतार्चन्ननु स्वराज्यम् ॥ - ऋ.१.८०.१६

१७अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः। - ऋ.१.८३.३

१८ग्रावा यत्र वदति कारुरुक्थ्यस्तस्येदिन्द्रो अभिपित्वेषु रण्यति। - ऋ.१.८३.६

१९इन्द्राय नूनमर्चतोvक्थानि च ब्रवीतन। सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः ॥ - ऋ.१.८४.५

२०अस्य वीरस्य बर्हिषि सुतः सोमो दिविष्टिषु। उक्थं मदश्च शस्यते ॥ - ऋ.१.८६.४

२१यस्याजस्रं शवसा मानमुक्थं परिभुजद् रोदसी विश्वतः सीम्। - ऋ.१.१००.१४

२२नव्यं तदुक्थ्यं हितं देवासः सुप्रवाचनम्। - ऋ.१.१०५.१२

२३अग्ने तव त्यदुक्थ्यं देवेष्वस्त्याप्यम्। - ऋ.१.१०५.१३

२४स नो नव्येभिर्वृषकर्मन्नुक्थैः पुरां दर्तः पायुभिः पाहि शग्मैः। - ऋ.१.१३०.१०

२५अथा दधाते बृहदुक्थ्यं वय उपस्तुत्यं बृहद् वयः ॥ - ऋ.१.१३६.२

२६उक्थैर्य एनोः परिभूषति व्रतं स्तोमैराभूषति व्रतम् ॥ - ऋ.१.१३६.५

२७अभी नो अग्न उक्थमिज्जुगुर्या द्यावाक्षामा सिन्धवश्च स्वगूर्ताः। - ऋ.१.१४०.१३

२८आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेमा हरी वहतस्ता नो अच्छ ॥ - ऋ.१.१६५.४

२९असद् यथा न इन्द्रो वन्दनेष्ठास्तुरो न कर्म नयमान उक्था ॥ - ऋ.१.१७३.९

३०ता वामद्य तावपरं हुवेमोच्छन्त्यामुषसि वह्निरुक्थैः। - ऋ.१.१८४.१

३१अत्रिमनु स्वराज्यमग्निमुक्थानि वावृधुः। - ऋ.२.८.५

३२अमर्त्यं चिद् दासं मन्यमानमवाभिनदुक्थैर्वावृधानः ॥ - ऋ.२.११.२

३३उक्थेष्विन्नु शूर येषु चाकन् त्स्तोमेष्विन्द्र रुद्रियेषु च। - ऋ.२.११.३

३४बृहन्त इन्नु ये ते तरुत्रोक्थेभिर्वा सुम्नमाविवासान्। - ऋ.२.११.१६

३५तदाहना अभवत्~ पिप्युषी पयोंऽशोः पीयूषं प्रथमं तदुक्थ्यम् ॥ - ऋ.२.१३.१

३६समानो अध्वा प्रवतामनुष्यदे यस्ताकृणोः प्रथमं सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.२

३७विश्वा एकस्य विनुदस्तितिक्षते यस्ताकृणोः प्रथमं सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.३

३८असिन्वन् दंष्ट्रैः पितुरत्ति भोजनं यस्ताकृणोः प्रथमं सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.४

३९तं त्वा स्तोमेभिरुदभिर्न वाजिनं देवं देवा अजनन् त्सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.५

४०स शेवधिं नि दधिषे विवस्वति विश्वस्यैक ईशिषे सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.६

४१यश्चासमा अजनो दिद्युतो दिव उरुरूर्वाf अभितः सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.७

४२ऊर्जयन्त्या अपरिविष्टमास्यमुतैवाद्य पुरुकृत् सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.८

४३अरज्जौ दस्यून् त्समुनब्दभीतये सुप्राव्यो अभवः सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.९

४४षळस्तभ्ना विष्टिरः पञ्च संदृशः परि परो अभवः सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.१०

४५जातूष्ठिरस्य प्र वयः सहस्वतो या चकर्थ सेन्द्र विश्वास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.११

४६नीचा सन्तमुदनयः परावृजं प्रान्धं श्रोणं श्रवयन् त्सास्युक्थ्यः ॥ - ऋ.२.१३.१२

४७आविस्तत् कृष्व यदसत् त उक्थ्यं बृहस्पते वि परिरापो अर्दय ॥ - ऋ.२.२३.१४

४८सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥ (दे.राका) - ऋ.२.३२.४

४९ऋतावानं यज्ञियं विप्रमुक्थ्यमा यं दधे मातरिश्वा दिवि क्षयम्। - ऋ.३.२.१३

५०मन्द्रं होतारं शुचिमद्वयाविनं दमूनसमुक्थ्यं विश्वचर्षणिम्। - ऋ.३.२.१५

५१प्रेद्वग्निर्वावृधे स्तोमेभिर्गीर्भिः स्तोतॄणां नमस्य उक्थैः। - ऋ.३.५.२

५२अग्निं वर्धन्तु नो गिरो यतो जायत उक्थ्यः। - ऋ.३.१०.६

५३प्र वामर्चन्त्युक्थिनो नीथाविदो जरितारः। इन्द्राग्नी इष आ वृणे ॥ - ऋ.३.१२.५

५४अग्निमुषसमश्विना दधिक्रां व्युष्टिषु हवते वह्निरुक्थैः। - ऋ.३.२०.१

५५तं शुभ्रमग्निमवसे हवामहे वैश्वानरं मातरिश्वानमुक्थ्यम्। - ऋ.३.२६.२

५६उक्थेषु कारो प्रति नो जुषस्व मा नो नि कः पुरुषत्रा नमस्ते ॥ - ऋ.३.३३.८

५७विवस्वतः सदने अस्य तानि विप्रा उक्थेभिः कवयो गृणन्ति ॥ - ऋ.३.३४.७

५८रारन्धि सवनेषु ण एषु स्तोमेषु वृत्रहन्। उक्थेष्विन्द्र गिर्वणः ॥ - ऋ.३.४१.४

५९इन्द्रं सोमस्य पीतये स्तोमैरिह हवामहे। उक्थेभिः कुविदागमत् ॥ - ऋ.३.४२.४

६०चर्षणीधृतं मघवानमुक्थ्यमिन्द्रं गिरो बृहतीरभ्यनूषत। - ऋ.३.५१.१

६१नृणामु त्वा नृतमं गीर्भिरुक्थैरभि प्र वीरमर्चतो सबाधः। - ऋ.३.५१.४

६२धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम्। इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः। - ऋ.३.५२.१

६३एदं बर्हिर्यजमानस्य सीदाऽथा च भूदुक्थमिन्द्राय शस्तम् ॥ - ऋ.३.५३.३

६४शुचीदयन् दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन् ॥ - ऋ.४.२.१६

६५कदा त उक्था सधमाद्यानि कदा भवन्ति सख्या गृहे ते ॥ - ऋ.४.३.४

६६सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः। - ऋ.४.४.७

६७अकारि ब्रह्म समिधान तुभ्यं शंसात्युक्थं यजते व्यू धाः। - ऋ.४.६.११

६८त्वदग्ने काव्या त्वन्मनीषास्त्वदुक्था जायन्ते राध्यानि। - ऋ.४.११.३

६९शंसात्युक्थमुशनेव वेधाश्चिकितुषे असुर्याय मन्म ॥ - ऋ.४.१६.२

७०श्रवस्यवः शशमानास उक्थैरोको न रण्वा सुदृशीव पुष्टिः ॥ - ऋ.४.१६.१५

७१नव्ये देष्णे शस्ते अस्मिन् त उक्थे प्र ब्रवाम वयमिन्द्र स्तुवन्तः ॥ - ऋ.४.२०.१०

७२ऋञ्जसानः पुरुवार उक्थैरेन्द्रं कृण्वीत सदनेषु होता ॥ - ऋ.४.२१.५

७३ब्रह्म स्तोमं मघवा सोममुक्था यो अश्मानं शवसा बिभ्रदेति ॥ - ऋ.४.२२.१

७४उत त्यं पुत्रमग्रुवः परावृक्तं शतक्रतुः। उक्थेष्विन्द्र आभजत्। - ऋ.४.३०.१६

७५ये हरी मेधयोक्था मदन्त इन्द्राय चक्रुः सुयुजा ये अश्वा। - ऋ.४.३३.१०

७६अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्यो रथस्त्रिचक्रः परि वर्तते रजः। - ऋ.४.३६.१

७७अथा देवेष्वमृतत्वमानश श्रुष्टी वाजा ऋभवस्तद् व उक्थ्यम् ॥ - ऋ.४.३६.४

७८यन्मा सोमासो ममदन्यदुक्थोभे भयेते रजसी अपारे ॥ - ऋ.४.४२.६

७९इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती। उक्थं मदश्च शस्यते। - ऋ.४.४९.१

८०यास्वीजानः शशमान उक्थैः स्तुवञ्छंसन् द्रविणं सद्य आप ॥ - ऋ.४.५१.७

८१विचक्षणः प्रथयन्नापृणन्नुर्वजीजनत् सविता सुम्नमुक्थ्यम् ॥ - ऋ.४.५३.२

८२वयं ते अग्न उक्थैर्विधेम वयं हव्यैः पावक भद्रशोचे। - ऋ.५.४.७

८३उतो न उत् पुपूर्या उक्थेषु शवसस्पत इषं स्तोतृभ्य आ भर ॥ - ऋ.५.६.९

८४चित्रा वा येषु दीधितिरासन्नुक्था पान्ति ये। स्तीर्णं बर्हिः स्वर्णरे श्रवांसि दधिरे परि ॥ - ऋ.५.१८.४

८५समिधानः सहस्रजिदग्ने धर्माणि पुष्यसि। देवानां दूत उक्थ्यः ॥ - ऋ.५.२६.६

८६पुरू यत् त इन्द्र सन्त्युक्था गवे चकर्थोर्वरासु युध्यन्। - ऋ.५.३३.४

८७अस्मा इत् काव्यं वच उक्थमिन्द्राय शंस्यम्। - ऋ.५.३९.५

८८विसर्माणं कृणुहि वित्तमेषां ये भुञ्जते अपृणन्तो न उक्थैः। - ऋ.५.४२.९

८९विदा दिवो विष्यन्नद्रिमुक्थैरायत्या उषसो अर्चिनो गुः। - ऋ.५.४५.१

९०अस्मा उक्थाय पर्वतस्य गर्भो महीनां जनुषे पूर्व्याय। - ऋ.५.४५.३

९१उक्थेभिर्हि ष्मा कवयः सुयज्ञा आविवासन्तो मरुतो यजन्ति ॥ - ऋ.५.४५.४

९२वेदी सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैरा ते भद्रायां सुमतौ यतेम ॥ - ऋ.६.१.१०

९३यस्ते यज्ञेन समिधा य उक्थैरर्केभिः सूनो सहसो ददाशत्। - ऋ.६.५.५

९४पुर उक्थेभिः स हि नो विभावा स्वध्वरा करति जातवेदाः ॥ - ऋ.६.१०.१

९५पीपाय स श्रवसा मर्त्येषु यो अग्नये ददाश विप्र उक्थैः। - ऋ.६.१०.३

९६यस्ते सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैर्यज्ञैर्मर्तो निशितिं वेद्यानट्। - ऋ.६.१३.४

९७कृष्वा कृत्नो अकृतं यत् ते अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यज्ञै: ॥ - ऋ.६.१८.१५

९८सुत इत् त्वं निमिश्ल इन्द्र सोमे स्तोमे ब्रह्मणि शस्यमान उक्थे। - ऋ.६.२३.१

९९सुते सोमे स्तुमसि शंसदुक्थेन्द्राय ब्रह्म वर्धनं यथासत् ॥ - ऋ.६.२३.५

१००अर्चत्र्यो मघवा नृभ्य उक्थैर्द्युक्षो राजा गिरामक्षितोतिः ॥ - ऋ.६.२४.१

१०१वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरिन्द्रानयन्त यज्ञैः। - ऋ.६.२४.६

१०२वृद्धस्य चिद् वर्धतामस्य तनूः स्तोमेभिरुक्थैश्च शस्यमाना ॥ - ऋ.६.२४.७

१०३त्वं तदुक्थमिन्द्र बर्हणा कः प्र यच्छता सहस्रा शूर दर्षि। - ऋ.६.२६.५

१०४इन्द्रं नरः स्तुवन्तो ब्रह्मकारा उक्था शंसन्तो देववाततमाः ॥ - ऋ.६.२९.४

१०५वर्धाद् यं यज्ञ उत सोम इन्द्रं वर्धाद् ब्रह्म गिर उक्था च मन्म। - ऋ.६.३८.४

१०६तद् व उक्थस्य बर्हणेन्द्रायोपस्तृणीषणि। - ऋ.६.४४.६

१०७नयसीद्वति द्विषः कृणोष्युक्थशंसिनः। नृभिः सुवीर उच्यसे ॥ - ऋ.६.४५.६

१०८इन्द्राग्नी उक्थवाहसा स्तोमेभिर्हवनश्रुता। - ऋ.६.५९.१०

१०९इदा विप्राय जरते यदुक्था नि ष्म मावते वहथा पुरा चित् ॥ -ऋ.६.६५.४

११०सत्यान्युक्था नकिर्देवेभिर्यतथो महित्वा ॥ - ऋ.६.६७.१०

१११सं वामञ्जन्त्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः ॥ - ऋ.६.६९.३

११२सद्यश्चिन्नु ते मघवन्नभिष्टौ शास उक्था। - ऋ.७.१९.९

११३तस्मा उक्थं जनये यज्जुजोषन्नृवन्नवीयः शृणवद् यथा नः ॥ - ऋ.७.२६.१

११४उक्थउक्थे सोम इन्द्रं ममाद नीथेनीथे मघवानं सुतासः। - ऋ.७.२६.२

११५शंसेदुक्थं सुदानव उत द्युक्षं यथा नरः। चकृमा सत्यराधसे ॥ - ऋ.७.३१.२

११६उक्थभृतं सामभृतं बिभर्ति ग्रावाणं बिभ्रत् प्र वदात्यग्रे। - ऋ.७.३३.१४

११७अब्जामुक्थैरहिं गृणीषे बुध्ने नदीनां रजःसु षीदन् ॥ - ऋ.७.३४.१६

११८य ईवतो वृषणो अस्ति गोपा सो अद्वयावी हवते व उक्थैः ॥ - ऋ.७.५६.१८

११९भूरि चक्र मरुतः पित्र्याण्युक्थानि या वः शस्यन्ते पुरा चित्। - ऋ.७.५६.२३

१२०इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत ॥ - ऋ.८.१.१

१२१उक्थं चन शस्यमानमगोररिरा चिकेत। न गायत्रं गीयमानं ॥ - ऋ.८.२.१४

१२२वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः। कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते ॥ - ऋ.८.२.१६

१२३गिरश्च यास्ते गिर्वाह उक्था च तुभ्यं तानि। सत्रा दधिरे शवांसि ॥ - ऋ.८.२.३०

१२४त्वामिच्छवसस्पते कण्वा उक्थेन वावृधुः। त्वां सुतास इन्दवः ॥ - ऋ.८.६.२१

१२५इन्द्रमुक्थानि वावृधुः समुद्रमिव सिन्धवः। अनुत्तमन्युमजरम्। - ऋ.८.६.३५

१२६इमां सु पूर्व्यां धियं मधोर्घृतस्य पिप्युषीम्। कण्वा उक्थेन वावृधुः ॥ - ऋ.८.६.४३

१२७यदद्य वां नासत्योक्थैराचुच्युवीमहि। - ऋ.८.९.९

१२८यन्नूनं धीभिरश्विना पितुर्योना निषीदथः। यद्वा सुम्नेभिरुक्थ्या ॥ - ऋ.८.९.२१

१२९यद्वासि सुन्वतो वृधो यजमानस्य सत्पते। उक्थे वा यस्य रण्यसि समिन्दुभिः ॥ - ऋ.८.१२.१८

१३०इन्द्रः सुतेषु सोमेषु क्रतुं पुनीत उक्थ्यम्। विदे वृधस्य दक्षसो महान् हि षः ॥-ऋ.८.१३.१

१३१स्तोता यत् ते अनुव्रत उक्थान्यृतुथा दधे। शुचिः पावक उच्यते सो अद्भुतः ॥ - ऋ.८.१३.१९

१३२त्वं हि स्तोमवर्धन इन्द्रास्युक्थवर्धनः। स्तोतॄणामुत भद्रकृत् ॥ - ऋ.८.१४.११

१३३तदद्या चित् त उक्थिनो ऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा। - ऋ.८.१५.६

१३४यस्मिन्नुक्थानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या। अपामवो न समुद्रे। - ऋ.८.१६.२

१३५अग्निरुक्थे पुरोहितो ग्रावाणो बर्हिरध्वरे। - ऋ.८.२७.१

१३६यदि मे रारणः सुत उक्थे वा दधसे चनः। आरादुप स्वधा गहि। - ऋ.८.३२.६

१३७पन्य इदुप गायत पन्य उक्थानि शंसत। ब्रह्मा कृणोत पन्य इत्। - ऋ.८.३२.१७

१३८स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः। - ऋ.८.३३.२

१३९नायमच्छा मघवा शृणवद् गिरो ब्रह्मोक्था च सुक्रतुः ॥- ऋ.८.३३.१३

१४०आ नो याह्युपश्रुत्युक्थेषु रणया इह। - ऋ.८.३४.११

१४१ऋभुक्षणं न वर्तव उक्थेषु तुग्र्यावृधम्। - ऋ.८.४५.२९

१४२य उक्थेभिर्न विन्धते चिकिद्य ऋषिचोदनः। - ऋ.८.५१.३

१४३य उक्था केवला दधे यः सोमं धृषितापिबत्। - ऋ.८.५२.३

१४४प्र सू तिरा शचीभिर्ये त उक्थिनः क्रतुं पुनत आनुषक्।। - ऋ.८.५३.६

१४५उक्थैरिन्द्रस्य माहिनं वयो वर्धन्ति सोमिनो भद्रा इन्द्रस्य रातयः। - ऋ.८.६२.१

१४६दिवो मानं नोत्सदन् त्सोमपृष्ठासो अद्रयः। उक्था ब्रह्म च शंस्या। - ऋ.८.६३.२

१४७कं ते दाना असक्षत वृत्रहन् कं सुवीर्या। उक्थे क उ स्विदन्तमः ॥ - ऋ.८.६४.९

१४८य आदृत्या शशमानाय सुन्वते दाता जरित्र उक्थ्यम् ॥ - ऋ.८.६६.२

१४९वयं तत् त इन्द्र सं भरामसि यज्ञमुक्थं तुरं वचः ॥ - ऋ.८.६६.५

१५०तेषां हि चित्रमुक्थ्यं वरूथमस्ति दाशुषे। आदित्यानामरंकृते ॥ - ऋ.८.६७.३

१५१तुभ्येदिन्द्र मरुत्वते सुता सोमासो अद्रिवः। हृदा हूयन्त उक्थिनः ॥ - ऋ.८.७६.८

१५२आ त्वशत्रवा गहि न्युक्थानि च हूयसे। उपमे रोचने दिवः ॥ - ऋ.८.८२.४

१५३वयमु त्वा शतक्रतो गावो न यवसेष्वा। उक्थेषु रणयामसि ॥ - ऋ.८.९२.१२

१५४आ ते दधामीन्द्रियमुक्था विश्वा शतक्रतो। स्तोतृभ्य इन्द्र मृळय ॥ - ऋ.८.९३.२७

१५५तमु ष्टवाम यं गिर इन्द्रमुक्थानि वावृधुः। - ऋ.८.९५.६

१५६एतो न्विन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्ना। शुद्धैरुक्थैर्वावृध्वांसं शुद्ध आशीर्वान् ममत्तु ॥ - ऋ.८.९५.७

१५७उक्थवाहसे विभ्वे मनीषां द्रुणा न पारमीरया नदीनाम्। - ऋ.८.९६.११

१५८तव श्रवांस्युपमान्युक्थ्या सुतेष्विन्द्र गिर्वणः ॥ -ऋ.८.९९.२

१५९स वीरं धत्ते अग्न उक्थशंसिनं त्मना सहस्रपोषिणम् ॥ - ऋ.८.१०३.४

१६०आ कलशेषु धावति पवित्रं परि षिच्यते। उक्थैर्यज्ञेषु वर्धतेv। - ऋ.९.१७.४

१६१यत् सोम चित्रमुक्थ्यं दिव्यं पार्थिवं वसु। तन्नः पुनान आ भर। - ऋ.९.१९.१

१६२पवस्व वृत्रहन्तमोक्थेभिरनुमाद्यः। शुचिः पावको अद्भुतः ॥ - ऋ.९.२४.६

१६३सप्तिं मृजन्ति वेधसो गृणन्तः कारवो गिरा। ज्योतिर्जज्ञानमुक्थ्यम् ॥ सुषहा सोम तानि ते पुनानाय प्रभूवसो। वर्धा समुद्रमुक्थ्यम् ॥ - ऋ.९.२९.२

१६४पुनान इन्दवा भर सोम द्विबर्हसं रयिम्। वृषन्निन्दो न उक्थ्यम्। - ऋ.९.४०.६

१६५आत् सोम इन्द्रियो रसो वज्रः सहस्रसा भुवत्। उक्थं यदस्य जायते ॥ - ऋ.९.४७.३

१६६संवृक्तधृष्णुमुक्थ्यं महामहिव्रतं मदम्। शतं पुरो रुरुक्षणिम्। - ऋ.९.४८.२

१६७अर्षा णः सोम शं गवे धुक्षस्व पिप्युषीमिषम्। वर्धा समुद्रमुक्थ्यम् ॥ - ऋ.९.६१.१५

१६८पवस्व सोम क्रतुविन्न उक्थ्यो ऽव्यो वारे परि धाव मधु प्रियम्।- ऋ.९.८६.४८

१६९दिवः पीयूषं पूर्व्यं यदुक्थ्यं महो गाहाद्दिव आ निरधुक्षत। - ऋ.९.११०.८

१७०अग्मन्नुक्थानि पौंस्येन्द्रं जैत्राय हर्षयन्। वज्रश्च यद्भवथो अनपच्युता समत्स्वनपच्युता ॥ - ऋ.९.१११.३

१७१विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यं वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः ॥ - ऋ.१०.११.५

१७२त्वां यज्ञेभिरुक्थैरुप हव्येभिरीमहे। शचीपते शचीनां वि वो मदे श्रेष्ठं नो धेहि वार्यं विवक्षसे ॥ - ऋ.१०.२४.२

१७३एते शमीभिः सुशमी अभूवन् ये हिन्विरे तन्वः सोम उक्थैः। - ऋ.१०.२८.१२

१७४समानमु त्यं पुरुहूतमुक्थ्यं रथं त्रिचक्रं सवना गनिग्मतम्। - ऋ.१०.४१.१

१७५समीचीने धिषणे वि ष्कभायति वृष्णः पीत्वा मद उक्थानि शंसति। - ऋ.१०.४४.८

१७६आ तं भज सौश्रवसेष्वग्न उक्थउक्थ आ भज शस्यमाने। - ऋ.१०.४५.१०

१७७पुरू सहस्रा नि शिशामि दाशुषे यन्मा सोमास उक्थिनो अमन्दिषुः ॥ - ऋ.१०.४८.४

१७८दिद्युं यदस्य समिथेषु मंहयमादिदेनं शंस्यमुक्थ्यं करम् ॥ - ऋ.१०.४८.९

१७९स्वां प्रजां बृहदुक्थो महित्वा ऽऽवरेष्वधादा परेषु। - ऋ.१०.५६.७

१८०सं यन्मित्रावरुणावृञ्ज उक्थैर्ज्येष्ठेभिरर्यमणं वरूथै: ॥- ऋ.१०.६१.१७

१८१वर्धदुक्थैर्वचोभिरा हि नूनं व्यध्वैति पयस उस्रियायाः ॥ - ऋ.१०.६१.२६

१८२उक्थशुष्मान् वृषभरान् त्स्वप्रसस्ताँ आदित्याँ अनु मदा स्वस्तये ॥ - ऋ.१०.६३.३

१८३उक्थेभिरत्र मतिभिश्च विप्रो ऽपीपयद्गयो दिव्यानि जन्म ॥ - ऋ.१०.६४.१६

१८४इमां धियं सप्तशीर्ष्णीं पिता न ऋतप्रजातां बृहतीमविन्दत्। तुरीयं स्विज्जनयद्विश्वजन्यो ऽयास्य उक्थमिन्द्राय शंसन् ॥ - ऋ.१०.६७.१

१८५देवानां नु वयं जाना प्र वोचाम विपन्यया। उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्यादुत्तरे युगे ॥ - ऋ.१०.७२.१

१८६अग्निमुक्थैर्ऋषयो वि ह्वयन्ते ऽग्निं नरो यामनि बाधितासः। - ऋ.१०.८०.५

१८७नीहारेण प्रावृता जल्प्या चाऽसुतृप उक्थशासश्चरन्ति॥ - ऋ.१०.८२.७

१८८तं त्वाहेम मतिभिर्गीर्भिरुक्थैः स यज्ञियो अभवो रोदसिप्राः ॥ - ऋ.१०.८८.५

१८९त्वं हर्यसि तव विश्वमुक्थ्यमसामि राधो हरिजात हर्यतम् ॥ - ऋ.१०.९६.५

१९०इन्द्र उक्थेन शवसा परुर्दधे बृहस्पते प्रतरीतास्यायुषः। - ऋ.१०.१००.५

१९१मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः ॥ - ऋ.१०.१०४.२

१९२तमेव ऋषिं तमु ब्रह्माणमाहुर्यज्ञन्यं सामगामुक्थशासम्। - ऋ.१०.१०७.६

१९३हर्षस्व हन्तवे शूर शत्रूनुक्थेभिष्टे वीर्या प्र ब्रवाम ॥ - ऋ.१०.११२.१

१९४सहस्रधा पञ्चदशान्युक्था यावद् द्यावापृथिवी तावदित् तत्। - ऋ.१०.११४.८

१९५छन्दः किमासीत् प्रउगं किमुक्थं यद्देवा देवमयजन्त विश्वे ॥ - ऋ.१०.१३०.३

१९६अनुष्टुभा सोम उक्थैर्महस्वान् बृहस्पतेर्बृहती वाचमावत्॥ - ऋ.१०.१३०.४

१९७बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे ॥- ऋ.१०.१४०.१

१९८इदं देवाः शृणुत ये यज्ञिया स्थ भरद्वाजो मह्यमुक्थानि शंसति। - अथर्ववेद २.१२.२

१९९इन्द्र उक्थामदान्यस्मिन् यज्ञे प्रविद्वान् युनक्तु सुयुजः स्वाहा। - अ.५.२६.३

२००वैश्वानरो न आगमदिमं यज्ञं सजूरुप। अग्निरुक्थेष्वंहसु ॥ वैश्वानरोऽङ्गिरसां स्तोममुक्थं च चाक्लृपत्। ऐषु द्युम्नं स्वर्यमत् ॥ - अ.६.३५.२-३

२०१सा (कुहू) नो रयिं विश्ववारं नि यच्छाद् ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥ - अ.७.४९.१

२०२सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम् ॥ (राका) - अ.७.५०.१

२०३पृतनाजितं सहमानमग्निमुक्थैर्हवामहे परमात् सधस्थात्। - अ.७.६५.१

२०४एकरात्रो द्विरात्रः सद्यःक्रीः प्रक्रीरुक्थ्यः। ओतं निहितमुच्छिष्टे यज्ञस्याणूनि विद्यया।। - अ.११.९.१०

२०५क्रव्यादमग्निं शशमानमुक्थ्यं हिणोमि पथिभिः पितृयाणै। - अ.१२.२.१०

२०६विप्रस्य वा यच्छशमान उक्थ्यो वाजं ससवाँ उपयासि भूरिभिः ॥ - अ.१८.१.२२

२०७सरस्वति या सरथं ययाथोक्थैः स्वधाभिर्देवि पितृभिमर्दन्ती। - अ.१८.१.४३

२०८शुचीदयन् दीध्यत उक्शासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन् ॥ - अ.१८.३.२१

२०९विवस्वतः सदने अस्य तानि विप्रा उक्थेभिः कवयो गृणन्ति ॥ - अ.२०.११.७

२१०वयमु त्वा तदिदर्था इन्द्र त्वायन्तः सखायः। कण्वा उक्थेभिर्जरन्ते। - अ.२०.१८.१

२११रारन्धि सवनेषु ण एषु स्तोमेषु वृत्रहन्। उक्थेष्विन्द्र गिर्वणः ॥ - अ.२०.२३.४

२१२इन्द्रं सोमस्य पीतये स्तोमैरिह हवामहे। उक्थेभिः कुविदागमत्। - अ.२०.२४.४

२१३अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचो यतस्रुचा मिथुना या सपर्यतः। - अ.२०.२५.३

२१४ग्रावा यत्र वदति कारुरुक्थ्यस्तस्येदिन्द्रो अभिपित्वेषु रण्यति। - अ.२०.२५.६

२१५त्वं हि स्तोमवर्धन इन्द्रास्युक्थवर्धनः। स्तोतॄणामुत भद्रकृत् ॥ - अ.२०.२९.१

२१६त्वं हर्यसि तव विश्वमुक्थ्यमसामि राधो हरिजात हर्यतम् ॥ - अ.२०.३०.५

२१७मिमिक्षुर्यमद्रय इन्द्र तुभ्यं तेभिर्वर्धस्व मदमुक्थवाहः ॥ - अ.२०.३३.१

२१८अस्येदु प्र ब्रूहि पूर्व्याणि तुरस्य कर्माणि नव्य उक्थैः। - अ.२०.३५.१३

२१९सद्यश्चिन्नु ते मघवन्नभिष्टौ नरः शंसन्त्युक्थशास उक्था। - अ.२०.३७.९

२२०यस्मिन्नुक्थानि रण्यन्ति विश्वानि च श्रवस्या। अपामवो न समुद्रे ॥ - अ.२०.४४.२

२२१स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः। कदा सुतं तृषाण ओक आ गम इन्द्र स्वब्दीव वंसगः ॥ - अ.२०.५२.२

२२२स्वरन्ति त्वा सुते नरो वसो निरेक उक्थिनः। - अ.२०.५७.१५

२२३एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या। इन्द्राय सोमपीतये। - अ.२०.६०.६

२२४तदद्या चित्त उक्थिनोऽनु ष्टुवन्ति पूर्वथा। वृषपत्नीरपो जया दिवेदिवे ॥ - अ.२०.६१.३

२२५त्वां स्तोमा अवीवृधन् त्वामुक्था शतक्रतो। त्वां वर्धन्तु नो गिरः ॥ - अ.२०.६९.६

२२६एवा ह्यस्य काम्या स्तोम उक्थं च शंस्या। इन्द्राय सोमपीतये ॥ - अ.२०.७१.६

२२७शंसात्युक्थमुशनेव वेधाश्चिकितुषे असुर्याय मन्म ॥ - अ.२०.७७.२

२२८इन्द्रमित् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुरुक्था च शंसत ॥ - अ.२०.८५.१

२२९तुरीयं स्विज्जनयद्विश्वजन्योऽयास्य उक्थमिन्द्राय शंसन् ॥ - अ.,२०.९१.१

२३०यद्वासि सुन्वतो वृधो यजमानस्य सत्पते। उक्थे वा यस्य रण्यसि समिन्दुभिः ॥ - अ.२०.१११.३

२३१यदद्य वां नासत्योक्थैराचुच्युवीमहि। यद्वा वाणीभिरश्विनेवेत्काण्वस्य बोधतम् ॥ - अ.२०.१४०.४

२३२यन्नूनं धीभिरश्विना पितुर्योना निषीदथः। यत्र सुम्नेभिरुक्थ्या ॥ - अ.२०.१४२.६

२३३ब्रह्मणः प्राशित्रहरणम् : तस्मादेतदृषिणाभ्यनूक्तम् -°° पिता यत् स्वां दुहितरमधिष्कन् क्ष्मया रेतः सञ्जग्मानो निषिञ्चत् °° इति। तदाग्निमारुतमित्युक्थम्। - शतपथ ब्रा. १.७.४.४

२३४सप्त चैव शतानि विंशतिश्च। संवत्सरे - संवत्सरे ह वा अस्याग्निहोत्रं महतोक्थेन सम्पद्यते। संवत्सरे - संवत्सरे महदुक्थमाप्नोति - य एवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति - एतदु हास्याग्निहोत्रं महतोक्थेन सम्पद्यते - महदुक्थमाप्नोति। - श. २.३.३.२०

२३५यद्युक्थ्यः स्यात्। मध्यमं परिधिमुपस्पृशेत्। त्रयः परिधयः - त्रीण्युक्थानि। एतै रु हि तर्हि यज्ञः प्रतितिष्ठति। - श. ३.९.३.३३

२३६आग्रयण ग्रहः : आत्मा ह्यस्यैषः, मध्यऽइव ह्ययमात्मा दक्षिणोक्थ्यस्थाली भवति, उत्तराऽऽदित्यस्थाली। - श.४.२.२.१६

२३७उक्थग्रहः : अयं ह वाऽअस्यैषोऽनिरुक्त आत्मा, यदुक्थ्यः, सोऽस्यैष आत्मैव। - श.४.२.३.१

२३८सैषा कामदुघैवेन्द्रस्योद्धारः। त्रिभ्य एवैनं प्रातःसवनऽउक्थेभ्यो विगृह्णाति, त्रिभ्यो माध्यन्दिने सवने - तत् षट्कृत्वः। षड्वाऽऋतवः। ऋतवो वाऽइमान्त्सर्वान्कामान्पचन्ति। - श.४.२.३.६

२३९तं वा अपुरोरुक्कं गृह्णाति। उक्थं हि पुरोरुक्। ऋग्घि पुरोरुक्। ऋग्घ्युक्थम्। -श.४.२.३.७

२४०ऋग्घि पुरोरुक्। ऋग्घ्युक्थम्। स यदेवैनमुक्थेभ्यो विगृह्णाति - तेनो हास्यैष पुरोरुङ्मान्भवति। - श.४.२.३.९

२४१उक्थाव्यं गृह्णामि इति। उक्थेभ्यो ह्येनं गृह्णाति। - श.४.२.३.१०

२४२तदु ह चरकाध्वर्यवो विगृह्णन्ति - उपयामगृहीतोऽसि देवेभ्यस्त्वा देवाव्ययम्। उक्थेभ्यः उक्थाव्यम्। - - -श.४.२.३.१५- १७

२४३विप्रुड् होमः : तद्धि सलोम - यदाग्नेयम् ; अग्निष्टोमऽआलभेत। यद्युक्थ्य स्यात् - ऐन्द्राग्नं द्वितीयमालभेत। ऐन्द्राग्नानि ह्युक्थानि। - श.४.२.५.१४

२४४स शुक्रामन्थिनौ प्रथमौ गृह्णाति। शुक्रवद्ध्येतत्सवनम्। अथाग्रयणम्। अथ मरुत्वतीयम्। अथोक्थ्यम्। उक्थ्यानि ह्यत्रापि भवन्ति। तद्धैके - उक्थ्यं गृहीत्वाऽथ मरुत्वतीयं गृह्णन्ति। तदु तथा न कुर्यात्। मरुत्वतीयमेव गृहीत्वाऽथोक्थ्यं गृह्णीयात्। - श.४.३.३.३

२४५पात्नीवत ग्रहः : यद्युक्थ्यः स्यात् - सोमं प्रभावयेति ब्रूयात्। - श.४.४.२.१८

२४६हारियोजन ग्रहः : शस्तोक्थस्य इति शस्तानि ह्युक्थानि भवन्ति। - श.४.४.३.११

२४७अनुबन्ध्यायागः यत्र वै देवा रेतः सिक्तं प्राजनयन् - तदाग्निमारुतमित्युक्थम्। - श.४.५.१.८

२४८माध्यन्दिने वैनान्त्सवने गृह्णीयात्। उक्थ्यं गृहीत्वा उपाकरिष्यन्वा पूतभृतः। अयं ह वाऽअस्यैषोऽनिरुक्त आत्मा - यदुक्थ्यः।- श.४.५.४.७

२४९आग्रयणपात्रम्, उक्थ्यपात्रम्, आदित्यपात्रम् - एतान्येवानु गावः प्रजायन्ते। तानि वै तानि पुनर्यज्ञे प्रयुज्यन्ते। - श.४.५.५.८

२५०पञ्च ह त्वेव तानि पात्राणि - यानीमाः प्रजा अनु प्रजायन्ते - समानमुपांश्वन्तर्यामयोः, शुक्रपात्रम्, ऋतुपात्रम्, आग्रयणपात्रम्, उक्थ्यपात्रम्। पञ्च वाऽऋतवः सम्वत्सरस्य। - श.४.५.५.१२

२५१पात्रावकाशमन्त्राः : अथोक्थ्यम् - ओजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व इति। - श.४.५.६.३

२५२अथ सोमातिरिक्तानाम्। यद्यग्निष्टोममतिरिच्येत - पूतभृत एवोक्थ्यं गृह्णीयात्। यद्युक्थ्यमतिरिच्येत - षोडशिनमुपेयुः। यदि षोडशिनमतिरिच्येत - रात्रिमुपेयुः। यदि रात्रिमतिरिच्येत - अहरुपेयुः। - श.४.५.१०.८

२५३विषुवदहः : यद्युक्थ्यः स्याद् - ऐन्द्राग्नं द्वितीयमालभेत। ऐन्द्राग्नानि ह्युक्थ्यानि। - श.४.६.३.३

२५४अग्निर्वाऽअग्निष्टोमः। अग्निष्टोममेवैतेनोज्जयति। ऐन्द्राग्नमुक्थेभ्यः आलभते। ऐन्द्राग्नानि वाऽउक्थानि उक्थान्येवैतेनोज्जयति। ऐन्द्रं षोडशिनऽआलभते। - श. ५.१.३.१

२५५केशवपनीय अतिरात्रः तस्यैकविंशं प्रातःसवनम्, सप्तदशं माध्यन्दिनं सवनम् पञ्चदशं तृतीयसवनम्। सहोक्थैः, सह षोडशिना, सह रात्र्या। - श.५.५.३.३

२५६बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यम् - इति। बलं वै शवः। बृहद्भानो बलेनान्नमुक्थ्यमित्येतत्। - श.७.३.१.२९

२५७पञ्चनाकसदिष्टकोपधानम् :  स पुरस्तादुपदधाति - - - - - - - -आज्यमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु इति। आज्येन हैषोक्थेनाव्यथायै पृथिव्यां स्तब्धा। - श.८.६.१.५

२५८अथ दक्षिणतः, प्रउगमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु इति। प्रउगेण हैषोक्थेनाव्यथायै पृथिव्यां स्तब्धा। - श.८.६.१.६

२५९अथ पश्चात्। - - - - - मरुत्वतीयमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु इति। मरुत्वतीयेन हैषोक्थेनाव्यथायै पृथिव्यां स्तब्धा। - श.८.६.१.७

२६०अथोत्तरतः। - - - - - - -निष्केवल्यमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु इति। निष्केवल्येन हैषोक्थेनाव्यथायै पृथिव्यां स्तब्धा। - श.८.६.१.८

२६१अथ मध्ये। - - - - -वैश्वदेवाग्निमारुते उक्थे अव्यथायै स्तभ्नीताम् इति। वैश्वदेवाग्निमारुताभ्यां हैषोक्थाभ्यामव्यथायै पृथिव्यां स्तब्धा। - श.८.६.१.९

२६२एकत्रिंशच्छन्दस्येष्टकोपधानम् : :सा - या सा श्रीः। महत्तदुक्थम्। तद्यत्तन्महदुक्थम् - एतास्ताश्छन्दस्याः। - श.८.६.२.२

२६३प्रतिष्ठा द्विपदाः। एतावद्वै महदुक्थम्। महदुक्थं श्रीः। - श.८.६.२.४

२६४तदाहुः - कथमस्यैतच्छतरुद्रियं महदुक्थमाप्नोति, कथं महतोक्थेन सम्पद्यत इति। - - - - - - - - अशीतिभिर्हि महदुक्थमाख्यायते। अथ यदूर्ध्वमशीतिभ्यो यदेवादो महत उक्थस्योर्ध्वमशीतिभ्यः - एतदस्य तत्।एवमु हास्यैतच्छतरुद्रियं महदुक्थमाप्नोति। एवं महतोक्थेन सम्पद्यते। - श.९.१.१.४४

२६५समिद्धे अग्नावधि मामहानः - इति। यजमानो वै मामहानः। उक्थपत्रः - इति। उक्थानि ह्येतस्य पत्राणि। - श.९.२.३.९

२६६तदाहुः - कथमस्यैषा वसोर्धारा महदुक्थमाप्नोति, कथं महतोक्थेन सम्पद्यते इति। - - - - - -- अशीतिभिर्हि महदुक्थमाख्यायते। अथ यदूर्ध्वमशीतिभ्यो- यदेवादो महत उक्थस्योर्ध्वमशीतिभ्यः एतदस्य तत्। एवमु हास्यैषा वसोर्धारा महदुक्थमाप्नोति, एवं महतोक्थेन सम्पद्यते।- श.९.३.३.१९

२६७उख्यसंभरणमीमांसा : स यद्यसंवत्सरभृते महदुक्थं शंसेद् - ऋगशीतीः शंसेत्। असर्वं वै तद् - यदसंवत्सरभृतः। - - - - - - यदि चासंवत्सरभृतः - सर्वमेव महदुक्थं शंसेत्। - श.९.५.१.६३

२६८त्रयो ह वै समुद्राः - अग्निर्यजुषाम्, महाव्रतं साम्नाम्, महदुक्थमृचाम्। - श.९.५.२.१२

२६९अथ योऽस्य सोऽग्रं रसोऽगच्छत् - महत्तदुक्थम्। तमस्य तं रसमृक्सामाभ्यामनुयन्ति। - श.१०.१.१.४

२७०तस्मिन् होता महतोक्थेन रसं दधाति। सर्वा हैता ऋचो यन्महदुक्थम्। - श.१०.१.१.५

२७१न वै महाव्रतमिदं स्तुतं शेत इति पश्यन्ति, नो महदिदमुक्थमिति। - श.१०.१.१.६

२७२स तृतीयं वयोविधमात्मानमपश्यत्। महदुक्थं तद्व्यधत्त। तेन दिवमाप्नोत्। श.१०.१.२.१

२७३अयं वाव लोकः - एषोऽग्निश्चितः। अन्तरिक्षं महाव्रतम्। द्यौर्महदुक्थम्। तस्मादेतानि सर्वाणि सहोपेयात्। अग्निम्, महाव्रतम्, महदुक्थम्। - श.१०.१.२.२

२७४अथाध्यात्मम्। मन एवाग्निः। प्राणो महाव्रतम्। वाङ्महदुक्थम्। - श.१०.१.२.३

२७५आत्मैवाग्निः। प्राणो महाव्रतम्। वाङ्महदुक्थम्। - श.१०.१.२.४

२७६शिर एवाग्नि। प्राणो महाव्रतम्। आत्मा महदुक्थम्। - - - - - - - -महदेवोक्थमातमां ख्यायते। आत्मा हि महदुक्थम्। - श.१०.१.२.५

२७७अशीतिभिर्हि महदुक्थमाख्यायते। - - - -ततो यानि पञ्चविंशतिः। स पञ्चविंश आत्मा। - - - - - -एतावद्वै महदुक्थम्। तदेतदत्रैव महदुक्थमाप्नोति। - श.१०.१.२.९

२७८अथ यत्तत्रोद्गातुः पुरस्ताज्जप्यम् - तच्छतरुद्रियम्। वसोर्धारा महदुक्थम्। - श.१०.१.५.३

२७९एष उ एवोक्। तस्यैतदन्नं थम्। तदुक्थम् - ऋक्तः। तदेतदेकं सत् - त्रेधाऽऽख्यायते। - श.१०.४.१.४ ,१५,२१,२२

२८०तस्मिन् (ग्रहे) होता महतोक्थेन रसं दधाति। सर्वा हैता ऋचो - यन्महदुक्थम्। - श.१०.४.१.१३

२८१प्राण उ एवोक् - तस्यान्नमेव थं तदुक्थं ऋक्तः। - श.१०.४.१.२३

२८२मण्डलपुरुषोपासनं ब्राह्मणम् : यदेतन्मण्डलं तपति - तन्महदुक्थम्। ता ऋचः, स ऋचां लोकः। - श.१०.५.२.१

२८३तस्मान्महदुक्थं परस्मै न शंसेत् - नेदेतां प्रतिष्ठां छिनदा इति। एतां ह स प्रतिष्ठां छिन्ते - यो महदुक्थं परस्मै शंसति। तस्मादुक्थशसं भूयिष्ठं परिचक्षते। - श.१०.५.२.५

२८४उक्थमिति बह्वृचाः, एष हीदं सर्वमुत्थापयति। - श.१०.५.२.२०

२८५उक्थविधोपासनम् : अथोक्थस्य। अग्निर्वा उक् तस्याहुतयः एव थम्। आहुतिभिर्ह्यग्निरुत्तिष्ठति। - श. १०.६.२.८

२८६आदित्यो वा उक्, तस्य चन्द्रमा एव थम्। चन्द्रमसा हि आदित्य उत्तिष्ठति इत्यधिदेवतम्। अथाध्यात्मम् - प्राणो वाऽउक्, तस्यान्नमेव थम्। अन्नेन हि प्राण उत्तिष्ठति - इति नु एवोक्थस्य। स एषोऽग्निविधः, अर्कविधः, उक्थविधः। यत् पुरुषः सः। यो हैतमेवमग्निविधमर्कविधमुक्थविधं पुरुषमुपास्ते। - श.१०.६.२.९

२८७उत नो ब्रह्मन्नविषऽउक्थेषु देवहूतमः। - - श.११.४.३.१९

२८८ते (देवाः) शताग्निष्टोमं सत्रमुपैम। ते यावदासीनः परापश्येत्तावतस्तमोऽपाहन्महि। एवमेव शतोक्थ्येन। यावत्तिष्ठन्परापश्येत्तावतस्तमोऽपाहन्महि। - - - - -स होवाच असर्वक्रतुभ्यां वै यज्ञाभ्यामगंत। यदग्निष्टोमेन चोक्थ्येन च। शतातिरात्रं सत्रमुपेत। - श.११.५.५.४

 

२८९सम्वत्सरे समुद्रप्रतरणोपासनम् : तदाहुः - कति संवत्सरस्यातिरात्राः। कत्यग्निष्टोमाः। कत्युक्थ्याः। कति षोडशिनः। - - -श.१२.२.१.६

२९०द्वादशशतमग्निष्टोमाः। द्वे चतुस्त्रिंशे शते उक्थ्यानाम्। द्वादश षोडशिनः। - श.१२.२.१.७

२९१एकविंशतिरुक्थ्याः। द्वादश वै मासाः संवत्सरस्य। पञ्चर्तवः। त्रयो लोकाः। तद्विंशतिः। एष एवैकविंशः। य एष तपति एतामभिसंपदम्। - - - - - -एक उक्थ्यः षोडशिमान्। अन्नं वा उक्थ्यः। वीर्यं षोडशी। -श.१२.२.२.७

२९२तद्वा एतत्त्रयं सह क्रियते। अग्निरर्क्यं महदुक्थ्यम्। - - - - - अथ यत्संवत्सरं सुत्याभिरेति, तेनो एवास्य महदुक्थ्यमाप्तं भवन्ति। - श.१२.३.३.१४

२९३अहं वै ते तद्वक्ष्यामि। यथा त उक्थ्यानि मणिरिव सूत्र ओतानि भविष्यन्ति। सूत्रमिव वा मणाविति। - - - - - - श.१२.३.४.२

२९४विंशतिशतं पुरस्तात् विषुवत उक्थ्यान्यहान्युपयन्ति। विंशतिशतमुपरिष्टात्। इति नु य उक्थ्यान् स्वरसाम्न उपयन्ति। - - - - -सप्तदशं शतं पुरस्तात् विषुवत उक्थ्यान्यहान्युपयन्ति। सप्तदशमुपरिष्टात्। - श.१२.३.५.१३

२९५अथ क्वैतस्य साम्न उक्थम्। का प्रतिष्ठा। - - - -त्रया देवा एकादशेति। एतद्वा एतस्य साम्न उक्थम्। एषा प्रतिष्ठा। - श.१२.८.३.२७

२९६तस्य हैकेऽग्निष्टोमसाम चतुःसाम कुर्वन्ति। नाग्निष्टोमः। नोक्थ्य इति वदन्तः। - श.१३.५.१.२

२९७उत्तर महिम ग्रहः :उक्थ्यो यज्ञः। तेनान्तरिक्षलोकमृध्नोति। - श.१३.५.३.९

२९८त्रयस्त्रिंशमग्निष्टोमसाम। एकविंशान्युक्थानि। एकविंशः षोडशी।- श.१३.५.३.१०

२९९त्रिवृदग्निष्टोमः। पंचदश उक्थ्यः सप्तदशं तृतीयमहः सोक्थकम्। एकविंशः षोडशी। - श.१३.५.४.९

३००द्वात्रिंशान्युक्थानि। एकविंशः षोडशी। - श.१३.५.४.१०

३०१एकविंशान्याज्यानि। त्रिणवान्युक्थानि। - - - - - -एकविंशान्युक्थानि। एकविंशः षोडशी। -- - - श.१३.५.४.२०

३०२पुरुषमेधः : तस्याग्निष्टोमः प्रथममहर्भवति। अथोक्थ्यः। अथातिरात्रः। अथोक्थ्यः। अथाग्निष्टोमः। स वा एष उभयतोज्योतिः। उभयतउक्थ्यः। श. १३.६.१.८

३०३पुरुषमेधः : अन्नमुक्थ्यः। आत्माऽतिरात्रः। तद्यदेता उक्थ्यावतिरात्रमभितो भवतः। तस्मादयमात्माऽन्नेन परिवृढः। - श.१३.६.१.९

३०४सर्वमेधः : इन्द्रस्तुदुक्थ्यो द्वितीयमहर्भवति। - - - - - - सूर्यस्तुदुक्थ्यस्तृतीयमहर्भवति। - श.१३.७.१.४

३०५त्र्यन्न ब्राह्मणं : त्रयं वा इदं नाम रूपं कर्म। तेषां नाम्नां वागित्येतदेषामुक्थ्यम्। अतो हि सर्वाणि नामान्युत्तिष्ठन्ति। - - - - अथ रूपाणाम्। चक्षुरित्येतदेषामुक्थ्यम्। अतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्ति। - - - - -अथ कर्मणाम्। आत्मेत्येतदेषामुक्थ्यम्। अतो हि सर्वाणि कर्माण्युत्तिष्ठन्ति। - श.१४.४.४.१

३०६प्राणोपासनाब्राह्मणम् : उक्थम्। प्राणो वा उक्थम्। प्राणो हीदं सर्वमुत्थापयति। उद्धास्मा उक्थविद्धीरस्तिष्ठति। उक्थस्य सायुज्यं सलोकतां जयति। - श.१४.८.१.४१

३०७देवाश्च ह वा असुराश्च संग्रामं समयतन्त। तत्रैतास्तिस्रो होत्रा जिह्मं प्रतिपेदिरे। तासामिन्द्र उक्थानि सामानि लुलोप। तानि होत्रे प्रायच्छत्। आज्यं ह वै होतुर्बभूव, प्रउगं पोतुः। - - - - - -गोपथ ब्राह्मण १.३.५

३०८एकविंशतिउक्थ्याः। एक उक्थ्यः षोडशी। अन्नं वा उक्थ्यो, वीर्यं षोडश्येव। - गो.ब्रा.१.४.२०

३०९अथ यद्द्वादशमासान् सुत्याभिः, तेनेदं महदुक्थमवाप्नोति। - - - - - - - - - - - -अथ यद्द्वादशाहं सुत्याभिः, तेनेदं महदुक्थमवाप्नोति। - गो.ब्रा.१.५.१०

३१०यजस्वैव हन्त तु ते तद् वक्ष्यामि, यथा सूत्रे मणिरिव सूतान्युक्थाहानि भवन्ति सूत्रमिव वा मणाविति। - गो.ब्रा.१.५.११

३११अग्निष्टोमो ऽत्यग्निष्टोम उक्थ्यः षोडशिमांस्ततः। वाजपेयो ऽतिरात्रश्चाप्तोर्यामात्र सप्तमः। इत्येते सुत्याः। - गो.ब्रा.१.५.२३

३१२ऋचो ऽस्य भागांश्चतुरो वहन्त्युक्थशस्त्रैः प्रमुदो मोदमानाः। - - - -गो.ब्रा. १.५.२४

३१३उक्थ्या वाजिनः। - गो.ब्रा.२.१.२२

३१४अथ यद्यहीन उक्थ्यः षोडशी वाजपेयो ऽतिरात्रो ऽप्तोर्यामा वा स्यात्, सर्वाभिः सर्वाभिरत ऊर्ध्वं व्याहृतिभिरनुजानाति, - - - --। - गो.ब्रा.२.२.१४

३१५हिंकृत्योक्थश ऋचार्त्विज्यं कुर्वन्ति। - गो.ब्रा.२.३.९

३१६गायत्रीमेवैतत् पुरस्तात् प्रातःसवने ऽचीक्लृपताम्। उक्थं वाचीत्याह शस्त्वा चतुरक्षरम्। ओमुक्थशा इत्यध्वर्युः प्रतिगृणाति चतुरक्षरम्। - - - - - - -त्रिष्टुभमेवैतत् पुरस्ताद् माध्यंदिने ऽचीक्लृपताम्। उक्थं वाचीन्द्रायेत्याह शस्त्वा षडक्षरम्। ओमुक्थशा यजेत्यध्वर्युः प्रतिगृणाति पञ्चाक्षरम्। - - - - - - -जगतीमेवैतत् पुरस्तात् तृतीयसवने ऽचीक्लृपताम्। उक्थं वाचीन्द्राय देवेभ्य इत्याह शस्त्वा नवाक्षरम्। ओमुक्थशा इत्यध्वर्युः प्रतिगृणाति त्र्यक्षरम्। तद् द्वादशाक्षरं संपद्यते। - गो.ब्रा.२.३.१०

३१७तस्मादेकमेवोक्थं होता मरुत्वतीयेन प्रतिपद्यते निष्केवल्यमेव। - गो.ब्रा.२.३.१२

३१८प्र वो मित्राय गायत इत्युक्थमुखम्। - गो.ब्रा.२.३.१३

३१९अयमु त्वा विचर्षणे इत्युक्थमुखम्। - गो.ब्रा.२.३.१४

३२०सद्यो ह जातो वृषभः कनीनः इत्युक्थमुखम्। - गो.ब्रा.२.४.१

३२१इन्द्रः पूर्भिदातिरद्दासमर्कैः इत्युक्थमुखम्। - गो.ब्रा.२.४.२

३२२भूय इद् वावृधे वीर्याय इत्युक्थमुखम्। - गो.ब्रा. २.४.३

३२३- - - - - -प्रगाथायोक्थमुखाय परिधानीयाया इति पञ्चकृत्व आह्वयन्ते। - गो.ब्रा.२.४.४

३२४पञ्चोक्थानि माध्यंदिनस्य सवनस्य। स एतैः पञ्चभिरुक्थैरेताः पञ्च दिश आप्नोति, -- - - -। - गो.ब्रा.२.४.४

३२५यदभ्युत्थायाहोरात्रयोः संधेर्निर्जघ्नुः, तस्मादुत्थाः। - - - -यदग्निरश्वो भूत्वा प्रथमः प्रजिगाय, तस्मादाग्नेयीभिरुक्थानि प्रणयन्ति। - - - - यत् पञ्च देवता अभ्युत्तस्थुः, तस्मात् पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते। - - - -एते ह वा एतान्  पञ्चभिः प्राणैः समीर्योदस्थापयन्। तस्मादु एवैताः पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते। - गो.ब्रा.२.४.११

३२६ये ह वा एनं पञ्चभिः प्राणैः समीर्योदस्थापयन् ता उ एवैताः पञ्च देवता उक्थे शस्यन्ते। - गो.ब्रा.२.४.१२

३२७अथ कस्माद् भूयिष्ठा देवता उक्थे शस्यन्त इति ? अन्तो वा आग्निमारुतमन्तरुक्थान्यन्त आश्विनम्। - - - - अथ कस्माद् भूयिष्ठा देवता उक्थे शस्यन्त इति ? द्वे द्वे उक्थमुखे भवतः, तद् यद्द्वे द्वे। - गो.ब्रा.२.४.१३

३२८अथ यदैन्द्रावरुणं मैत्रावरुणस्योक्थं भवति, ऐन्द्राबार्हस्पत्यं ब्राह्मणाच्छंसिन उक्थं भवति, ऐन्द्रावैष्णवमच्छावाकस्योक्थं भवति।- - - - - -। - गो.ब्रा.२.४.१४

३२९अथ यदैन्द्रावारुणं मैत्रावरुणस्योक्थं भवति - इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रतौ इत्यृचाभ्यनूक्तम्। - - - - -चर्षणीधृतं मघवानमुक्थ्यम् इत्युक्थमुखम्। --- - - - - - ऐन्द्रावरुणमस्यैतद् नित्यमुक्थम्। - गो.ब्रा.२.४.१५

३३०अथ यदैन्द्राबार्हस्पत्यं ब्राह्मणाच्छंसिन उक्थं भवति - इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पते - - - - - - - -। प्र मंहिष्ठाय बृहते बृहद्रये इत्युक्थमुखम्। - - - - -ऐन्द्राबार्हस्पत्यमस्यैतद् नित्यमुक्थम्। - गो.ब्रा.२.४.१६

३३१अथ यदैन्द्रावैष्णवमच्छावाकस्योक्थं भवति - इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं - - - -। ऋतुर्जनित्री तस्या अपस्परि इत्युक्थमुखम्। -- - - - - - - -ऐन्द्रावैष्णवमस्यैतद्, नित्यमुक्थम्। - गो.ब्रा.२.४.१७

३३२अथाध्वर्यो शंशंसावोमिति स्तोत्रियानुरूपायोक्थमुखाय परिधानीयाया इति चतुश्चतुराह्वयन्ते। - - - - - - - - -असौ वै लोकस्तृतीयसवनम्। तस्य पञ्च दिशः। पञ्चोक्थानि तृतीयसवनस्य। स एतैः पञ्चभिरुक्थैरेताः पञ्च दिश आप्नोति। - गो.ब्रा.२.४.१८

३३३पुरुषो वै यज्ञः। तस्य शिर एव हविर्धानम्, मुखमाहवनीयः, उदरं सदः, अन्नमुक्थानि, - - - - - -। - गो.ब्रा.२.५.४

३३४तदाहुः - यदेतत् साम गीयते, अथ क्वैतस्य साम्न उक्थम् ? का प्रतिष्ठा ? त्रया देवा एकादशेत्याहुः, एतद् वा एतस्य साम्न उक्थम्, एषा प्रतिष्ठा। - गो.ब्रा.२.५.७

३३५ता (प्रजाः) अतिरिक्तोक्थे वारवन्तीयेनावारयन्। तस्मादेषो ऽतिरिक्तोक्थवान् भवति। - गो.ब्रा.२.५.९

३३६तद् यथैवादो ऽह्न उक्थानामाग्नेयं प्रथमं भवति, एवमेवैतदत्राप्याग्नेयं प्रथमं भवति। - - - - - - ऐन्द्रावैष्णवमच्छावाकस्योक्थं भवति। चतुराहावान्यतिरिक्तोक्थानि भवन्ति। पशवो वा उक्थानि। - गो.ब्रा.२.५.१०

३३७तदाहुः -- कथं द्व्युक्थो होतैकसूक्त एकोक्था होत्रा द्विसूक्ता इति ? असौ वै होता यो ऽसौ तपति, स वा एक एव, तस्मादेकसूक्तः। - - - - - - - -रश्मयो वाव होत्रा, ते वा एकैकं, तस्मादेकोक्थाः। तद् यदेकैकस्य रश्मेर्द्वौ द्वौ वर्णौ भवतः, तस्माद् द्विसूक्ताः। संवत्सरो वाव होता, स वा एक एव, तस्मादेकसूक्तः। तस्य यद्द्वयान्यहानि भवन्ति शीतान्यन्यान्युष्णान्यन्यानि, तस्माद् द्व्युक्थः। ऋतवो वाव होत्राः, ते वा एकैकम्, तस्मादेकोक्थाः। - - - - - स यत् पुरुषो भवत्यन्यथैव प्रत्यङ् भवत्यन्यथा प्राङ्, तस्माद् द्व्युक्थः। अङ्गानि वाव होत्राः, तानि वा एकैकम्, तस्मादेकोक्थाः। तद् यदेकैकमङ्गं द्युतिर्भवति, तस्माद् द्विसूक्ताः। तदाहुः -- यद्द्व~युक्थो होतैकसूक्त एकोक्था होत्रा द्विसूक्ताः, कथं तत् समं भवति ?- - - - - - -। तदाहुः -- यदग्निष्टोम एव सति यज्ञे सर्वा देवताः सर्वाणि छन्दांस्याप्याययन्ति, अथ कतमेन छन्दसायातयामान्युक्थानि प्रणयन्ति, कया देवतयेति ? गायत्रेण छन्दसाग्निना देवतयेति ब्रूयात्। - गो.ब्रा.२.६.६

३३८आग्नेयीषु मैत्रावरुणस्योक्थं प्रणयन्ति। - - - - - - -ऐन्द्रीषु ब्राह्मणाच्छंसिन उक्थं प्रणयन्ति। - - - - -वीर्यं वा इन्द्रः, ब्रह्म बृहस्पतिः, पशव उक्थानि, वीर्येणैव तद् ब्रह्मणा चोभयतः पशून् परिगृह्णाति, स्थित्यै, अनपक्रान्त्यै। ऐन्द्रीष्वच्छावाकस्योक्थं प्रणयन्ति। - ३- - - - - -धराणि ह वा अस्यैतान्युक्थानि भवन्ति यद् नाभानेदिष्ठो वालखिल्यो वृषाकपिरेवयामरुत्। - गो.ब्रा.२.६.७

३३९एतेषां वा एषां शिल्पानां विश्वजिति सांवत्सरिके द्वे होतुरुक्थे माध्यंदिनमभिप्रच्यवेते, हन्ताहमित्थमेवयामरुतं शंसयानीति। - गो.ब्रा.२.६.९

३४०यद्वेवैनाः संशंसति, यद् नाभानेदिष्ठो वालखिल्यो वृषाकपिरेवयामरुदेतानि वा अत्रोक्थानि भवन्ति, तस्माद् न संशंसति। - गो.ब्रा.२.६.१६

३४१महावीर प्रवर्ग्य पात्र हेतु एकपातिनी ऋचाएं :परि त्वा गिर्वणो गिरोऽधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वचः - - -ऐतरेय ब्राह्मण१.१९

३४२अधि द्वयोरदधा उक्थ्यं वच इति, द्वयोर्ह्येतत्तृतीयं छदिरधि निधीयते, इति। उक्थ्यं वच इति यदाह यज्ञियं वै कर्मोक्थ्यं वचो यज्ञमेवैतेन समर्धयति, इति। -ऐ.ब्रा.१.२९

३४३प्रजापतेर्वा एतदुक्थं यत्प्रातरनुवाकस्तस्मिन्सर्वे कामा अवरुन्ध्यन्ते - ऐ.ब्रा.२.१७

३४४समस्यत्युत्तरे पदे तस्मात्पुमानूरू समस्यति तन्मिथुनं मिथुनमेव तदुक्थमुखे करोति प्रजात्यै। - ऐ.ब्रा.२.३५

३४५सा विराट् त्रयस्त्रिंशदक्षरा भवति त्रयस्त्रिंशद्वै देवा - -- - -तत्प्रथम उक्थमुखे देवता आक्षरभाजः करोत्यक्षरमेव तद्देवता अनुप्रपिबन्ति देवपात्रेणैव तद्देवता तृप्यन्ति। - - - -या वा आग्नेन्द्र्यैन्द्राग्नी वै सा सेन्द्राग्नमेतदुक्थं ग्रहेण च तूष्णींशंसेन च। - ऐ.ब्रा.२.३७

३४६अच्छिद्रोक्था कवयः शंसन्निति ये वा अनूचानास्ते कवयस्त इदमच्छिद्रं रेतः प्रजनयन्नित्येव तदाह।- - - - - - - -ब्रह्म वै बृहस्पतिः क्षत्त्रं सोम स्तुतशस्त्राणि नीथानि चोक्थामदानि च दैवेन चैवैतद्ब्रह्मणा प्रसृतो दैवेन च क्षत्रेणोक्थानि शंसति। - ऐ.ब्रा.२.३८

३४७ग्रहोक्थं वा एतद्यत्प्रउगं नव प्रातर्ग्रहा गृह्यन्ते नवभिर्बहिष्पवमाने स्तुवते - - - -। वायव्यं शंसति तेन वायव्य उक्थवान्। ऐन्द्रवायवं शंसति तेनैन्द्रवायव उक्थवान्। मैत्रावरुणं शंसति तेन मैत्रावरुण उक्थवान। आश्विन शंसति तेनाऽऽश्विन उक्थवान्। ऐन्द्रं शंसति तेन शुक्रामन्थिना उक्थवन्तौ। वैश्वदेवं शंसति तेनाऽऽग्रयण उक्थवान्। सारस्वतं शंसति। न सारस्वतो ग्रहोऽस्ति। वाक्तु सरस्वती ये तु के च वाचा ग्रहा गृह्यन्ते तेऽस्य सर्वे शस्तोक्थाः। उक्थिनो भवन्ति य एवं वेद। - ऐ.ब्रा.३.१

३४८यजमान का पुनर्जन्म : अन्नाद्यं वा एतेनावरुन्धे यत्प्रउगयन्याऽन्या देवता प्रउगे शस्यतेऽन्यदन्यदुक्थं प्रउगे क्रियते। अन्यदन्यदस्यान्नाद्यं गृहेषु य एवं वेद। एतद्ध वै यजमानस्याध्यात्मतमिवोक्थं यत्प्रउगं तस्मादेनेनैतदुपेक्ष्यतममिवेत्याहुरेतेन ह्येनं होता संस्करोति। वायव्यं शंसति - - - - -। ऐन्द्रवायवं शंसति - - - - - -। मैत्रावरुणं शंसति - - - -- - - -। आश्विनं शंसति - -- - - -। ऐन्द्रं शंसति - - -- - -। वैश्वदेवं शंसति - - - - -- -। सारस्वतं शंसति - - - - - - - - - ऐ.ब्रा.३.२

३४९प्राणानां वा एतदुक्थं यत्प्रउगं सप्त देवताः शंसति सप्त वै शीर्षन्प्राणाः शीर्षन्नेव तत्प्राणा दधाति। - ऐ.ब्रा.३.३

३५०विश्वेभिः सोम्यं मध्वग्न इन्द्रेण वायुना। पिबा मित्रस्य धामभिरिति वैश्वदेवमुक्थं शस्त्वा वैश्वदेव्या जयति यथाभागं तद्देवता प्रीणाति। - ऐ.ब्रा.३.४

३५१गर्भा वा एत उक्थानां यन्निविदस्तद्यत्पुरस्तादुक्थानां प्रातःसवने धीयन्ते तस्मात्पराञ्चो गर्भा धीयन्ते पराञ्चः संभवन्ति। पेशा वा एत उक्थानां यन्निविदस्तद्यत्पुरस्तादुक्थानां प्रातःसवने धीयन्ते यथैव प्रवयणतः पेशः कुर्यातादृक्तत्~ - - - - -। - ऐ.ब्रा.३.१०

 

३५२सौर्या वा एता देवता यन्निविदस्तद्यत्पुरस्तादुक्थानां प्रातःसवने धीयन्ते मध्यतो मध्यंदिने ततस्तृतीयसवन आदित्यस्यैव तद्व्रतमनु पर्यावर्तन्ते। - ऐ.ब्रा.३.११

३५३उक्थं वाचीन्द्रायेत्याह शस्त्वा सप्ताक्षरमोमुक्थशा इत्यध्वर्युश्चतुरक्षरं तदेकादशाक्षरं संपद्यत। - - - - - - - - उक्थं वाचीन्द्राय देवेभ्य इत्याह शस्त्वैकादशाक्षरमोमित्यध्वर्युरेकाक्षरं तद्द्वादशाक्षरं संपद्यते। - ऐ.ब्रा.३.१२

३५४तान्यु वा एतान्युपसदामेवोक्थानि यद्धाय्या अग्निर्नेतेत्याग्नेयी प्रथमोपसत्तस्या एतदुक्थं त्वं सोम क्रतुभिरिति सौम्या द्वितीयोपसत्तस्या एतदुक्थं पिन्वन्त्यप इति वैष्णवी तृतीयोपसत्तस्या एतदुक्थम्। - ऐ.ब्रा.३.१८

३५५सो (इन्द्रः)ऽवेदिमे वै लोक मे सचिवा इमे माऽकामयन्त हन्तेमानस्मिन्नुक्थ आभजा इति तानेतस्मिन्नुक्थ आभजदथहैते तर्ह्युभे एव निष्केवल्ये उक्थे आसतु। - - - -मरुत्वतीयमुक्थं शस्त्वा मरुत्वतीयया यजति यथाभागं तद्देवताः प्रीणाति। - ऐ.ब्रा.३.२०

३५६स एतं माहेन्द्रं ग्रहमब्रूत माध्यंदिनं सवनानां निष्केवल्यमुक्थानां त्रिष्टुभं छन्दसां - - - -। - ऐ.ब्रा.३.२१

३५७पाञ्चाजन्यं वा एतदुक्थं यद्वैश्वदेवं सर्वेषां वा एतत्पञ्चजनानामुक्थं देवमनुष्याणां गन्धर्वाप्सरसां सर्पाणां च पितृणां चैतेषां वा एतत्पञ्चजनानामुक्थं सर्व एनं पञ्चजना विदुः। - ऐ.ब्रा.३.३१

३५८अग्ने मरुद्भिः शुभयद्भिर्ऋक्वभिरित्याग्निमारुतमुक्थं शस्त्वाऽऽग्निमारुत्या यजति यथाभागं तद्देवताः प्रीणाति। - ऐ.ब्रा.३.३८

३५९इति नु पुरस्तादथोपरिष्ट्रात्पञ्चदशोक्थ्यस्य स्तोत्राणि पञ्चदश शस्त्राणि स मासो मासधा संवत्सरो विहित संवत्सरोऽग्निर्वैश्वानरोऽग्निष्टोमः संवत्सरमेवानूक्थ्यो ऽग्निष्टोममप्येत्युक्थ्यमपि यन्तमनु वाजपेयोऽप्येत्यत्युक्थ्यो हि स भवति। - ऐ.ब्रा.३.४१

३६०अग्निष्टोमं वै देवा अश्रयन्तोक्थान्यसुरास्ते समावद्वीर्या एवाऽऽसन्न व्यवर्तन्त तान्भरद्वाज ऋषीणामपश्यदिमे वा असुरा उक्थेषु श्रितास्तानेषां न कश्चन पश्यतीति सोऽग्निमुदह्वयत्। ऐह्यू षु ब्रवाणि ते ऽग्न इत्थvतरा गिर। असुर्या ह वा इतरा गिरः।- - - - - -भरद्वाजो ह वै कृशो दीर्घः पलित आस। सोऽब्रवीदिमे वा असुरा उक्थेषु श्रितास्तान्वो न कश्चन पश्यतीति। तानग्निरश्वो भूत्वाऽभ्यत्यद्रवद्यदग्निरश्वो भूत्वाऽभ्यत्यद्रवत्तत्साकमश्वं समाभवत्तत्साकमश्वस्य साकमश्वत्वम्। तदाहुः साकमश्वेनोक्थानि प्रणयेदप्रणीतानि वाव तान्युक्थानि यान्यन्यत्र साकमश्वादिति। प्रमंहिष्ठीयेन प्रणयेदित्याहुः प्रमंहिष्ठीयेन वै देवा असुरानुक्थेभ्यः प्राणुदन्त। - ऐ.ब्रा.३.४९

३६१ते वा असुरा मैत्रावरुणस्योक्थमश्रयन्त सोऽब्रवीदिन्द्र कश्चाहं चेमानितोऽसुरान्नोत्स्यावहा इत्यहं चेत्यब्रवीद्वरुणस्तस्मादैन्द्रावरुणं - - - -ते वै ततोऽपहता असुरा ब्राह्मणाच्छंसिन उक्थमश्रयन्त सोऽब्रवीदिन्द्रः कश्चाहं चेमानितोऽसुरान्नोत्स्यावहा इत्यहं चेत्यब्रवीद्बृहस्पतिस्तस्मादैन्द्राबार्हस्पत्यं ब्राह्मणाच्छंसी तृतीयसवने शंसति - - - ते वै ततोऽपहता असुरा अच्छावाकस्योक्थमश्रयन्त सोऽब्रवीदिन्द्रः कश्चाहं चेमानितोऽसुरान्नोत्स्यावहा इत्यहं चेत्यब्रवीद्विष्णुस्तस्मादैन्द्रावैष्णवम् अच्छावाकस्तृतीयसवने शंसति- - - - -ऐ.ब्रा.३.५०

३६२वज्रो वै षोळशी पशव उक्थानि तं परस्तादुक्थानां पर्यस्य शंसति। तं यत्परस्तादुक्थानां पर्यस्य शंसति वज्रेणैव तत्षोळशिना पशून्परिगच्छति -- - - - -ऐ.ब्रा.४.१

३६३चितैधमुक्थमिति ह स्म वा एतदाचक्षते यदेतदाश्विनं - - - - ऐ.ब्रा.४.१०

३६४उक्थ्यो भवति पशवो इति उक्थानि पशूनामवरुद्ध्यै। -ऐ.ब्रा.४.१२

३६५उक्थ्य एव स्यात्पशुसमृद्धो यज्ञः पशुसमृद्धं सत्रं सर्वाणि चतुर्विंशानि स्तोत्राणि प्रत्यक्षाद्ध्येतदहश्चतुर्विंशं तस्मादुक्थ्य एव स्यात्। - ऐ.ब्रा.४.१२

३६६आदित्यों व अङ्गिरसों में स्वर्ग लोक हेतु प्रतिस्पर्धा : यथा वा प्रायणीयोऽतिरात्रश्चतुर्विंश उक्थ्यः सर्वेऽभिप्लवाः षळहा आक्ष्यन्त्यन्यान्यहानि तदादित्यानामयनम्। प्रायणीयोऽतिरात्रश्चतुर्विंश उक्थः सर्वे पृष्ठ्याः षळहा अक्ष्यत्यन्याहानि तदङ्गिरसामयनम्। - ऐ.ब्रा.४.१७

३६७तदाहुर्विषुवत्येवैतदहः शंसेद्विषुवान्वा एतदुक्थानामुक्थं विषुवान्विषुवानिति ह विषुवन्तो भवन्ति श्रेष्ठतामश्नुवत। - ऐ.ब्रा.४.२२

३६८अनश्वो जातो अनभीशुरुक्थ्य इत्यार्भवं रथस्त्रिचक्र इति त्रिवत्तृतीयेऽहनि तृतीयस्याह्नो रूपम्। -ऐ.ब्रा.५.२

३६९भूर्भुवः स्वरित्युक्थ्ये वाऽतिरात्रे वा ब्रूयादिन्द्रवन्तः स्तुध्वमिति। - ऐ.ब्रा.५.३४

३७०अथाऽऽह यदेतास्तिस्र उक्थिन्यो होत्राः कथमितरा उक्थिन्यो भवन्तीति। आज्यमेवाऽऽग्नीध्रीयाया उक्थं मरुत्वतीयं पोत्रीयायै वैश्वदेवं नेष्ट्रीयायै ता वा एता होत्रा एवं न्यङ्गा एव भवन्ति। - ऐ.ब्रा.६.१४

३७१ऐरयेथामेरयेथामित्यच्छावाक उक्थ्येऽभ्यस्यति स हि तत्रान्त्यो भवति। - ऐ.ब्रा.६.१५

३७२एतानि वा अत्रोक्थानि नाभानेदिष्ठो वालखिल्या वृषाकपिरेवयामरुत्स यत्संशंसेदपैव स एतेषु कामं राध्नुयात्। - ऐ.ब्रा.६.३६

३७३उक्थ्य एवायं पञ्चदशः स्यादित्याहुरोजो वा इन्द्रियं वीर्यं पञ्चदश ओजः क्षत्रं वीर्यं राजन्यस्तदेनमोजसा क्षत्रेण वीर्येण समर्धयति। - - - -विराज्येवैनं तदन्नाद्ये प्रतिष्ठापयति तस्मात्तदुक्थ्यः पञ्चदशः स्यादित्याहुः। - ऐ.ब्रा.८.४

३७४- - - - - - -तं वाजपेयं तं षोडशिनं तम् उक्थ्यं तम् अग्निष्टोमं तम् इष्टिपशुबन्धांस् - - - -अभिसमभरन्। - जैमिनीय ब्राह्मण १.४

३७५एते असृग्रम् इन्दवः तिरः पवित्रम् आशवः इति। आशवः इति स्तोमान् विश्वानि इत्य् उक्थानि अभि सौभगा इत्य् एवैनान् जातान् सौभाग्येनाभ्यानक्। - जै.ब्रा.१.९४

३७६ते ऽसुरास् त्रयाणां सवनानां रसं वीर्यं प्रवृह्यान्धं तमः प्राविशन्। - - - -- - -ते देवा असुरान् अन्वभ्यवायन्। तान् असुरान् एतैर् एवोक्थैः प्रत्युदतिष्ठन्। यद् उक्थैः प्रत्युदतिष्ठंस् तद् उक्थानाम् उक्थत्वम्। - जै.ब्रा.१.१७९

३७७पशवो वा उक्थानि वज्रष् षोडशी। यद् उक्थानाम् अन्ततष् षोडशिना स्तुवन्ति वज्रेणैव तत् पशून् परिगृह्णन्त्य् अपरावापाय। - जै.ब्रा.१.२०१

३७८तद् आहुर् नोक्थष् षोडशी कार्य इति। पशवो वा उक्थानि वज्रष् षोडशी। - जै.ब्रा.१.२०२

३७९एषा वा उक्थस्य संमा यद्रात्रिः। त्रीण्य् उक्थानि त्रिदेवत्यस् संधिः। - - - - - -रात्र्या त्वाव त्रयोदशो मास आप्यते। - जै.ब्रा.१.२०६

३८०ब्रह्म वा अग्निष्टोमः। ब्रह्म वै ब्राह्मणस्य स्वम्। अग्निष्टोमं च ह्य् अतिमन्यत उक्थं च षोडशिनम्। तद् उ वा आहुर् अग्निष्टोममात्रं वावाग्निष्टोमेनाभिजयत्य् उक्थमात्रम् उक्थेन षोडशिमात्रं षोडशिना रात्र्या त्वाव सर्वम् अवरुन्द्ध इति। - जै.ब्रा.१.२०७

३८१आश्विनं ह खलु वै संधेर् उक्थम्। - जै.ब्रा.१.२०९

३८२चतुर्विंशत्यर्धमासस् संवत्सरश् चतुर्विंशति रात्र्या उक्थामदानि। - जै.ब्रा.१.२१२

३८३- - - इमं जम्भसुतं पिब धानावन्तं करम्भिणम् अपूपवन्तम् उक्थिनम् इति। - जै.ब्रा.१.२२०

३८४- - - - ऽत्य् उ वा एकविंशान्य् उक्थानि रात्रिर् एत्य् अथ केनैषाम् एकविंशम् अनु रात्रिस् संतिष्ठत इति। -जै.ब्रा.१.२३२

३८५कस्माद् यन्ति पवमानाः पराञ्चः कस्माद् उक्थ्या पुनर् अभ्याकनिक्रति इति। देवा अन्यां वर्तनिम् अध्वरस्य मानुषास उपजीवन्त्य् अन्याम्। तस्माद् यन्ति पवमानाः पराञ्चस् तस्माद् उक्थ्याः पुनर् अभ्याकनिक्रति इति।- जै.ब्रा.१.२७७

३८६अथोक्थानि छन्नमिश्राणीव गायेत्। अह्नो ह्य् उक्थानि अथ रात्रिम् आविर् एव गायेत्। छन्नेवाह्नो रात्रिः। - जै.ब्रा.१.३४०

३८७यदीतरे ऽग्निष्टोमं कुर्वीरन्न् अथात्मनोक्थ्यं कुर्वीरन्। यदीतर उक्थ्यं कुर्वीरन्न् अथात्मना षोडशिनं गृह्णीरन्। - - -- - -जै.ब्रा.१.३४४

३८८यदि तृतीयसवनात् सोमो ऽतिरिच्यते ऽतो उक्थ्यं कुर्वीरन्। यद्य् उक्थ्यम् अतिरिच्येत षोडशिनं गृह्णीरन्। - - - - -- जै.ब्रा.१.३५०

३८९यदि तृतीयसवने कलशो दीर्येतोvक्थ्यं कृत्वा यत् सोमम् इन्द्र विष्णवे इत्य् एतासु ब्रह्मसाम कुर्युः। - जै.ब्रा.१.३५२

३९०अथ यद् उक्थ्या भवन्ति। पशवो वा उक्थ्यानि। अन्नं पशवः। स यथान्नेन सह श्रेयांसं प्रतिनन्दन्तम् उपेयात् एवम् एवैनम् एतद् उक्थ्यै स्वरसामभिर् उपयन्ति। - - - - - - -तद् यद् उक्थान्य् अन्तरेण भवन्ति। पशवो वा उक्थानि। अन्नं पशवः। अन्नेनैतम् अशमयन्। - जै.ब्रा.२.७

३९१तान् (गर्भान्)उक्थैर् उत्थापयति। तद् उक्थानां उक्थत्वम्। तेभ्य एतद् देव्यं मध्व् अशीतीर् अन्नाद्यं प्रयच्छति। - जै.ब्रा.२.२४

३९२तद् धैतद् एके ऽभिप्लवस्य षष्ठम् अहर् उक्थ्यं कुर्वन्त्य् एवं सभारम् इति। - जै.ब्रा. २.३२

३९३अथ यास् तिस्रः परिशिष्टा आसुस् तानि हैवोक्थानि चक्रतुः। स एष उक्थ्यो यज्ञः। शश्वद् धैष एव प्रथम उक्थ्यानाम् - अथ ततो ऽग्निष्टोमा एव पराञ्चः।।- जै.ब्रा.२.८४

३९४स (मनुस्तोमः) उक्थ्यो भवति। प्रजा वै पशव उक्थानि। प्रजा वै पशवः प्रजननम्। - जै.ब्रा.२.१०८

३९५यजमानकामो वा एष यद्  ब्रह्मसाम। स्व एव तद् आयतने यजमानम् अन्नाद्येन समृद्ध्यन्ति। स उक्थ्यो भवति - प्रजा वै पशव उक्थानि। प्रजा वै पशव स्वर्गो लोक। जै.ब्रा.२.१०९

३९६प्रजापतिः पशून् असृजत। ते ऽस्मात् सृष्टाः प्राद्रवन्। तान् अग्निष्टोमेनाविवारयिषत। ते तद् अत्याद्रवन्। तान् उक्थ्येनाविवारयिषत। ते तद् अत्याद्रवन्। तान् - - - -। - जै.ब्रा.२.११०

३९७एहीळा एहीळा इति -- पशवो वा इळा -- तस्माद् एतान्य् अतिरिक्तोक्थानि कार्याणीति। - - - - - -तस्माद् एतान्य् अतिरिक्तोक्थानि कार्याण्य् एवेति। -जै.ब्रा.२.११२

३९८स (गोसवः) उक्थ्यो भवति -- प्रजा वै पशव उक्थानि। प्रजा वै पशव स्वर्गो लोक। - जै.ब्रा.२.११३

३९९स (विवधः) उक्थ्यो भवति -- पशवो वा उक्थानि -- पशूनाम् एवावरुद्ध्यै। - जै.ब्रा. २.११४

४००अग्निष्टोमयज्ञा वा आदित्या उक्थ्ययज्ञा अंगिरसः। स एष उक्थ्यो निदानेन सन्न् अग्निष्टोमः प्रत्याह्रियते क्षिप्रतायै। - जै.ब्रा.२.१२१

४०१स उक्थ्यो भवति। विड् वा उक्थानि। क्षत्रम् एव तद् विश्य~ अध्यूहन्ति। - जै.ब्रा.२.१४०

४०२तस्य प्रत्नं पीयूषं पूर्वं यद्  उक्थ्यम् इत्य् एताः सतोबृहतयो भवन्ति गायत्रीभाजनम्। - जै.ब्रा.२.१४२

४०३तस्य पञ्च स्तोत्राणि चतुस्त्रिंशानि कुर्युस् सर्वान् पवमानान् उभे ब्रह्मसामनी। तावतीर् उक्थ्यस्य स्तोत्र्याः। आप्नुवन्ति तं कामं य उक्थ्ये। नो वा अग्निष्टोमाद् यन्ति। न ह खलु वा एषो ऽग्निष्टोमो नोक्थ्यो न षोडशिमान् नातिरात्रः। - जै.ब्रा.२.१९२

४०४हाविष्मतम् एवोत्तरस्याह्न उक्थेषु ब्रह्मसाम कुर्युः। - जै.ब्रा.२.२३७

४०५अथ यस्यैतस्य ज्योतिर् उक्थ्यः पूर्वम् अहर् भवत्य् आयुर् अतिरात्र उत्तरम्, - - -- - - - -। - जै.ब्रा.२.२३८

४०६तस्य (प्राजापत्यस्य) अग्निष्टोमाव् अभितो भवत, उक्थ्यौ मध्ये। ब्रह्म वा अग्निष्टोमः, प्रजा पशव उक्थ्यानि। - जै.ब्रा. २.२८८

४०७अथ यस्यैतस्य ज्योतिषी अग्निष्टोमाव् अभितो भवतो, गोआयुषी उक्थ्याव् अन्तरौ, ज्योतिर् अतिरात्रो मध्ये, प्रजननकामो हैतेन यजेत। - -- - - - -गोआयुषी उक्थ्याव् अन्तरौ भवतः। पशवो वा उक्थानि। - - - - अथ यस्यैतस्य ज्योतिषी अतिरात्राव् अभितो भवतो, गोआयुषी उक्थ्याव् अन्तरौ, ज्योतिर् अग्निष्टोमो मध्ये, - - - -। गोआयुषी उक्थ्याव् अन्तरौ भवतः। पशवो वा उक्थानि। - जै.ब्रा.२.२९६

४०८अथ यस्यैतस्य विश्वजिद् अभिजिताव् अतिरात्राव् अभितो भवतो, गौर् आयुर् गौर् आयुर् इति चत्वार उक्थ्या मध्ये, पशुकामो हैतद् उपेयुः। - - - -अथैते चत्वारो मध्य उक्थ्या भवन्ति। पशवो वा उक्थानि। - जै.ब्रा.२.३००

४०९संवत्सरो वा एष यद्  अग्निष्टोमः। - - - -अथैकविंशैर् उक्थ्यै रात्रिम् उपावरोहेयुर् इति। - जै.ब्रा.२.३०४

४१०- - - -चत्वार एते मध्य उक्थ्या भवन्ति। पशवो वा उक्थानि। तेषां सहस्रं स्तोत्र्याः। - - -जै.ब्रा.२.३१५

४११अथैष विविधः। तस्य ज्योतिर् अग्निष्टोमो गौर् उक्थ्य आयुर् उक्थ्यो ज्योतिर् अग्निष्टोम आयुर् अतिरात्रो ज्योतिर् अग्निष्टोमो गौर् उक्थ्य आयुर् उक्थ्यो ज्योतिर् अग्निष्टोमः। पशुकामो हैतेन यजेत। तस्यैषो ऽन्यतस्संगो गोआयुषी उक्थ्याव् अन्तरौ भवतः। पशवो वा उक्थानि। - - - - - -। - जै.ब्रा.२.३२१

४१२अथैष कुसुर्विन्ददशरात्रः। तस्य त्रयस् त्रिवृतो ऽग्निष्टोमास् त्रयः पञ्चदशा उक्थ्यास् त्रयस् सप्तदशा उक्थ्या ज्योतिर् अतिरात्रो, - - - - -। -जै.ब्रा.२.३३२

४१३अथैषो ऽभ्रिर् उभयतः क्ष्णूः। तस्य त्रिवृद् अग्निष्टोमः पुरस्ताद् भवति, त्रिवृद् अग्निष्टोम उपरिष्टाद्, अष्टाव् उक्थ्याः सप्तदशा मध्ये।- - - - - - --ब्रह्म वा अग्निष्टोमः, पशव उक्थानि। ब्रह्मणैव तद् उभयतः पशून् परिगृह्णीते ऽपरावापाय।  - जै.ब्रा.२.३३३

४१४अथैते सप्ताहा भवन्ति।- - - - - - अग्निष्टोमाः परस्ताद् भवन्त्य्, अग्निष्टोमा अवस्ताद्, उक्थ्या मध्ये। ब्रह्म वा अग्निष्टोमः, पशव उक्थ्यानि। - जै.ब्रा.२.३४७

४१५पूर्वस्याह्नस् सौभरम् उक्थेषु ब्रह्मसामं कुर्युर् यद्य् उभे बार्हते अहनी संपद्येयाताम्। - जै.ब्रा.२.३५८

४१६- - - - -अग्निष्टोमाद् एव ज्योतिर् निरमिमीत, उक्थ्येभ्यो गां, रात्र्या आयुः। -जै.ब्रा.२.३७५

४१७पशवो वा उक्थानि - तेभ्यो हि यन्ति। तस्य त्रीणि स्तोत्राण्य् अष्टाचत्वारिंशानि कुर्युर् पवमानौ ब्रह्मसाम। तावतीर् उक्थ्यस्य स्तोत्र्याः। आप्नुवन्ति तं कामं य उक्थ्ये, नो वा अग्निष्टोमाद् यन्ति। - जै.ब्रा.२.३७८

४१८तद् आहुर् विलोमेव वा एतद् यज्ञः क्रियते यदाग्निष्टोमौ विश्वजिदभिजितौ भवतो ऽग्निष्टोमो विषुवान् उक्थ्या स्वरसामानः। - जै.ब्रा.२.३८७

४१९त उ वा उक्थ्या भवन्ति - पशवो वा उक्थान्य्, अन्नं पशवः - पशुभ्यो ऽन्नाद्यात् प्रजां नेद् अन्तरयामेति। - जै.ब्रा.२.३८८

४२०- - -तेनाग्निष्टोमः। तान्य् उ एव द्वादश सन्ति पञ्चदश चतुर्विंशानि स्तोत्राणि भवन्ति। तेनोक्थ्यः। स वा एषो ऽग्निष्टोमस् सन्न् उक्थ्य, उक्थ्यस् सन्न् अग्निष्टोमः। उभौ ह तौ कामाव् उपाप्नोति यश् चाग्निष्टोमे यश् योक्थ्ये य एवं वेद। - जै.ब्रा.२.४३८

४२१- - - -त एते चत्वारो मध्य उक्थ्या भवन्ति। पशवो वा उक्थानि। तेषां सहस्रं स्तोत्र्याः। - जै.ब्रा.२.४४२

४२२एते वै सर्वे यज्ञक्रतवो यद्  अग्निष्टोम उक्थो ऽतिरात्रः। - जै.ब्रा.३.८

४२३यद् एतान्य् अष्टाव् अहानि मध्य उक्थ्यानीति, न तत्र जाम्य् अस्तीति ब्रूयात्। पशवो वा उक्थानि। पशून् एवैतत् पशुभिस् समाकरोति। - जै.ब्रा.३.९

४२४एतस्माद् ध वा इदं ब्राह्मणानां राज्ञाम् इव प्रकाशो यद्गायत्रीषूक्थं ब्रह्मसाम भवति। - जै.ब्रा.३.३४

४२५तासु सत्रासाहीयम् उक्तब्राह्मणम्। तद् उक्थसाम भवति - पशवो वा उक्थानि -  पशूनाम् एवावरुद्ध्यै। तद् आहुर् उक्थसाम सत् पवमाने क्रियते कस्मात् तद् इति। - - - - तद् यद् अत्र सत्रासाहीयं क्रियते तेनैनद् उक्थेभ्यो न च्यावयन्ति। - - - - अथो पशवो वा उक्थान्य्, आत्मा मध्यन्दिनः। - जै.ब्रा.३.६९

४२६अथैतद् उक्थभाजनम्। उक्थानां वा एष एको यत् षोडशी। - जै.ब्रा. ३.८३

४२७यत् सोम चित्रम् उक्थ्यम् इति चित्रवतीर् भवन्ति - चित्ररूपा वै पशवः। - जै.ब्रा.३.१०१

४२८एतो न्व~ इन्द्रं स्तवाम शुद्धं शुद्धेन साम्ना। शुद्धैर् उक्थैर् वावृध्वांसं शुद्धैर् आशीर्वान् ममत्तु इति। ततो वा इन्द्रश् शुद्धः पूतो मेध्यो ऽभवत्~। - जै.ब्रा.३.२२८

४२९इन्द्रम् इत् स्तोता वृषणं सचा सुते मुहुर् उक्था च शंसत। अवक्रक्षिणं वृषभं यथाजुवं गां न चर्षणीसहम्। इति। - जै.ब्रा.३.२९३

४३०स (प्रजापतिः) एतान् अष्टाव् उक्थ्यान् अष्टातयान् पशून् दिशो ऽनुव्यतनोद् वामदेव्यम् अन्तरिक्षम्, - - - - जै.ब्रा.३.३१८

४३१तस्यैषा देवता दीक्षमाणस्य तेज इन्द्रियं वीर्यं यशो नादत्ते। तद् एतद् उक्थस्यैव स्तम्भः। ते ये ऽर्वाञ्चो रश्मयस् तैर् अस्येमे लोका स्तब्धा य एतस्माद् अर्वाञ्चो, ऽथ यत् किं च प्राणभृत् सशरीरम्। अथ य ऊर्ध्वास् - - - -। - जै.ब्रा.३.३५९

४३२अथ यद् धा इत्य् एष हीदं सर्वं हरति। स एष एवोक्थ्यम्। एष हीदं सर्वम् उत्थापयतीव। तस्माद् एष एवोक्थम्। - जै.ब्रा.३.३७९

४३३आज्यानां प्रथमा (विष्टुतिः) पृष्ठानां द्वितीयोक्थानां तृतीया। याज्यानां सा होतुर्य्या पृष्ठानां सा मैत्रावरुणस्य योक्थानां सा ब्राह्मणाछंसिनो ---------- - - - - - - - - - -- - - - - - - - - - - -ताण्ड~य ब्राह्मण ३.११.२

४३४यज्ज्योतिष्टोमो भवति यज्ञमुखन्तदृध्नुवन्ति यदुक्थो यज्ञक्रतोरनन्तरयाय यद्रात्रिः सर्वस्याप्त्यै। - तां.ब्रा.४.१.६

४३५यावत्यश्चतुर्विंशस्योक्थस्य स्तोत्रीयास्तावत्यः संवत्सरस्य रात्रयः स्तोत्रीयाभिरेव तत् संवत्सरमाप्नुवन्ति। - तां.ब्रा.४.२.७

४३६यद्युक्थं स्मात्रैककुभञ्चोद्वंशीयञ्चान्तत प्रतिष्ठाप्ये वीर्य्यं वा एते सामनी वीर्य्य एवान्ततः प्रतितिष्ठन्ति।- तां.ब्रा.४.२.१०

४३७अथो खल्वाहुरुक्थमेव कार्य्यमह्नः समृद्ध्यै। - तां.ब्रा.४.२.१३

४३८तानाहुरुक्था कार्य्या अग्निष्टोमा इति यद्युक्थाः स्युः। पशवो वा उक्थानि शान्तिः पशव शान्तेनैव तद्विषुवन्तमुपयन्ति। तदाहुर्विवीवधमिव वा एतद् यदग्निष्टोमो विषुवानग्निष्टोमौ विश्वजिदभिजितावथेतर उक्थाः स्युरिति। - तां.ब्रा.४.५.१९

४३९यद्युत्सृजेयुरुक्थान्युत्सृजेयुस्तदेवोत्सृष्टं तदनुत्सृष्टं। - तां.ब्रा.५.१०.५

४४०देवा वा अग्निष्टोममभिजित्योक्थानि नाशक्नुवन्नभिजेतुं तेऽग्निमब्रुवंस्त्वया मुखेनेदञ्जयामेति सोऽब्रवीत् किम्मे ततः स्यादिति यत्कामयस इत्यब्रुवन् सोऽब्रवीन्मद्देवत्यासूक्थानि प्रणयानिति। तस्मादाग्नेयीषूक्थानि प्रणयन्ति। - तां.ब्रा.८.८.२

४४१तस्मात्साकमश्वेनोक्थानि प्रणयन्त्येतेन हि तान्यग्रेऽभ्यजयन्। - - - -तां.ब्रा.८.८.५

४४२पशून् वा एभ्यस्तानाहरत्पशवो वा उक्थानि पशुकाम उक्थेन स्तुवीत पशुमान् भवति। - तां.ब्रा.८.८.८

४४३यदि बृहत्सामातिरात्रः स्यात्सोभरमुक्थानां ब्रह्मसाम कार्य्यं बृहदेव तत्तेजसा समर्द्धयति। - तां.ब्रा.८.८.११

४४४नार्मेध साम :विच्छन्दस ऋचो भवन्त्यहोरात्रयो रूपं। नैव ह्येतदह्नोरूपं न रात्रेर्य्यदुक्थानां। - तां.ब्रा.८.८.२५

४४५गायत्रीषु ब्रह्मवर्च्चसकामायोक्थानि प्रणयेयुर्गायत्र्यां ब्रह्मसामानुष्टुभ्यछावाकसाम सैषा गायत्री सम्पद्यते। - तां.ब्रा.८.१०.१

४४६विराट्स्वन्नाद्यकामायोक्थानि प्रणयेयुरुष्णिहि ब्रह्मसामानुष्टुभ्यछावाकसाम सैषा विराट् सम्पद्यते। - तां.ब्रा.८.१०.७

४४७अक्षरपङ्क्तिषु ज्यैष्ठ्यकामायोक्थानि प्रणयेयुरुष्णिहि ब्रह्मसामानुष्टुभ्यछावाकसाम सैषानुष्टुप् सम्पद्यते। - तां.ब्रा.८.१०.९

४४८देवा वा उक्थान्यभिजित्य रात्रिन्नाशक्नुवन् अभिजेतुन्तेऽसुरान्रात्रिन्तमः प्रविष्टान्नानुव्यपश्यंस्ते तमनुष्टुप्शिरसं प्रगाथमपश्यन् - - - - -- - - -तां.ब्रा.९.१.१

४४९एषा वा उक्थस्य सम्मा यद्रात्रिः। त्रीण्युक्थानि त्रिदेवत्यः सन्धिः। यथा वा अह्न उक्थान्येवमेष रात्रेः सन्धिर्नानारूपाण्यह्न उक्थानि नानारूपा एते तृचा भवन्ति। - तां.ब्रा.९.१.२७

४५०- - - -तौ (अश्विनौ) अब्रूतामस्मद्देवत्यमिदमुक्थमुच्याता इति तस्मादाश्विनमुच्यते। - तां.ब्रा.९.१.३६

४५१अग्निष्टोमेन वै देवा इमं लोकमभ्यजयन्नन्तरिक्षमुक्थेनातिरात्रेणामुन्त इमं लोकं पुनरभ्यकामयन्त - - - - - तां.ब्रा.९.२.९

४५२यदीतरोऽग्निष्टोमः स्यादुक्थः कार्य्यो यद्युक्थोऽतिरात्रो यो वै भूयान्यज्ञक्रतुः स इन्द्रस्य प्रियो- - -तां.ब्रा.९.४.१५

४५३तृतीयसवने सोमातिरेके : एतदन्यत् कुर्युरुक्थान्यत्प्रणयेयुरुक्थानि वा एष निकामयमानोऽभ्यतिरिच्यते योऽग्निष्टोमादतिरिच्यते यद्युक्थ्येभ्योऽतिरिच्येतातिरात्रः कार्य्यो रात्रिं वा एष निकामयमानोऽभ्यतिरिच्यते य उक्थ्येभ्योऽतिरिच्यते - - - - -तां.ब्रा.९.७.११

४५४गायत्रीं वा एतां ज्योतिष्पक्षामासते यदेतं द्वादशाहमष्टौ मध्य उक्था अग्निष्टोमावभितो मासा स्वर्गं लोकमेति - - - तां.ब्रा.१०.४.५

४५५जामि वा एतद्यज्ञे क्रियत इत्याहुर्यत् त्रिष्पुरस्ताद्रथन्तरमुपयन्तीति सौभरमुक्थानां ब्रह्मसाम भवति तेनैव तदजामि। - तां.ब्रा.१०.४.७

४५६मैत्रावरुणोक्थस्य स्तोत्रीयम् : अपच्छिदिव वा एतद्यज्ञकाण्डं यदुक्थानि यदेति सलोमत्वाय। - तां.ब्रा.११.११.२

४५७द्वितीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं :एवाह्यसि वीरयुरिति समानं वदन्त्य इदमित्थमसदिति। (अथ तृतीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं तृचं) : इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्नित्यवर्द्धन्त ह्येतर्हि यजमानमेवैतया वर्द्धयन्ति। - तां.ब्रा.११.११.४

४५८मैत्रावरुणोक्थसाम : साकमश्वं भवत्युक्थानामभिजित्या अभिक्रान्त्यै। एतेन ह्यग्र उक्थान्यभ्यजयन्नेतेनाभ्यक्रामन्। - तां.ब्रा.११.११.५

४५९स्तोम क्लृप्ति विधाने उक्थानां प्रथमस्य स्तोत्रीयं तृचं : आ ते अग्न इधीमहीति। अपच्छिदिव वा एतद्यज्ञकाण्डं यदुक्थानि यदेति सलोमत्वायैव। - तां.ब्रा.१३.६.२

४६०द्वितीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं तृचं : इन्द्राय साम गायतेति पूर्णा ककुभस्तेनानशनायुको भवति।- तां.ब्रा.१३.६.३

४६१तृतीयस्योक्थस्तोत्रीयं तृचं : असावि सोम इन्द्र त इति सिमानां रूपं स्वेनैवैनांस्तद्रूपेण समर्द्धयति। - तां.ब्रा.१३.६.५

४६२द्वितीयस्योक्थस्य साम : सौमित्रं भवति। - - - - - - -तां.ब्रा.१३.६.८

४६३मैत्रावरुणोक्थस्य साम : गूर्द्दो भवति। - - - - - तां.ब्रा.१३.१२.४

४६४ब्रह्मण उक्थस्तोत्रस्य साम : गोतमस्य भद्रं भवति। - - - - - - तां.ब्रा.१३.१२.६

४६५अच्छावाकोक्थस्य साम : उद्वंशपुत्रो भवति। - तां.ब्रा.१३.१२.९

४६६चतुर्विंश स्तोम। उक्थस्तोत्राणां प्रथमस्य स्तोत्रीयं तृचं : आते वत्सो मनो यमदित्यपच्छिदिव वा एतद्यज्ञकाण्डं यदुक्थानि यदेति सलोमत्वायैव।- तां.ब्रा.१४.६.१

४६७द्वितीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं तृचं : त्वन्न इन्द्राभरेति पूर्णाः ककुभः। - तां.ब्रा.१४.६.२

४६८तृतीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं तृचं : यदिन्द्र चित्रं मइह नास्ति त्वादातमद्रिवो - - - - - तां.ब्रा.१४.६.४

४६९तृतीयस्योक्थस्य साम : वीङ्कं भवति। - - - - - - -तां.ब्रा.१४.६.९

४७०पूर्भवदेषूक्थेषु स्तोत्रीयेषु स्तोमक्लृप्तिः : चतुर्व्विंश एव स्तोमो भवति तेजसे ब्रह्मवर्च्चसाय। - तां.ब्रा.१४.६.११

४७१छन्दोमा। चतुश्चत्वारिंशत्स्तोमः। उक्थानां प्रथमस्य स्तोत्रीयं तृचं : प्रेष्ठं वो अतिथिमित्यातिथ्यस्यैव तद्रूपं क्रियते। - तां.ब्रा.१४.१२.१

४७२द्वितीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं तृचं :ऐन्द्र नोगधिप्रियेतीन्द्रियस्य वीर्य्यस्यावरुध्यै। -तां.ब्रा.१४.१२.२

४७३तृतीयस्योक्थस्य स्तोत्रीयं तृचं : पुरां भिन्दुर्य्युवकविरमितौजा अजायतेन्द्रो विश्वस्य कर्म्मणो - - - - - तां.ब्रा.१४.१२.३

४७४प्रथमस्योक्थस्य साम : औशनं भवति। - - - - - -- - - -तां.ब्रा.१४.१२.४

४७५द्वितीयस्योक्थस्य साम : सांवर्त्तं भवति। - तां.ब्रा. १४१२६

४७६तृतीयस्योक्थस्य साम : मारुतं भवति। - - - - - - तां.ब्रा.१४.१२.८

४७७त्रिषूक्थस्तोत्रेषु स्तोमं : चतुश्चत्वारिंश एव स्तोमो भवत्योजस्येव तद्वीर्य्ये प्रतितिष्ठत्योजो वीर्य्यं त्रिष्टुप्। - तां.ब्रा.१४.१२.१०

४७८नवम् अहः। उक्थेषु प्रथमस्य स्तोत्रीयं तृचं : आग्नेयीषु पूर्व्वेषामह्नामुक्थानि प्रणयन्त्यथैतस्याह्न आग्नेय्यैन्द्र्यां प्रणयन्त्युभयोरेव रूपयोः प्रतितिष्ठति। -तां.ब्रा.१५.६.१

४७९प्रथमोक्थस्तोत्रनिर्वर्त्तकं साम ऐध्मवाहं भवति। - तां.ब्रा.१५.६.२

४८०द्वितीयोक्थस्तोत्रनिर्वर्त्तकं साम : त्रैककुभं भवति। - तां.ब्रा.१५.६.४

४८१तृतीयस्योक्थस्य निर्वर्त्तकं साम : उद्वंशीयं भवति। - तां.ब्रा.१५.६.६

४८२- - - -यदन्तरा सोमा यन्त्यन्तरोक्थानि शस्यन्तेऽन्तरा वषट्कुर्वन्ति तेनाजामि। -तां.ब्रा.१६.५.२५

४८३अथैष विश्वज्योतिरुक्थ्यः। पशवो वा उक्थानि पशवो विश्वं ज्योतिर्विश्व एव ज्योतौ पशुषु प्रतितिष्ठति। - तां.ब्रा.१६.१०.१

४८४उक्थस्तोत्रेष्वन्तिमेऽन्यत्साम : उद्वंशीयमुक्थानामन्ततो भवति सर्व्वेषां वा एतत् पृष्ठानां रूपं सर्वेष्वेव रूपेषु प्रतितिष्ठति। उक्थो भवति पशवो वा उक्थानि पशव सहस्रं पशुष्वेव तत्पशून्दधाति। - तां.ब्रा.१६.१०.११

४८५माध्यन्दिने पवमाने यौधाजयस्याधारभूतास्तिस्रः स्तोत्रीया : प्रत्नम्पीयूषम् पूर्व्यं यदुक्थमिति सतोबृहत्यो भवन्ति। - - - -तां.ब्रा.१६.११.८

४८६उक्थो भवति पशवो वा उक्थानि पशवो नृशंसमग्रं परिणयन्ति पशुभिरेवैनानग्रं परिणयति। - तां.ब्रा.१७.२.४

४८७तीव्रसोमाख्यं सप्तदशस्तोमकमुक्थसंस्थमेकाहः : सप्तदश उक्थ्यः। - तां.ब्रा.१८.५.१

४८८तृतीयोक्थे उद्वंशीयमनूद्य प्रशंसा :उद्वंशीयमुक्थानामन्ततो भवति सर्वेषां वा एतत्पृष्ठानां रूपं सर्वेष्वेव रूपेषु प्रतितिष्ठति। उक्थो भवति पशवो वा उक्थानि पशुष्वेव प्रतितिष्ठति। तां.ब्रा.१८.५.२४

४८९वाजपेयैकाहः : सप्तदश उक्था षोडशिमान् सप्तदशी। -तां.ब्रा.१८.६. १

४९०उद्वंशीयमुक्थानामन्ततो भवति सर्वेषां वा एतत् पृष्ठानां रूपं सर्वेष्वेव रूपेषु प्रतितिष्ठति।- तां.ब्रा.१८.६.१७

४९१उक्थं शस्यते वषट्कारोऽन्तरा तेनाजामि। - तां.ब्रा.१८.६.२२

४९२यज्ञारण्ये सन्तिष्ठत इत्याहुरत्युक्थान्येत्यतिषोडशिनन्न रात्रिं प्राप्नोतीति। - तां.ब्रा.१८.६.२४

४९३अभिषेचनीयस्योक्थसंस्थारूपत्वं : आत्मना वा अग्निष्टोमेनर्ध्नोत्यात्मना पुण्योभवत्यथ यदुक्थानि पशवो वा उक्थानि विडुक्थानि यदुक्थानि भवन्त्यनुसन्तत्या एव। - तां.ब्रा.१८.८.६

४९४चतुष्टोम क्रतु विधानं : आत्मा वा अग्निष्टोमः पशवश्छन्दांस्यात्मन्येव तत्पशून् प्रतिष्ठापयति नोक्थोनाग्निष्टोमो न हि ग्राम्याः पशवो नारण्याः। - तां.ब्रा.१९.५.११

४९५उक्थः षोडशिमान् भवति पशवो वा उक्थानि वज्रः षोडशी वज्रेणैवास्मै पशून् परिगृह्णात्यनपक्रामुका अस्मात्पशवो भवन्ति नोक्थोनातिरात्रो न हि ग्राम्याः पशवो नारण्याः। - तां.ब्रा.१९.६.३

४९६इन्द्रस्तोमाख्यं क्रतुः : अथैष पञ्चदश इन्द्रस्तोम उक्थ्यः। एतेन वा इन्द्रोऽत्यन्या देवता अभवदत्यन्या प्रजा भवति य एवं वेद। - तां.ब्रा.१९.१६.१

४९७उक्थ्यो भवति पशवो वा उक्थानि विडुक्थानि विशमेवास्मै पशूननुनियुनक्त्यनपक्रामुकास्माद्विड् भवति। - तां.ब्रा.१९.१६.६

४९८अतिरात्रस्तोम क्लृप्तिः : - - - - एकविंशोऽग्निष्टोमः सोक्थः पञ्चदशी रात्रिस्त्रिवृत्सन्धिः। - - - - - -एषोऽग्निष्टोम एष उक्थ एषोऽतिरात्रोऽग्निष्टोमेन वै देवा इमं लोकमभ्यजयन् उक्थैरन्तरिक्षं रात्र्यामुं लोकमजयन्नहोरात्राभ्यामभ्यवर्त्तन्त। - तां.ब्रा.२०.१.३

४९९सर्वस्तोमातिरात्रः : - - - - -त्रयस्त्रिंशोऽग्निष्टोमः प्रत्यवरोहीण्युक्थानि - - - - - तां.ब्रा.२०.२.२.१

५००आप्तोर्याम क्रतुस्तोमः : - - - - -त्रयस्त्रिंशोऽग्निष्टोमः प्रत्यवरोहीण्युक्थानि त्रिणवं प्रथममथैकविंशमथ सप्तदशमेकविंशः षोडशी - - -तां.ब्रा.२०.३.१

५०१प्रजापतिः पशूनसृजत तेऽस्मात् सृष्टा अपाक्रामंस्तानग्निष्टोमेन नाप्नोत्तानुक्थैर्न्नाप्नोत्तान् षोडशिना नाप्नोत् - - - - -तां.ब्रा.२०.३.२

५०२विषुवदतिरात्राख्य क्रतुः : - - - - -एकविंशोऽग्निष्टोमः सप्तदशान्युक्थानि पञ्चदशी रात्रिस्त्रिवृत्सन्धिः। - तां.ब्रा.२०.५.१

५०३अभिजिदतिरात्राख्य क्रतुः : त्रयस्त्रिंशोऽग्निष्टोमः प्रत्यवरोहीण्युक्थानि - - - - तां.ब्रा.२०.८.१

५०४विश्वजिदतिरात्राख्य क्रतुः : त्रयस्त्रिंशोऽग्निष्टोमः प्रत्यवरोहीण्युक्थानि त्रिणवं प्रथमं द्वे एकविंशे - - - - - तां.ब्रा.२०.९.१

५०५अङ्गिरसां द्विरात्रं :त्रयस्त्रिंशोऽग्निष्टोमः प्रत्यवरोहीण्युक्थानि - - - -तां.ब्रा.२०.११.२

५०६यदग्निष्टोमः पूर्वमहर्भवत्युक्थ्यमन्तर्य्यन्ति यद्युक्थोऽग्निष्टोमं। यज्ज्योतिरुक्थ्यः पूर्वमहर्भवति नाग्निष्टोममन्तर्यन्ति नोक्थानि। - - - - - अथोत्तरस्याह्न उक्थेभ्योऽधिरात्रिमुपयन्ति तेनोक्थान्यनन्तरितानि। - तां.ब्रा.२०.११.६

५०७चैत्ररथं द्विरात्रम् : अथ यस्य ज्योतिरुक्थ्यः पूर्वमहर्भवत्यायुरतिरात्र उत्तरं। -तां.ब्रा.२०.११.८

५०८अश्वत्रिरात्रम् :चतुष्टोमोग्निष्टोम एकविंश उक्थः सर्व्वस्तोमोतिरात्रः। - तां.ब्रा.२१.४.१

५०९छन्दोमपवमानाख्यं चतुर्थं त्रिरात्रम् :- - - - - एकविंशोग्निष्टोमः सोक्थोष्टाचत्त्वारिंशाः पवमाना एकविंशान्याज्यानि त्रिणवानि पृष्ठानि त्रयस्त्रिंशोग्निष्टोमेकविंशान्युक्थानि सषोडशिकानि - - - - तां.ब्रा.२१.६.१

५१०चतुर्व्वीराख्यं चतूरात्रम् : - - - एकविंशोऽग्निष्टोमः सोक्थश्चतुर्विंशाः पवमाना - - - -त्रिणवोग्निष्टोमः सोक्थश्चतुर्विंशाः पवमाना एकविंशान्याज्यानि- - - - त्रयस्त्रिंशोऽग्निष्टोम एकविंशान्युक्थानि - - - - तां.ब्रा.२१.९.१

५११चतुर्णामह्नां संस्थानं : अग्निष्टोमः प्रथममहरुक्थोद्वितीयं षोडशी तृतीयमतिरात्रश्चतुर्थन्नानावीर्य्यतायै। - तां.ब्रा.२१.९.६

५१२जमदग्नेश्चतूरात्रम् : अथोत्तरस्याह्ण - - - -एकविंशं तृतीयसवनं सोक्थं।  तृतीयस्याह्न - - - - - त्रिणवं तृतीयसवनं द्वे चोक्थे एकविंशमच्छावाकस्य। -- - - - -चतुर्थस्याह्न- - - - - त्रयस्त्रिंशोग्निष्टोम एकविंशोक्थानि स षोडशिकानि। - तां.ब्रा.२१.१०.३

५१३वसिष्ठस्य चतूरात्रम् : - - - - -एकविंशं तृतीयसवनं सोक्थं - - - - -त्रिणवं तृतीयसवनं सोक्थम् - - - -त्रयस्त्रिंशं तृतीयसवनं प्रत्यवरोहीण्युक्थानि त्रिणवं प्रथमं - - - - -तां.ब्रा.२१.११.१

५१४प्रत्यवरोहीण्युत्तमस्याह्न उक्थानि भवन्ति प्रतिष्ठित्यै। - तां.ब्रा.२१.११.४

५१५सञ्जयाख्यं चतूरात्रम् :- - - - -त्रिवृदग्निष्टोमः पञ्चदशउक्थः सप्तदशउक्थ एकविंशोतिरात्रो विश्वामित्रस्य सञ्जयः। - तां.ब्रा.२१.१२.१

५१६अभ्यासंग्याख्यं पञ्चरात्रम् : - - -प्रत्यवरोहीण्युक्थानि त्रिणवं प्रथमं द्वे एकविंशे - - - - -तां.ब्रा.२१.१३.१

५१७पञ्चशारदीयाख्यं पञ्चरात्रम् : त्रिवृदग्निष्टोमः पञ्चदश उक्थः सप्तदश उक्थः पञ्चदश उक्थः सप्तदशोतिरात्रः - - - तां.ब्रा.२१.१४.१

५१८अन्तर्म्महाव्रतस्य पञ्चरात्रम् : ज्योतिष्टोमोग्निष्टोमो गौरुक्थो महाव्रतं गौरुक्थ आयुरतिरात्रः। - तां.ब्रा.२१.१५.१

५१९त्रिकद्रुकाख्यं द्वितीयं षड्रात्रम् :त्रिवृदग्निष्टोमः पञ्चदशउक्थः सप्तदशउक्थो ज्योतिर्गौरायुरतिरात्रः। - तां.ब्रा.२२.२.१

५२०ऐन्द्रं पञ्चमं सप्तरात्रम् : ज्योतिष्टोमोग्निष्टोमो गौरुक्थ आयुरुक्थोभिजिदग्निष्टोमो - - -- - - तां.ब्रा.२२.८.१

५२१पशुसाधनं द्वितीयन्नवरात्रम् : ज्योतिष्टोमोग्निष्टोमो गौरुक्थ आयुरुक्थोभ्यासंग्यः पञ्चाहो - - - -तां.ब्रा.२२.१३.१

५२२त्रिकद्रुकाख्यं प्रथमं दशरात्रम् : त्रिवृदग्निष्टोमः पञ्चदश उक्थ्यस्त्रिवृदग्निष्टोमः सप्तदशोग्निष्टोमः एकविंश उक्थ्यः सप्तदशोग्निष्टोमस्त्रिणवोग्निष्टोमस्त्रयस्त्रिंश उक्थ्यः - - -- - - -अग्निष्टोमेन वै देवा असुरान्निगृह्य मध्यत उक्थ्यैः प्रजया पशुभिः प्राजायन्ताग्निष्टोमेनैव भ्रातृव्यन्निगृह्य मध्यत उक्थ्यैः प्रजया पशुभिः प्रजायते। तां.ब्रा.२२.१४.१

५२३द्वितीयं कुसुरुविन्ददशरात्रम् : त्रयस्त्रिवृतोग्निष्टोमास्त्रयः पञ्चदश उक्थ्यास्त्रयः सप्तदश उक्थ्या एकविंशोतिरात्रः - - - तां.ब्रा.२२.१५.१

५२४देवपुराख्यं चतुर्थं दशरात्रम् :त्रिष्टोमोग्निष्टोमो ज्योतिरुक्थ्यस्त्रिष्टोमोग्निष्टोमो गौरुक्थ्योभिजिदग्निष्टोमो गौरुक्थ्यो विश्वजिदग्निष्टोम आयुरुक्थ्यो विश्वजिदग्निष्टोमस्य सर्वस्तोमोतिरात्रः। - तां.ब्रा.२२.१७.१

५२५विधृतिसंज्ञकानामेकोनपञ्चाशद्रात्रीणां सप्तानाम्मध्ये प्रथमं सत्रं : अतिरात्रस्त्रीणि त्रिवृन्त्यहान्यग्निष्टोममुखान्यतिरात्रो दश पञ्चदशा उक्थ्याः षोडशिमद्दशममहरतिरात्रो द्वादश सप्तदशा उक्थ्या अतिरात्रः पृष्ठयः षडहोतिरात्रो द्वादशैकविंशा उक्थ्यातिरात्रः। - तां.ब्रा.२४.११.१

५२६सवितुः ककुभ इति संज्ञं पञ्चममेकोनपञ्चाशद्रात्रं :- - - - -अग्निष्टोममुखः षडहोथ यानि त्रीण्यहान्यग्निष्टोमावभित उक्थ्यम्मध्यतोनवपञ्चदशान्यग्निष्टोममुखः षडहोऽथ यानि त्रीण्यहान्यग्निष्टोमावभित उक्थ्यं मध्यतो - - - अथ यानि त्रीण्यहान्यग्निष्टोमावभित उक्थ्यम्मध्यतो- - - - अथ यानि त्रीण्यहान्यग्निष्टोमावभित उक्थ्यम्मध्यतो द्वादशाहस्य - - - - तां.ब्रा.२४.१५.१

५२७पृष्ठ्यमयनम् : - - - -त्रयः स्वरसामानः पञ्चदश इन्द्रस्तोम उक्थ्यः पृष्ठ्यः षडह - - - तां.ब्रा.२५.१.१

५२८अथैष पञ्चदश इन्द्रस्तोम उक्थ्य एतेन वा इन्द्रोत्यन्यादेवता अभवदत्यन्याः प्रजा भवन्ति य एतदुपयन्ति। - तां.ब्रा.२५.१.९

५२९पृष्ठ्यास्यमङ्गिरसामयनम् :- - - - - त्रयः स्वरसामानः पञ्चदश इन्द्रस्तोम उक्थ्यः पृष्ठ्यः षडहः - - - तां.ब्रा.२५.२.१

५३०तेषां पौर्णमास्यां गोष्टोमस्तोमो भवत्युक्थ्यो बृहत् सामा।- - - - - - -तेषाममावास्यायामायुष्टोमः स्तोमो भवत्युक्थ्योरथन्तरसामा। - तां.ब्रा.२५.१०.७

५३१अग्निर्यजुर्भिः। सविता स्तोमैः। इन्द्र उक्थामदै:। मित्रावरुणावाशिषा। - - - -तैत्तिरीय आरण्यक ३.८.१

५३२नोक्थ्ये प्रवृञ्ज्यात्। प्रजा वै पशव उक्थानि। यदुक्थ्ये प्रवृञ्ज्यात्। प्रजां पशूनस्य निर्दहेत्। - तै.आ.५.६.८

५३३तत्तन्न सूर्क्ष्यम्। उक्थ्या एव सप्तदशाः परःसामानः कार्याः। पशवो वा उक्थानि। पशूनामवरुद्ध्यै। - तै.ब्रा.१.२.२.१

५३४उक्थ्याः सप्तदशाः परःसामानः। ते सँस्तुता विराजमभिसंपद्यन्ते। द्वे चर्चावतिरिच्येते। - - - - -तैत्तिरीय ब्राह्मण १.२.२.२

५३५देवा वै यथादर्शं यज्ञानाहरन्त। योऽग्निष्टोमम्। य उक्थ्यम्। योऽतिरात्रम्। ते सहैव सर्वे वाजपेयमपश्यन्। - तै.ब्रा.१.३.२.१

५३६ब्रह्मवादिनो वदन्ति। नाग्निष्टोमो नोक्थ्यः। न षोडशी नातिरात्रः। अथ कस्माद्वाजपेये सर्वे यज्ञक्रतवोऽवरुध्यन्ति इति। - - - - - आग्नेयं पशुमालभते। अग्निष्टोममेव तेनावरुन्धे। ऐन्द्राग्नेनोक्थ्यम्। ऐन्द्रेण षोडशिनः स्तोत्रम्। - तै.ब्रा.१.३.४.१

५३७आत्मानमेव स्पृणोत्यग्निष्टोमेन। प्राणापानावुक्थ्येन। वीर्यf षोडशिनः स्तोत्रेण। - - - - - - - - - -इममेव लोकमभिजयत्यग्निष्टोमेन। अन्तरिक्षमुक्थ्येन। सुवर्गं लोकँ षोडशिनः स्तोत्रेण - - - - -। - तै.ब्रा.१.३.४.२

५३८तामिन्द्र उक्थ्यस्थाल्येन्द्रियमदुहत्। यदुक्थ्यस्थाली भवति। इन्द्रियमेव तया यजमान इमां दुहे। - तै.ब्रा.१.४.१.५

५३९- - - - - - - - - - -यत्प्रतीचीनँ संगवात्। प्राचीनं मध्यंदिनात्। ततो देवा उक्थ्यं निरमिमत। - तै.ब्रा.१.५.३.१

५४०- - - - - -आत्मन आग्रयणम्। अङ्गेभ्य उक्थ्यम्। आयुषो ध्रुवम्। - तै.ब्रा.१.५.४.२

५४१आत्मनैवाग्निष्टोमेनर्ध्नोति। आत्मना पुण्यो भवति। प्रजा वा उक्थानि। पशव उक्थानि। यदुक्थ्यो भवत्यनुसंतत्यै। - तै.ब्रा.१.८.७.२

५४२अग्निष्टोममुक्थ्यमतिरात्रमृचः। एता वै व्याहृतय इमे लोकाः। इमान्खलु वै लोकाननु प्रजाः पशवश्छन्दांसि प्राजायन्त। - तै.ब्रा.२.२.४.३

५४३(तं सोमं) उक्थैरुदस्थापयन्। तदुक्थानामुक्थत्वम्। - तै.ब्रा.२.२.८.७

५४४समुद्रं न सिन्धव उक्थशुष्माः। उरुव्यचसं गिर आविशन्ति। - तै.ब्रा.२.४.५.२

५४५सोमान्त्सुराम्णः। उपो उक्थामदाः श्रौद्विमदा अदन्। - तै.ब्रा.२.६.१५.२

५४६होता यक्षच्छतक्रतुम्। हिरण्यपर्णमुक्थिनम्। रशनां बिभ्रतं वशिम्। - तै.ब्रा.२.६.१७.७

५४७एष गोसवः। षट्त्रिंश उक्थ्यो बृहत्सामा। - तै.ब्रा.२.७.६.१

५४८प्रजापतिः पशूनसृजत। तेऽस्मात्सृष्टाः पराञ्च आयन्। तानग्निष्टोमेन नाऽऽप्नोत्। तानुक्थ्येन नाऽऽप्नोत। तान्षोडशिना नाऽऽप्नोत्। - - - - - - तान्विष्णुरेकविँशेन स्तोमेनाऽऽप्नोत्। तै.ब्रा.२.७.१४.१

५४९सूर्यवन्तं मघवानं विषासहिम्। इन्द्रमुक्थ्येषु नामहूतमँ हुवेम। - तै.ब्रा.२.७.१५.६

५५०यो राय ईशे शतदाय उक्थ्यः। यः पशूनाँ रक्षिता विष्ठितानाम्। प्रजापतिः प्रथमजा ऋतस्य। सहस्रधामा जुषताf हविर्नः। - तै.ब्रा.२.८.१.४

५५१मनोतासूक्ताभिधानम् : अस्मा उ ते महि महे विधेम। नमोभिरग्ने समिधोत हव्यैः। वेदी सूनो सहसो गीर्भिरुक्थैः। आ ते भद्रायाँ सुमतौ यतेम। - तै.ब्रा.३.६.१०.४

५५२सावित्र चयनाभिधानम् : अथ यदाह। अग्निष्टोम उक्थ्योऽग्निर्ऋतुः प्रजापतिः संवत्सर इति। एष एव तत्। - तै.ब्रा.३.१०.९.८

५५३यो ह वै यज्ञक्रतूनां चर्तूनां च संवत्सरस्य च नामधेयानि वेद। न यज्ञक्रतुषु नर्तुषु न संवत्सर आर्तिमार्च्छति। अग्निष्टोम उक्थ्योऽग्निर्ऋतुः प्रजापतिः संवत्सर इति। - तै.ब्रा.३.१०.१०.४

५५४चातुर्होत्र चयनाभिधानम् :  इममेव लोकं पशुबन्धेनाभिजयति। अथो अग्निष्टोमेन। अन्तरिक्षमुक्थ्येन। स्वरतिरात्रेण। - तै.ब्रा.३.१२.५.६

५५५प्र सू तिरा शचीभिर्ये त उक्थिन इत्युक्थं वा एतदहरुक्थवद्रूपसमृद्धमेतस्याह्नो रूपम्। - ऐतरेय आरण्यक १.२.१

५५६प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यमित्युक्थं वा एतदहरुक्थवद्रूपसमृद्धमेतस्याह्नो रूपम्। - ऐ.आ.१.२.१

५५७सर्वान्प्रगाथाञ्छंसति सर्वेषामह्नामाप्त्यै सर्वेषामुक्थानां सर्वेषां पृष्ठानां सर्वेषां शस्त्राणां सर्वेषां प्रउगाणां सर्वेषां सवनानाम्। - ऐ.आ.१.२.१

५५८आ शासते प्रति हर्यन्त्युक्थेत्युक्थं वा एतदहरुक्थवद्रूपसमृद्धमेतस्याह्नो रूपम्। - ऐ.आ.१.२.२

५५९वृषा वै प्रेङ्खो योषासन्दी तन्मिथुनं मिथुनमेव तदुक्थमुखे करोति प्रजात्यै। - ऐ.आ.१.२.४

५६०नृणामु त्वा नृतमं गीर्भिरुक्थैरित्युक्थं वा एतदहरुक्थवद्रूपसमृद्धमेतस्याह्नो रूपम्। - ऐ.आ.१.३.७

५६१सहस्रधा पञ्चदशान्युक्थेति पञ्च हि दशतो भवति - - - ऐ.आ.१.३.८

५६२सहस्रधा महिमानः सहस्रमित्युक्थान्येव महयति। - ऐ.आ.१.३.८

५६३उक्थमुक्थमिति वै प्रजा वदन्ति तदिदमेवोक्थमियमेव पृथिवीतो हीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च। - - - -अन्तरिक्षमेवोक्थमन्तरिक्षं वा अनु पतन्त्यन्तरिक्षमनु धावयन्ति तस्य वायुरर्कोऽन्नमशीतयो ऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते। असावेव द्यौरुक्थममुत प्रदानाद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठति यदिदं किञ्च तस्यासावादित्योऽर्कोऽन्नमशीतयो ऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते। इत्यधिदैवतम्। अथाध्यात्मम्। पुरुष एवोक्थमयमेव महान्प्रजापतिरहमुक्थमस्मीति विद्यात्। तस्य मुखमेवोक्थं यथा पृथिवी तथा। तस्य वागर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते। नासिके एवोक्थं यथान्तरिक्षं तथा। तस्य - - - - - - - -। ललाटमेवोक्थं यथा द्यौस्तथा। तस्य चक्षुरर्कोऽन्नमशीतयोऽन्नेन हीदं सर्वमश्नुते। - ऐ.आ.२.१.२

५६४ता अहिंसन्ताहमुक्थमस्म्यहमुक्थमस्मीति। ता अब्रुवन्हन्तास्माच्छरीरादुत्क्रामास तद्यस्मिन्न उत्क्रान्त इदं शरीरं पत्स्यति तदुक्थं भविष्यतीति। वागुदक्रामद - - - - - -चक्षुरुदक्रामद - - - - -मन उदक्रामत् - - - - -प्राण उदक्रामत्तत्प्राण उत्क्रान्ते ऽपद्यत। - - - - - - -ता अहिंसन्तैवाहमुक्थमस्म्यहमुक्थमस्मीति। ता अब्रुवन्हन्तेदं पुनः शरीरं प्रविशाम तद्यस्मिन्नः प्रपन्न इदं शरीरमुत्थास्यति तदुक्थं भविष्यतीति। - - - - - प्राण प्राविशत्तत्प्राणे प्रपन्न उदतिष्ठत्तदुक्थमभवत्~। तदेतदुक्थाँ प्राण एव। प्राण उक्थमित्येव विद्यात्। तं देवा अब्रुवंस्त्वमुक्थमसि त्वमिदं सर्वमसि - - - - - - -। - ऐ.आ.२.१.४

५६५यो ह वा आत्मानं पञ्चविधमुक्थं वेद यस्मादिदं सर्वमुत्तिष्ठति स संप्रतिवित्। पृथिवी वायुराकाश आपो ज्योतींषीत्येष वा आत्मोक्थं पञ्चविधमेतस्माद्धीदं सर्वमुत्तिष्ठत्येतमेवाप्येति। - ऐ.आ.२.३.१

५६६एष वै यज्ञे यज्ञोऽहन्यहर्देवेषु देवोऽध्यूळ्हो यदेतन्महदुक्थम्। तदेतत्पञ्चविधं त्रिवृत्पञ्चदशं सप्तदशमेकविंशं पञ्चविंशमिति स्तोमतो - - - - -। - ऐ.आ.२.३.४

५६७स वा एष वाचः परमो विकारो यदेतन्महदुक्थं तदेतत्पञ्चविधं मितममितं स्वरः सत्यानृते इति। - - - -ऐ.आ.२.३.६

५६८एतं ह्येव बह्वृचा महत्युक्थे मीमांसन्त एतमग्नावध्वर्यव - - -। ऐ.आ.३.२.३

५६९नृणामु त्वा नृतमं गीर्भिरुक्थैरिति तिस्रः। - ऐ.आ.५.१.६

५७०परिहित उक्थ उक्थसंपदं जपति। उक्थवीर्यस्य स्थान उक्थदोहः। ऐ.आ.५.३.१

५७१एतास्त उक्थ भूतय एता वाचो विभूतयः। ताभिर्म इह धुक्ष्वामृतस्य श्रियं महीम् ॥ - ऐ.आ.५.३.२.५

५७२ओमुक्थशा यज सोमस्येतीज्यायै संप्रेषितो- - -ऐ.आ.५.३.२.७

५७३आहरत्यध्वर्युरुक्थपात्रमतिग्राह्यांश्चमसांश्च। - - - -अथैतदुक्थपात्रं होतोपसृष्टेन जपेन भक्षयति। - ऐ.आ.५.३.२

५७४होतृशस्त्रेषूक्थशा यज सोमस्येत्येकः प्रैषः - - - - ऐ.आ.५.३.३

५७५काम्यसामिधेनीयाज्यापुरोनुवाक्यानामभिधानम् :सेदग्ने अस्तु सुभगः सुदानुर्यस्त्वा नित्येन हविषा य उक्थैः। प्रप्रीषति स्व आयुषि दुरोणे विश्वेदस्मै सुदिना साऽसदिष्टिः। - तैत्तिरीय संहिता १.२.१४.३

५७६उक्थ्यग्रहाभिधानम् : उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वत उक्थायुवे यत्त इन्द्र बृहद्वयस्तस्मै त्वा विष्णवे त्वैष ते योनिरिन्द्राय त्वोक्थायुवे। - तै.सं.१.४.१२.१

५७७काम्ययाज्यापुरोनुवाक्याः : उक्थउक्थे सोम इन्द्रं ममाद नीथेनीथे मघवानम् सुतासः। - तै.सं.१.४.४६.१

५७८द्वादशद्वंद्वसंपत्त्यभिधानम् : प्रजापतिर्यज्ञानसृजताग्निहोत्रं चाग्निष्टोमं च पौर्णमासी चोक्थ्यं चामावास्यां चातिरात्रं च तानुदमिमीत यावदग्निहोत्रमासीत्तावानग्निष्टोमो यावती पौर्णमासी तावानुक्थ्यो - - - - - - -तै.सं.१.६.९.१

५७९काम्ययाज्यापुरोनुवाक्याभिधानम् : नव्ये देष्णे शस्ते अस्मिन्त उक्थे प्र ब्रवाम वयमिन्द्र स्तुवन्तः। - तै.सं.१.७.१३.३

५८०त्रैधातवीयेष्टिविधिः : साम्नो वा एष वर्णो यद्धिरण्यं यजुषां तार्प्यमुक्थामदानां धेनुरेतानेव सर्वान्वर्णानवरुन्धे। - तै.सं.२.४.११.६

५८१पितृयज्ञहविर्हौत्रत्रमन्त्राभिधानम् :शुचीदयन्दीधितिमुक्थशासः क्षामा भिन्दन्तो अरुणीरप व्रन्। - तै.सं.२.६.१२.४

५८२सोमोपस्थानयन्त्रोत्पादनम् : वायव्यं वै सोमस्य प्रतिष्ठा चमसोऽस्य प्रतिष्ठा सोमः स्तोमस्य स्तोम उक्थानां - - - -प्रत्येव सोमँ स्थापयति प्रति स्तोमं प्रत्युक्थानि - - - - तै.सं.३.१.२.४

५८३अभिमर्शनविधीनां मन्त्रविशेषाणां चाभिधानम् : आग्रयणस्य पात्रमसीन्द्रो देवता ककुच्छन्द उक्थानां पात्रमसि पृथिवी देवता विराट्छन्दो ध्रुवस्य पात्रमसि। - तै.सं.३.१.६.३

५८४परस्परमात्सर्यप्रवृत्तयजमानयोर्नैमित्तिकप्रयोगाभिधानम्" : यद्यग्निष्टोमः सोमः परस्तात्स्यादुक्थ्यं कुर्वीत यद्युक्थ्यः स्यादतिरात्रं कुर्वीत - तै.सं.३.१.७.३

५८५प्रतिहारान्तरभाविमन्त्राभिधानम् : यद्वै होताऽध्वर्युमभ्याह्वयते वज्रमनभि प्रवर्तयत्युक्थशा इत्याह प्रातःसवनं प्रतिगीर्य - - - - - -उक्थं वाचीत्याह माध्यंदिनँ सवनं प्रतिगीर्य - - - - - - - -उक्थं वाचीन्द्रायेत्याह तृतीयसवनं प्रतिगीर्य - - - - - तै.सं.३.२.९.१

५८६उद्गीथ उद्गीथ एवोद्गातृणाम् ऋचः प्रणव उक्थशंसिनां प्रतिहारोऽध्वर्यूणां - - - -तै.सं.३.२.९.५

५८७याज्यापुरोनुवाक्याभिधानम् : इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती। उक्थं मदश्च शस्यते। - तै.सं.३.३.११.१

५८८सीव्यत्वपः सूच्याऽच्छिद्यमानया ददातु वीरँ शतदायमुक्थ्यम्। - तै.सं.३.३.११.५

५८९आसन्दीस्थापिताग्नेरुपस्थानम् : आ तं भज सौश्रवसेष्वग्न उक्थउक्थ आ भज शस्यमाने। - तै.सं.४.२.२.४

५९०आहवनीयचयनार्थ लोष्टक्षेपाद्यभिधानम् :बृहद्भानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे। - तै.सं.४.२.७.२

५९१नाकसदाख्येष्टकाभिधानम् :रात्र्यसि प्राची दिग्वसवस्ते देवा अधिपतयो - - -त्रिवृत्त्वा स्तोमः पृथिव्याँ श्रयत्वाज्यमुक्थमव्यथयत्स्तभ्नातु - - - - विराडसि दक्षिणा दिग्रुद्रास्ते देवा अधिपतय - - - -पञ्चदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्याँ श्रयतु प्रउगमुक्थमव्यथयत्स्तभ्नातु - - - - सम्राडसि प्रतीची दिक् आदित्यास्ते देवा अधिपतयः - - - -सप्तदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्याँ श्रयतु मरुत्वतीयमुक्थमव्यथयत्स्तभ्नातु - - - -स्वराडस्युदीची दिग्विश्वे ते देवा अधिपतयो - - - - -एकविंशस्त्वा स्तोमः पृथिव्याँ श्रयतु निष्कैवल्यमुक्थमव्यथयत्स्तभ्नातु - - - - -बृहती दिङ्मरुतस्ते देवा अधिपतयः - - - - त्रिणवत्रयस्त्रिँशौ त्वा स्तोमौ पृथिव्याँ श्रयतां वैश्वदेवाग्निमारुते उक्थे अव्यथयन्ती स्तभ्नीताf - - -तै.सं.४.४.२.१

५९२अग्निप्रणयनाभिधानम् : उक्थपत्र ईड्योv गृभीतस्तप्तं घर्मं परिगृह्यायजन्त। - तै.सं.४.६.३.२

५९३अग्निसंयोजनाभिधानम् - - - - - -यत्सर्वाभिः पञ्चभिः (देवरथं) युञ्ज्याद्युक्तोऽस्याग्निः प्रच्युतः स्यादप्रतिष्ठिता आहुतयः स्युरप्रतिष्ठिताः स्तोमा अप्रतिष्ठितान्युक्थानि - - - तै.सं.५.४.१०.१

५९४अन्वारोहणाद्यभिधानम् : सोमो विश्वविन्नेता नेषद् बृहस्पतिरुक्थामदानि शँसिषदित्याहैतद्वा अग्नेरुक्थं तेनैवैनमनु शँसति। - तै.सं.५.६.८.६

५९५सोमोपावहरणकथनम् :यद्यग्निष्टोमो जुहोति यद्युक्थ्यः परिधौ नि मार्ष्टि यद्यतिरात्रो यजुर्वदन्प्र पद्यते यज्ञक्रतूनां व्यावृत्त्यै। - तै.सं.६.४.३.४

५९६उक्थ्यग्रहकथनम् :इन्द्रो बृत्राय वज्रमुदयत्छत्स - - - - - तस्मा उक्थ्यं प्राच्छत्तस्मै द्वितीयमुदयच्छत् - - - तस्मा उक्थ्यमेव प्रायच्छत् तस्मै तृतीयमुदयच्छत् - - - - - तस्मा उक्थ्यमेव प्रायच्छत् तं निर्मायं भूतमहन्यज्ञो हि तस्य मायाऽऽसीद्यदुक्थ्यो गृह्यत इन्द्रियमेव तद्वीर्यं - -- - - -चक्षुर्वा एतद्यज्ञस्य यदुक्थ्यस्तस्मादुक्थ्यँ हुतँ सोमा अन्वायन्ति - तै.सं.६.५.१.१

५९७ध्रुवग्रहकथनम् : पुरस्तादुक्थस्याहवनीय इत्याहुः पुरस्ताद्ध्यायुषो भुङ्क्ते - तै.सं.६.५.२.३

५९८सोमपात्रस्तुति : आज्यमित्युक्थं तद्वै ग्रहाणां निदानं - तै.सं.६.५.११.२

५९९अतिग्राह्यग्रहकथनम् :यदुक्थ्ये गृह्णीयात्प्रत्यञ्चं यज्ञमतिग्राह्याः सँ शृणीयुः - तै.सं.६.६.८.१

६००षोडशिग्रहकथनम् : वज्रो वै षोडशी पशवस्तृतीयसवनं वज्रेणैवास्मै तृतीयसवनात्पशूनव रुन्धे नोक्थ्ये गृह्णीयात्प्रजां पशूनस्य निर्दहेत्। - तै.सं.६.६.११.३

६०१गर्गत्रिरात्राभिधानम् : सोऽग्निष्टोमेन वसूनयाजयत्त इमं लोकमजयन्तच्चाददुः स उक्थ्येन रुद्रानयाजयन्तेऽन्तरिक्षमजयन्तच्चाददुः - - - - - -तै.सं.७.१.५.३

६०२तस्मात्त्रिरात्रस्याग्निष्टोम एव प्रथममहः स्यादथोक्थ्योऽथातिरात्र एषां लोकानां विधृत्यै। - तै.सं.७.१.५.४

६०३दशरात्रकथनम् :त्रिवृदग्निष्टोमोऽग्निष्टदाग्नेयीषु भवति तेज एवाव रुन्धे पञ्चदश उक्थ्य ऐन्द्रीष्विन्द्रियमेवाव रुन्धे - - - - - - सप्तदशोऽग्निष्टोमः प्राजापत्यासु तीव्रसोमोऽन्नाद्यस्यावरुद्ध्या अथो प्रैव तेन जायते एकविंश उक्थ्यः सौरीषु प्रतिष्ठित्या अथो रुचमेवाऽऽत्मन्धत्ते। - - - - - -त्रिणवावग्निष्टोमावभित ऐन्द्रीषु विजित्यै त्रयस्त्रिँश उक्थ्यो वैश्वदेवीषु प्रतिष्ठित्यै - - -तै.सं.७.२.५.६

६०४द्वादशरात्रकथनम् : उक्थ्याग्रान्गृह्णीताभिचर्यमाणः सर्वेषां वा एतत्पात्राणामिन्द्रियं यदुक्थ्यपात्रँ सर्वेणैवैनमिन्द्रियेणाति प्र युङ्क~ते - तै.सं.७.२.७.४

६०५द्वादशरात्रकथनम् : यावग्निष्टोमौ तौ पक्षौ ये ऽन्तरेऽष्टावुक्थ्याः स आत्मैषा वै गायत्री ज्योतिपक्षा य एवं वेद- - - - - - - -यावतिरात्रौ तौ पक्षौ येऽन्तरेऽष्टावुक्थ्याः स आत्मा प्रजापतिर्वावैष सन्त्सद्ध वै सत्रेण स्पृणोति - तै.सं.७.२.९.१

६०६अश्वमेधगतमन्त्रकथनम् : आ माऽग्निष्टोमो विशतूक्थ्यश्चातिरात्रो माऽऽविशत्वापिशर्वरः। - तै.सं.७.३.१३.१

६०७प्रायणीयास्य प्रथमाहाभिधानम् : अतिरात्रः परमो यज्ञक्रतूनां कस्मात्तं प्रथममुप यन्तीत्येतद्वा अग्निष्टोमं प्रथममुप यन्त्यथोक्थ्यमथ षोडशिनमथातिरात्रम् - -- - - - तै.सं.७.४.१०.१

६०८मासगताहकथनम् : अग्निष्टोमावभितः प्रधी तावुक्थ्या मध्ये नभ्यं तत्तदेतत्परियद्देवचक्रं यदेतेन षडहेन यन्ति - - - -तै.सं.७.४.११.२