PURAANIC SUBJECT INDEX

पुराण विषय अनुक्रमणिका

(From vowel i to Udara)

Radha Gupta, Suman Agarwal and Vipin Kumar

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I - Indu ( words like Ikshu/sugarcane, Ikshwaaku, Idaa, Indiraa, Indu etc.)

Indra - Indra ( Indra)

Indrakeela - Indradhwaja ( words like Indra, Indrajaala, Indrajit, Indradyumna, Indradhanusha/rainbow, Indradhwaja etc.)

Indradhwaja - Indriya (Indradhwaja, Indraprastha, Indrasena, Indraagni, Indraani, Indriya etc. )

Indriya - Isha  (Indriya/senses, Iraa, Iraavati, Ila, Ilaa, Ilvala etc.)

Isha - Ishu (Isha, Isheekaa, Ishu/arrow etc.)

Ishu - Eeshaana (Ishtakaa/brick, Ishtaapuurta, Eesha, Eeshaana etc. )

Eeshaana - Ugra ( Eeshaana, Eeshwara, U, Uktha, Ukhaa , Ugra etc. )

Ugra - Uchchhishta  (Ugra, Ugrashravaa, Ugrasena, Uchchaihshrava, Uchchhista etc. )

Uchchhishta - Utkala (Uchchhishta/left-over, Ujjayini, Utathya, Utkacha, Utkala etc.)

Utkala - Uttara (Utkala, Uttanka, Uttama, Uttara etc.)

Uttara - Utthaana (Uttara, Uttarakuru, Uttaraayana, Uttaana, Uttaanapaada, Utthaana etc.)

Utthaana - Utpaata (Utthaana/stand-up, Utpala/lotus, Utpaata etc.)

Utpaata - Udaya ( Utsava/festival, Udaka/fluid, Udaya/rise etc.)

Udaya - Udara (Udaya/rise, Udayana, Udayasingha, Udara/stomach etc.)

 

 

 

उक्षा

टिप्पणी- कर्मकाण्ड में उक्षण। प्रोक्षण की क्रिया सर्वविदित है। कर्मकाण्ड में जो क्रिया बाहर से होती दिखाई देती है, वह वास्तव में हमारे अन्दर घटित हो रही क्रिया का प्रतीक मात्र ही है। ऐसी संभावना है कि पुराणों में उक्षा के अन्य संदर्भ भी यत्र-तत्र बिखरे पड़े होंगे जिनका वर्तमान अनुक्रमणिका में संकलन नहीं हो सका है। उक्षा का सामान्य अर्थ सिंचन करने वाला बैल होता है। वैदिक साहित्य में उक्षा की प्रकृति को समझने की कुंजी हमें तैत्तिरीय संहिता २.१.७.१ से प्राप्त होती है। कहा गया है कि वषट्कार ने गायत्री के शिर का छेदन किया। इससे गायत्री का जो रस गिरा, उससे वशा, उक्षवशा आदि की उत्पत्ति हुई। उक्षवशा को बृहस्पति ने भोग के लिए ग्रहण किया। इसका निहितार्थ होगा कि जो शक्ति ऊपर की ओर गति कर रही है, सूर्य बनने का प्रयत्न कर रही है, उसी शक्ति का ऊर्ध्वगमन यदि किसी प्रकार रोक दिया जाए तो वह अधोमुखी होकर मनुष्य के निचले कोशों में घृत, मधु, पयः की वर्षा करने लगती है। ऐसा प्रतीत होता हि वैदिक साहित्य में वषट्कार वर्षट्कार का, वर्षा कराने वाले का प्रतीक है। मेघों के विद्यमान रहते हुए भी वर्षा कराने के लिए गर्जन, विद्युत आदि की आवश्यकता होती है, ऐसा वैदिक साहित्य में प्रसिद्ध है। अतः यह वषट्कार आध्यात्मिक स्तर पर विद्युत आदि उत्पन्न करने जैसी कोई प्रक्रिया हो सकती है। ऋग्वेद ५.४२.१४ में भी विद्युत द्वारा रोदसी के उक्षण का उल्लेख है। पुराणीं में सूर्य की स्तुति हेतु उक्षाणं पृश्निं इति ऋचा (ऋ.१.१६४.४३) के विनियोग के संदर्भ में, डॉ० फतहसिंह के अनुसार पृश्नि मिश्रित अवस्था को, चितकबरी अवस्था को कहते हैं। जैमिनीय ब्राह्मण २.१७६ के अनुसार पृश्नि मरुतों का संबोधन हो सकता है क्योंकि उन्हें पृश्निमातरः कहा जाता है। इस ऋचा में पृश्नि उक्षा को पकाने का उल्लेख है। ऋग्वेद ९.८३.३ में भी सूर्य के लिए पृश्नि शब्द का उपयोग किया गया है और उसके पश्चात् उक्षा द्वारा सारे भुवनों के धारण का उल्लेख है। यह संभव है, जैसा कि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, कि यह ऊपर की ओर गतिशील और अधोमुखी अवस्था के बीच की स्थिति है-ऊपर भी गति कर सकती है, नीचे भी। ऋग्वेद ५.४७.३ में उक्षा को समुद्र और अरुण/अरुष सुपर्ण कहा गया है जो उपरोक्त धारणा को पुष्ट करता है।

विष्णुधर्मोत्तर पुराण में इन्द्रियोपेत उक्षा के दान से १० धेनुओं के दान का फल मिलने के उल्लेख के संदर्भ में, यह संभव हो सकता है कि हमारी इन्द्रियों को जो भी शक्ति मिल रही है, वह इस कारण से है कि शक्ति का ऊर्ध्वमुखी विकास कहीं अवरुद्ध हो गया है और इस कारण वह नीचे इन्द्रियों में फैल रही है। पुराणकार का कथन है कि यदि उक्षा को ब्राह्मण को दान कर दिया जाए तो १० धेनुओं को ब्राह्मण को दान करने का फल मिल जाता है। ब्राह्मण को दान देने योग्य उक्षा कैसा हो सकता है, इसका ज्ञान हमें ऋग्वेद की ऋचाओं से होता है। ऋग्वेद ९.६९.४ के अनुसार जब उक्षा शब्द करता है तो धेनुएं/वाक् उसकी ओर खिंची चली आती हैं। ऋग्वेद ९.९५.४ के अनुसार जो उक्षा गिरि पर स्थित है, जो अंशु (सोम का एक अंश मात्र) है, उसके शब्द करने पर मतियां उसकी ओर चली आती हैं। यह स्पष्ट संकेत करता है कि मन की वृत्तियां, धेनुएं किस प्रकार के उक्षा की अभीप्सा करती हैं - जो गिरि पर (डॉ० फतहसिंह के अनुसार गिरि विज्ञानमय कोश का प्रतीक है) स्थित है। ऋग्वेद १.३६.१९ में उक्षित होने पर कृष्टियों/इन्द्रियों के नमः हो जाने का उल्लेख है। पुराणों में इसी तथ्य को ब्राह्मण के योग्य उक्षा कहा गया है। ऋग्वेद में एक अन्य प्रकार के उक्षण/सिंचन का उल्लेख मिलता है। वह है मनुष्य के मेरुदण्ड के १०० केंद्र बिंदुओं का सिंचन (ऋग्वेद ५.२७.५ तथा ८.५५.२)। यह अश्वमेध के, अश्व रूपी मनुष्य व्यक्तित्व को मेध्य बनाने के संदर्भ में हो सकते हैं। अश्व को मेध्य बनाना क्षत्रिय का कार्य है। ऋग्वेद २.३४.३ व ५.५९.१ में मरुतों द्वारा अश्वों के उक्षण के उल्लेख आते हैं। ऋग्वेद १०.९१.१४ में उक्षणों के पहले अश्वों और ऋषभों का उल्लेख आता है। हो सकता है कि यह उक्षों की प्रकृति को स्पष्ट करने के लिए दिया गया हो। महाभारतकार को युद्ध में एक वीर द्वारा दूसरे वीर को मार दिये जाने पर सिंह द्वारा उक्षा के हनन की उपमा बहुत प्रिय है। इस सम्बन्ध में ऋग्वेद की ऋचा ९.८९.३ विचारणीय है।

महाभारत में राजा शिबि द्वारा शयेन को उक्षा मांस, ओदन आदि प्रस्तुत करने के उल्लेख के संदर्भ में, ऋग्वेद ८.४३.११ में अग्नि के लिए उक्षान्न आदि का उल्लेख आता है। यह ऋचा वैदिक साहित्य की सार्वत्रिक ऋचा है जिसका यजन आग्नीध्र नामक ऋत्विज करता है। उक्षा अवस्था को पकाकर उसे शुद्ध सोम का रूप, सोम जिसकी हवि देवगण अग्नि के माध्यम से प्राप्त करते हैं, देना होता है। शतपथ ब्राह्मण १४.९.४.१७ के पुत्रमन्थ कर्म ब्राह्मण में पण्डित पुत्र उत्पन्न करने के लिए उक्षा या ऋषभ मांसौदन को पकाकर सर्पि/घृत के साथ खाने का निर्देश है। श्रौत व ब्राह्मण ग्रन्थों में सार्वत्रिक रूप से (आश्वलायन श्रौत सूत्र १०.२.२९, कात्यायन श्रौत सूत्र २३.४.८, बौधायन श्रौत सूत्र १८.११, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र २२.२०.९, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.७.११.१) पंच शारदीय व्रत का वर्णन आता है जिसके ५ दिनों में क्रमिक रूप से १७ उक्षों का प्रोक्षण व आलभन किया जाता है। ताण्ड्य ब्राह्मण २१.१४.९ का कथन है कि इसके पश्चात् वह संवत्सर में सोम बनते हैं। आधुनिक भौतिक विज्ञान के दृष्टिकोण से इसका निहितार्थ यह हो सकता है कि पांच स्तरों पर उक्षा की एन्ट्रांपी को न्यूनतम किया जाता है। एन्ट्रांपी किसी तन्त्र में अव्यवस्था का पैमाना है। जब एन्ट्रांपी न्यूनतम हो जाए, बिल्कुल शीतल अवस्था आ जाए, वह सोम की अवस्था हो सकती है। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि पांच स्तरों से उक्षणों द्वारा उक्षण के पश्चात् ही शरद् स्थिति उत्पन्न करने का कार्य पूर्ण होता है। यह एक सामान्य अनुभव है कि शरीर में किसी प्रकार का सिंचन होने पर शीत उत्पन्न होता है।

ऐतरेय ब्राह्मण १.१५ में मनुष्य राजा के आगमन पर उक्षा के आलभन का और सोम राजा के आगमन पर अग्नि के मन्थन का उल्लेख है जिसका निहितार्थ अन्वेषणीय है।

वैदिक साहित्य में उक्षा के साथ वशा का सार्वत्रिक उल्लेख मिलता है। सामान्य रूप से वशा का अर्थ वन्ध्या गौ लिया जाता है। वश धातु कामना के अर्थ में भी आती है। उशना, जिसका प्रसिद्ध साम उक्ष्णः रन्ध्रम् है, शब्द की निरुक्ति भी वश धातु के आधार पर की जाती है। ऐसा हो सकता है कि कामना, अभीप्सा के पश्चात् ही उक्षण/सिंचन होता हो। ऋग्वेद ७.६४.४ में उल्लेख आता है कि जो स्तुति द्वारा मित्रावरुण के लिए गर्त/गड्ढे को खोदता है, मित्रावरुण उसी के लिए घृत से उक्षण करते हैं। ऋग्वेद ६.१६.४७ में हृदय से निर्मित ऋचा रूपी हवि अग्नि को प्रदान करने का उल्लेख है। यह हवियां अग्नि के लिए उक्षा, ऋषभ व वशा बन सकती हैं। आपस्तम्ब श्रौत सूत्र २२.२०.१६ से ऐसा संकेत मिलता है कि उक्थ्य आदि ही सवनीय उक्षा हैं। ऋग्वेद ९.८५.१० में मधुजिह्वा वाले वेनों/ऋत्विजों द्वारा गिरि पर स्थित उक्षा के दोहन के उल्लेख के संदर्भ में भी वेन स्तुति के अर्थ में हो सकता है।

ऋग्वेद में कई ऋचाओं जैसे ३.६२.१६, ७.६५.४, ८.५.६ में घृत द्वारा गव्यूति का उक्षण करने के उल्लेख आते हैं। ऋग्वेद ३.६२.१६ में मधु द्वारा रजों/अन्तरिक्षों का उक्षण, ऋग्वेद ५.६३.५ में पयः द्वारा उक्षण तथा ऋग्वेद १०.५२.६ व अथर्ववेद ३.१२.१ व ४ में घृत द्वारा उक्षण के उल्लेख हैं जिनके निहितार्थ अन्वेषणीय हैं। अथर्ववेद १२.१.९ में भूमि द्वारा वर्च से उक्षण का उल्लेख है। ऋग्वेद ५.८.७ में ओषधि द्वारा अग्नि के उक्षण का उल्लेख है।

उक्षा, ऋषभ, वशा आदि की व्याख्या के प्राचीन प्रयासों में जैमिनीय श्रौत सूत्र २५.४ की भवत्रात वृति का उल्लेख किया जा सकता है: जितरेतस्कमुक्षाणम् ऋषभं पूर्णयौवनम्। विद्याद् वशां वृषारूढां बृहत्ककुदमुन्नतम्।'

वयस्येष्टका स्थापना के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण ८.२.४.७ में वयः द्वारा उक्षा की प्राप्ति का उल्लेख है जिसके लिए ककुप् छन्द है। इसके विपरीत, तैत्तिरीय ब्राह्मण २.६.१७.७ व २.६.१८.४ में द्विपद छन्द का उल्लेख है।

वैदिक निघण्टु में उक्षा की महत् नामों के अन्तर्गत परिगणना की गई है जिसकी सम्यक् व्याख्या अपेक्षित है। अन्यत्र उल्लेख आता है कि उक्षा का बृहत् रूप उषा/उखा है।

 

संदर्भ

उक्षा

१ नि त्वामग्ने मनुर्दधे ज्योतिर्जनाय शश्वते । दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः । ।- . .३६.१९

२ ते जज्ञिरे दिव ऋष्वास उक्षणो रुद्रस्य मर्या असुरा अरेपसः । पावकासः शुचयः सूर्या इव सत्वानो न द्रप्सिनो घोरवर्पसः । । - दे. मरुतः- . .६४.

३ त उक्षितासो महिमानमाशत दिवि रुद्रासो अधि चक्रिरे सदः । अर्चन्तो अर्कं जनयन्त इन्द्रियमधि श्रियो दधिरे पृश्निमातरः । । दे. मरुतः- . .८५.

. उपह्वरेषु यदचिध्वं ययिं वय इव मरुतः केन चित् पथा । श्चोतन्ति कोशा उप वो रथेष्वा घृतमुक्षता मधुवर्णमर्चते । । दे. मरुतः- . .८७.

. अमी ये पञ्चोक्षणो मध्ये तस्थुर्महो दिवः । देवत्रा नु प्रवाच्यं सध्रीचीना नि वावृतुर्वित्तं मे अस्य रोदसी । । पञ्च उक्षणः - इन्द्र, वरुण, अग्नि, अर्यमा, सविता अथवा अग्नि, वायु सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र-सायण)- ऋ. १.१०५.१०

६ मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम् । म नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः ।  . . ११४.

. इमे ये ते सु वायो बाह्वोजसो ऽन्तर्नदी ते पतयन्त्युक्षणो महि व्राधन्त उक्षणः । धन्वञ्चिद् ये अनाशवो जीराश्चिदगिरौकसः । सूर्यस्येव रश्मयो दुर्नियन्तवो हस्तयोर्दुर्नियन्तवः  . .१३५.

८ होता यक्षद् वनिनो वन्त वार्यं बृहस्पतिर्यजति वेन उक्षभिः पुरुवारेभिरुक्षभिः  ..१३९.१०

९ यद् युञ्जाथे वृषणमश्विना रथं घृतेन नो मधुना क्षत्रमुक्षतम् । अस्माकम ब्रह्म पृतनासु जिन्वतं वयं धना शूरसाता भजेमहि ।  . .१५७.

१० शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एनावरेण । उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।  . .१६४.४३

११ यस्मा ऊमासो अमृता अरासत रायस्पोषं च हविषा ददाशुषे । उक्षन्त्यस्मै मरुतो हिता इव पुरू रजांसि पयसा मयोभुवः ।  . .१६६.

१२ सहस्रियासो अपां नोर्मय आसा गावो वन्द्यासो नोक्षणः ।  . .१६८.

१३ तमुक्षमाणं रजसि स्व आ दमे चन्द्रमिव सुरुचं ह्वार आ दधुः । । पृश्न्याः पतरं चितयन्तमक्षभिः पाथो न पायुं जनसी उभे अनु ।  .. .

१४. साध्वपांसि सनता न उक्षिते उषासानक्ता वय्येव रण्विते । तन्तुं ततं संवयन्ती समीची यज्ञस्य पेशः सुदुघे पयस्वती ।  . ..

१५. इन्द्रमजुर्यं जरयन्तमुक्षितं सनाद् युवानमवसे हवामहे । । - . .१६.

१६ सत्रासाहो जनभक्षो जनंसहश्च्यवनो युध्मो अनु जोषमुक्षितः । दे. इन्द्रः- . . २१.

१७. उक्षन्ते अश्वाँ अत्याँ इवाजिषु नदस्य कर्णैस्तुरयन्त आशुभिः । हिरण्यशिप्रा मरुतो दविध्वतः पृक्षं याथ पृषतीभिः समन्यवः ।  . . ३४.

१८. अध्वर्युभिः पञ्चभिः सप्त विप्राः प्रियं रक्षन्ते निहितं पदं वेः । प्राञ्चो मदन्त्युक्षणो अजुर्या देवा देवानामनु हि व्रता गुः ।। (सप्त विप्राः-सप्त वषट्कर्तारः- सायण)- . . .

१९. त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चासपर्यन्। औक्षन् घृतैरस्तृणन् बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त ।  . . .

२० आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्। मध्वा रजांसि सुक्रतुः- . . ६२.१६

२१ स तू नो अग्निर्नयतु प्रजानन्नच्छा रत्नं देवभक्तं यदस्य । धिया यद् विश्वे अमृता अकृण्वन् द्यौष्पिता जनिता सत्यमुक्षन् ।  . .. १०

२२ अहमपो अपिन्वमुक्षमाणा धारयं दिवं सदन ऋतस्य । ऋतेन पुत्रो अदितेर्ऋतावोत त्रिधातु प्रथयद् वि भूम ।  . .४२.

२३ मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरर्कैः । यत् सीं वरिष्ठे बृहतीविमिन्वन् रुवद्धोक्षा पप्रथानेभिरेवैः ।  . .५६.

२४. देवी देवेभिर्यजते यजत्रैरमिनती तस्थतुरुक्षमाणे । ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्भिरर्कैः ।  . .५६.

२४. त्वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतैः सुम्नायवः सुषमिधा समीधिरे । स वावृधान ओषधीभिरुक्षितो ऽभि ज्रयांसि पार्थिवा वि तिष्ठसे ।  - . ..

२५. यस्य मा परुषाः शतमुद्धर्षयन्त्युक्षणः । अश्वमेधस्य दानाः सोमा इव त्र्याशिरः ।  . .२७.५ २६ प्र सुष्टुतिः स्तनयन्तं रुवन्तमिळस्पतिं जरितर्नूनमश्याः । यो अब्दिमाँ उदनिमाँ इयर्ति प्र विद्युता रोदसी उक्षमाणः ।  . .४२. १४

२७. उक्षा समुद्रो अरुषः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुरा विवेश । मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रजसस्पात्यन्तौ ।  - . .४७.

२८. ते स्पन्द्रासो नोक्षणो ऽति ष्कन्दन्ति शर्वरीः । मरुतामधा महो दिवि क्षमा च मन्महे ।  . .५२. ३ २९ साकं जाताः सुभ्वः साकमुक्षिता श्रिये चिदा प्रतरं वावृधुर्नरः । विरोकिणः सूर्यस्येव रश्मयः शुभं यातामनु रथा अवृत्सत ।  . .५५.

३० हये नरो मरुतो मृळता नस्तुवीमघासो अमृता ऋतज्ञाः । सत्यश्रुतः कवयो युवानो बृहद्गिरयो बृहदुक्षमाणाः । ऋ. .५७., .५८.

३१ प्र वः स्पळक्रन् त्सुविताय दावने ऽर्चा दिवे प्र पृथिव्या ऋतं भरे । उक्षन्ते अश्वान् तरुषन्त आ रजो ऽनु स्वं भानुं श्रथयन्ते अर्णवैः ।  . .५९.

३२ रथं युञ्जते मरुतः शुभे सुखं शूरो न मित्रावरुणा गविष्टिषु । रजांसि चित्रा वि चरन्ति तन्यवो दिवः सम्राजा पयसा न उक्षतम् ।  . .६३.

३३ आ ते अग्न ऋचा हविर्हृदा तष्टं भरामसि । ते ते भवन्तूक्षण ऋषभासो वशा उत ।  . . १६.४७

३४. ते त्वा मदा बृहदिन्द्र स्वधाव इमे पीता उक्षयन्त द्युमन्तम् । महामनूनं तवसं विभूतिं मत्सरासो जर्हृषन्त प्रसाहम्। ऋ. .१७.

३५. यो वां गर्तं मनसा तक्षदेतमूर्ध्वां धीतिं कृणवद् धारयच्च । उक्षेथां मित्रावरुणा घृतेन ता राजाना सुक्षितीस्तर्पयेथाम् ।  . .६४.

३६. आ नो मित्रावरुणा हव्यजुष्टिं घृतैर्गव्यूतिमुक्षतमिळाभिः । प्रति वामत्र वरमा जनाय पृणीतमुद्नो दिव्यस्य चारोः ।  . .६५.

३७. अध प्लायोगिरति दासदन्यानासंगो अग्ने दशभिः सहस्रैः । अधोक्षणो दश मह्यं रुशन्तो नळा इव सरसो निरतिष्ठन् ।  . ..३३

३८. ता सुदेवाय दाशुषे सुमेधामवितारिणीम्। घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम्। ऋ. ..

३९. उशना यत् परावत उक्ष्णो रन्ध्रमयातन । द्यौर्न चक्रदद् भिया ।  . ..२६

४० व्यश्वस्त्वा वसुविदमुक्षण्युरप्रीणादृषिः । महो राये तमु त्वा समिधीमहि ।  . .२३. १६

४१ ऋजमुक्षण्यायने रजतं हरयाणे । रथं युक्तमसनाम सुषामणि ।  . .२५.२२

४२. वयं हि वां हवामह उक्षण्यन्तो व्यश्ववत्।  सुमतिभिरुप विप्राविहा गतम्।  . .२६.

४३ उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे । स्तोमैर्विधेमाग्नये ।  . .४३. ११

४४. शतं श्वेतास उक्षणो दिवि तारो न रोचन्ते । महा दिवं न तस्तभुः ।  . .५५.

४५. उक्षा मिमाति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीरुप यन्ति निष्कृतम् । अत्यक्रमीदर्जुनं वारमव्ययमत्कं न निक्तं परि सोमो अव्यत ।  . .६९.

४६. नाभा पृथिव्या धरुणो महो दिवो ऽपामूर्मौ सिन्धुष्वन्तरुक्षितः । इन्द्रस्य वज्रो वृषभो विभूवसुः सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः ।  . .७२.

४७. अरूरुचदुषसः पृश्निरग्रिय उक्षा बिभर्ति भुवनानि वाजयुः । मायाविनो ममिरे अस्य मायया नृचक्षसः पितरो गर्भमा दधुः । ऋ. .८३.

४८. दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतो वेना दुहन्त्युक्षणं गिरिष्ठाम् । अप्सु द्रप्सं वावृधानं समुद्र आ सिन्धोरूर्मा मधुमन्तं पवित्र आ ।  . .८५.१०

४९ अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते । सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृभ्णते । ।- . .८६.४३

५० सिंहं नसन्त मध्वो अयासं हरिमरुषं दिवो अस्य पतिम् । शूरो युत्सु प्रथमः पृच्छते गा अस्य चक्षसा परि पात्युक्षा ।  . . ८९.

५१ तं मर्मजानं महिष न सानावंशुं दुहन्त्युक्षणं गिरिष्ठाम् । तं वावशानं मतयः सचन्ते त्रितो बिभर्ति वरुणं समुद्रे ।  . .९५.

५२ तमुक्षमाणमव्यये वारे पुनन्ति धर्णसिम् । दूतं न पूर्वचित्तय आ शासते मनीषिणः ।  . .९९.

५३ अभूर्वौक्षीर्व्यु आयुरानड् दर्षन्नु पूर्वो अपरो नु दर्षत् । द्वे पवस्ते परि तं न भूतो यो अस्य पारे रजसो विवेष ।  . १०.२७.

५४. तेभ्यो गोधा अयथं कर्षदेतद्ये ब्रह्मणः प्रतिपीयन्त्यन्नैः । सिम उक्ष्णो ऽवसृष्टाँ अदन्ति स्वयं बलानि तन्वः शृणानाः ।  . १०.२८.११

५५. नैतावदेना परो अन्यदस्त्युक्षा स द्यावापृथिवी बिभर्ति । त्वचं पवित्रं कृणुत स्वधावान् यदीं सूर्यं न हरितो वहन्ति  . १०.३१.

५६ त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रिंशच्च देवा नव चासपर्यन् । औक्षन् गृतैरस्तृणन् बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त ।  . १०.५२.

५७. वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे । घसत् त इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द उत्तरः ।  . १०.८६. १३

५८. उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम् । उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।  . १०. ८६. १४

५९. यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अवसृष्टास आहुताः । कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे हृदा मतिं जनये चारुमग्नये ।  . १०. ९१. १४

६० यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरोहितं हविष्मन्त ईळते सप्त वाजिनम् । शृण्वन्तमग्निं घृतपृष्ठमुक्षणं पृणन्तं देवं पृणते सुवीर्यम् ।  . १०.१२२.

६१. अभि त्वा जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्ज्वा । यस्त्वा मृत्युरभ्यधत्त जायमानं सुपाशया । तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुदमुञ्चद् बृहस्पतिः । ।- अथर्ववेद ३.११.

६२ इहैव ध्रुवां नि मिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठाति घृतमुक्षमाणा । तां त्वा शाले सर्ववीराः सुवीरा अरिष्टवीरा उप सं चरेम  . .१२.

६३ इमां शालां सविता वायुरिन्द्रो बृहस्पतिर्नि मिनोतु प्रजानन्। उक्षन्तूद्ना मरुतो घृतेन भगो नो राजा नि कृषिं तनोतु ।  . . १२.

६४. उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे । वैश्वानरज्येष्ठेभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत् ।  .. २१.

६५. यस्य वशास ऋषभास उक्षणो यस्मै मीयन्ते स्वरवः स्वर्विदे । यस्मै शुक्रः पवते ब्रह्मशुम्भितः स नो मुञ्चत्वंहसः । अ. .२४.

६६ सिलाची नाम कानीनोऽजबभ्रु पिता तव । अश्वो यमस्य यः श्यावस्तस्य हास्नास्युक्षिता । - . ..८ ६७. शकमयं धूममारादपश्यं विषूवता पर एनावरेण । उक्षाणं पृश्निमपचन्त वीरास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।  . .१५.२५ ९.१०.२५५

६८. यस्यामापः परिचरा समानीरहोरात्रे अप्रमादं क्षरन्ति । सा नो भूमिर्भूरिधारा पयो दुहामथो उक्षतु वर्चसा ।  . १२..

६९ उत् त्वा वहन्तु मरुत उदवाहा उदप्रुतः । अजेन कृण्वन्तः शीतं वर्षेणोक्षन्तु बालिति ।  . १८..२२

७० अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते । सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृह्णते । । - . १८..१८

७१ उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे । स्तोमैर्विधेमाग्नये ।  . २०. .

७२ वृषाकपायि रेवति सुपुत्र आदु सुस्नुषे । घसच इन्द्र उक्षणः प्रियं काचित्करं हविर्विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः । ५ अ.२०. १२६.१३

७३. उक्ष्णो हि मे पञ्चदश साकं पचन्ति विंशतिम् । उताहमद्मि पीव इदुभा कुक्षी पृणन्ति मे विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ।  . २० .१२६.१४

७४. ते (असुराः) होचुः-हन्तेमां पृथिवीं विभजामहे, तां विभज्योपजीवामेति । तामौक्ष्णैश्चर्म्मभिः पश्चात् प्राञ्चो विभजमाना अभीयुः ----ते (देवाः) यज्ञमेव विष्णुं पुरस्कृत्येयुः ।-शतपथ ब्राह्मण १...

७५. अनुबन्धायागः - अथ यदा न कश्चन रसः पर्यशिष्यत् तत एषा मैत्रावरुणी वशा समभवत्। । तस्मादेषा न प्रजायते । रसाद्धिरेतः सम्भवति । रेतसः पशवः ।----तस्माद्वाऽएषाऽत्र मैत्रावरुणी वशाऽवक्लृप्ततमा भवति । यदि वशा न विन्देदप्युक्षवश एव स्यात्  .ब्रा....

७६. उक्षा वयः-इति । उक्षाणं वयसाऽऽप्नोत् । ककुप्छन्दः-इति । ककुब्भ भूत्वोक्षाण उच्चक्रमुः । - .ब्रा. .. .४७

७७. उक्षा समुद्रो अरुणः सुपर्णः - इति । उक्षा ह्येष समुद्रोऽरुणः सुपर्णः । पूर्वस्य योनिं पितुराविवेश-इति । पूर्वस्य ह्येष एतं योनिं पितुराविशति । मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा -इति । मध्ये ह्येष दिवो निहितः पृश्निरश्मा ।-  - - .ब्रा... .१८

७८. स यथा ब्राह्मणमावसथवासिनं क्रुद्धं यंतमुक्षवे हतोपमन्त्रयेत । एवमेवैतत् विश्वान्देवानुपमन्त्रयते  .ब्रा. १२...

७९. पुत्रमन्थकर्म ब्राह्मणम्ः अथ य इच्छेत। पुत्रो मे पंडितो विजिगीथः समितिङ्गमः शुश्रूषितां वाचं भाषिता जायेत । सर्वान् वेदाननुब्रुवीत । सर्वमायुरियात् इति । मांसौदनं पाचयित्वा । सर्पिष्मन्तमश्नीयाताम् । ईश्वरौ जनयितवै । औक्ष्णेन वा । आर्षभेण वा  .ब्रा. १४...१७

८०. उक्षान्नाय वशान्नाय इत्याग्नीध्रो यजति । सोमपृष्ठाय वेधसे इति । इन्द्रो वै वेधाः ।-गोपथ ब्राह्मण २..२०

८१ त्वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतेन । सुम्नायवः सुषमिधा समीधिरे । स वावृधान ओषधीभिरुक्षितः । उरु ज्रयाँसि पार्थिवा वितिष्ठसे ।-तैत्तिरीय ब्राह्मण १...१२ ८२ ८२ सुराया अनुमन्त्रणम् ः यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणः । वशामेषा अवसृष्टास आहुताः । कीलालपे सोमपृष्ठाय वेधसे । हृदा मतिं जनय चारुमग्नये  तै.ब्रा. ...

८३. पश्वन्तर विषये प्रयाजार्था मैत्रावरुण प्रैषाः - होता यक्षत्सुरेतसम् । त्वष्टारं पुष्टिवर्धनम्। रूपाणि बिभ्रतं पृथक्। पुष्टिमिन्द्रं वयोधसम्। द्विपदं छन्द इहेन्द्रियम्। उक्षाणं गां न वयो दधत् । वेत्वाज्यस्य होतर्यज  तै.ब्रा.२ ६.१७.

८४. कौकिल सौत्रामणी. त्वष्टा तुरीपो अद्भुतः । इन्द्राग्नी पुष्टिवर्धना । द्विपाच्छन्द इहेन्दियम्। उक्षा गौर्न वयो दधुः  तै.ब्रा. . .१८.

८५. पञ्चशारदीये पशु विधिः - अगस्त्यो मरुद्भ्य उक्ष्णः प्रौक्षत् । तानि आदत्त । त एनं वज्रमुद्यत्याभ्यायन्त । तानगस्त्यश्चैवेन्द्रश्च कयाशुभीयेनाशमयताम्।---तस्मादेत ऐन्द्रा मारुता उक्षाणः सवनीया भवन्ति । त्रयः प्रथमे ऽहन्नालभ्यन्ते । एवं द्वितीये । एवं तृतीये । एवं चतुर्थे । पञ्चोत्तमेऽहन्नालभ्यन्त । वर्षिष्ठमिव ह्येतदहः ।----- पञ्चशारदीयो वा एष यज्ञः । आपञ्चमात्पुरुषादन्नमत्ति । य एतेन यजते  तै.ब्रा. . .११.

८६ अथाऽऽग्रयणस्य पुरोरुचम्  त्रीणि शता त्रीषहस्राण्यग्निम्। त्रिँशच्च देवा नव चासपर्यन्। औक्षन्घृतैरास्तृणन्बर्हिरस्मै । आदिद्धोतारं न्यषादयन्त  तै.ब्रा. . .१२.

८७ यद् आहवनीयम् अनुद्धतम् अभ्य् अस्तम् इयात् किं तत्र कर्म का प्रायश्चित्तिर् इति ।----- -तद् यथा वा अदवद आवथवासिनं क्रुद्धं यन्तम् उक्षवेहता वानुमन्त्रयेतान्येन वा प्रियेण धाम्नैवम् एव तद् विश्वान् देवान् अनुमन्त्रयते । ते हास्मै सर्व एवाक्रुद्धा भवन्ति । जै.ब्रा. .६२

८८ अथैष पञ्चशारदीयः ।----तस्य पञ्च शरदः पञ्चोक्षाणः प्रोक्षिताश् चरन्ति । तद् यत् पञ्चशरदः पञ्चोक्षाणः प्रोक्षिताश् चरन्ति, तस्मात् पञ्चशारदीयः । त उ सर्वे पृश्नयो भवन्ति  जै.ब्रा. .१७६

८९. एताम् उ ह स्म वै तत् कुंस्थः कालाशभिर् उपगायति-अरुणान् सदम् उक्षन् अश्वान काष्ठातो यथा । पूर्णान् परिस्रुतः कुम्भाञ् जनमेजयसादन । । इति । यं ह वा एतैस् सामभिः कामं कामयते तम् एवावरुन्द्धे । जै.ब्रा. .१ ।३३१

९० यथा ह वै शारद उक्षैव महाव्रतम्। स यथा शारदम् उक्षाणं वागराभिः परितत्यालभेरन्न् एवम् एवैतत् परिमाद्भिर् महाव्रतम् आलभन्ते व्रतस्याप्रक्षयाय  जै.ब्रा. .४०३

९१ सो (मनुः) ऽकामयताप रक्षांसि हनीयेति । स एतत् सामापश्यत्। तेनास्तुत । नि त्वाम् अग्ने मनुर् दधे ज्योतिर् जनाय शश्वते । दीदेथ कण्व ऋतजात उक्षितो यं नमस्यन्ति कृष्टयः  जै.ब्रा. . ९८

९२ अथौक्ष्णोरन्ध्रम् । उक्ष्णो वै रन्ध्रः काव्यो ऽकामयताद्भिः प्रतीपं स्वर्गं लोकम् आरोहेयम् अस्तु मे वर्त्मानि पश्येयं नियानम् इति । स एतत् सामापश्यत्। तेनास्तुत -----स एवोशना काव्यः । स ह स यमुनयैव प्रतीपं स्वर्गं लोकम् आरोहत्। तद् एतत स्वर्ग्यं साम  जै.ब्रा. .१५०

९३ अथ ह वा इमानि वनानीमाश् च नद्यो ऽपरतार आस पुरा सिन्धोर् आसुः । तौ ह पश्चात् परीत्य प्राचीः प्ररुरुधतुः । ततो यान्य् उक्षशर्धतान्य् आसंस् तानीमानि लवणानि  जै.ब्रा. .२३९

९४. उक्षा मिमाति प्रति यन्ति धेनवो देवस्य देवीर् उप यन्ति निष्कृतम्। अत्य् अक्रमीद् अर्जुनं वारम् अव्ययम् अत्कं न निक्तं परि सोमो अव्यत । । इति परिवतीर् भवन्त्य् अन्तस्य रूपम्। अन्तो ह्य् एतद् अहः  जै.ब्रा. . २९८

९५. अष्टम अहः (माध्यंदिन पवमानः) - औक्ष्णोरन्ध्रे भवतः । उक्ष्णोरन्ध्रो वा एताभ्याङ्काव्योऽञ्जसा स्वर्गं लोकमपश्यत् स्वर्गस्य लोकस्यानुख्यात्यै स्वर्गात् लोकान्न च्यवते तुष्टुवानः -ताण्ड्य ब्रा.१३. .१८

९६. अगस्त्यो वै मरुद्भ्य उक्ष्णः प्रौक्षत्तानिन्द्रायाबध्नात्ते वज्रमादायाभ्यपतत्ता एतत्कयाशुभीयमपश्यत्तेनाशमयत्।----- सप्तदश पृश्नीनुक्ष्णः पञ्चवर्षात् सप्तदश पृश्नीस्त्रिवत्सा अप्रवीतास्तान् पर्यग्निकृतान् प्रोक्षितानेतरालभन्ते प्रेतरान् सृजन्ति । ततः संवत्सरे नवनीतपृश्नीररुणा आनयन्ति ताँश्चैवोक्ष्णस्तान् पर्यग्निकृतान् प्रोक्षितानेतरालभन्ते प्रेतरान् सृजन्ति ततः संवत्सरे राजीवा आनयन्ति ताँश्चैवोक्ष्णस्तान् पर्यग्निकृतान् प्रोक्षितानेतरालभन्ते प्रेतरान् सृजन्ति ततः संवत्सरे पिशङ्गीरानयन्ति ताँश्चैवोक्ष्णस्तान् पर्यग्निकृतान् प्रोक्षितानेतरालभन्ते प्रेतरान् सृजन्ति ततः संवत्सरे सारङ्गीरानयन्ति ताँश्चैवोक्ष्णस्तान् पर्यग्निकृतान् प्रोक्षितानेतरालभन्ते प्रेतरान् सृजन्ति । ततः संवत्सरे सोमा भवन्ति । त्रीँस्त्रीनन्वहमालभन्ते पञ्चोत्तमेहनि । अजोग्नीषोमीयः । ऐन्द्रामारुता उक्षाणो मारुत्यो वत्सतर्य्यः - ताण्ड्य ब्राह्मण २१.१४.

९७ अग्निं मन्थन्ति सोमे राजन्यागते । तद्यथैवादो मनुष्यराज आगतेऽन्यस्मिन्वार्हंत्युक्षाणं वा वेहतं वा क्षदन्त एवमेवास्मा एतत्क्षदन्ते यदग्निं मन्थन्त्यग्निर्हि देवानां पशुः ऐतरेय ब्राह्मण १.१५

९८ मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे इति द्यावापृथिवीयं रुवद्धोक्षेति पशुरूपं पञ्चमेऽहनि पञ्चमस्याह्नो रूपम् ।- .ब्रा. .

९९ प्रस्थित याज्या. आग्नीध्रस्य याज्याया ऐन्द्रत्वं संपादयति-उक्षान्नाय वशान्नायेत्याग्नीध्रो यजति सोमपृष्ठाय वेधस इतीन्द्रो वै वेधास्तदैन्दं रूपं तेनेन्द्रं प्रीणाति ।- .ब्रा. .१०

१०० काम्ययाज्यापुरोनुवाक्या ः - उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे । स्तोमैर्विधेमाग्नये ।-तैत्तिरीय संहिता १.१४.

१०१ ब्रह्मवर्चसकामादीनां पशुविधिः - ते ( देवाः) प्रजापतिमुपाधावन्त्य एतौ प्रजापतिरात्मन उक्षवशौ निरमिमीत ते देवा वैष्णावरुणीं वशामाऽलभन्तैन्द्रमुक्षाणं ते वरुणेनैव ग्राहयित्वा विष्णुना यज्ञेन प्राणुदन्तैन्द्रेणैवास्येन्द्रियमवृञ्जत यो भ्रातृव्यवान्त्स्यात्स स्पर्धमानो वैष्णावरुणीम् वशामा लभेतैन्द्रमुक्षाणं- - - -  - तै.सं. ...

१०२ वषट्कारो वै गायत्रियै शिरोऽच्छिनत्तस्यै रसः पराऽपतत्तं बृहस्पतिरुपागृह्णात्सा शितिपृष्ठा वशाऽभवद्यो द्वितीयः परापतत्तं मित्रावरुणावुपागृह्णीताँ सा द्विरूपा वशाऽभवद्यस्तृतीयः परापतत्तं विश्वे देवा उपागृह्णन्त्सा बहुरूपा वशाऽभवद्यश्चतुर्थः परापतत्स पृथिवीं प्राविशत्तं बृहस्पतिरभि अगृह्णादस्त्वेवायं भोगायेति स उक्षवशः समभवत्- तै.सं. . ..

१०३ छन्दसां वा एष रसो यद् वशा रस इव खलु वै सजाताश्छन्दसामेव रसेन रसँ सजातानव रुन्धे बार्हस्पत्यमुक्षवशमालभेत ब्रह्मवर्चसकामो बृहस्पतिमेव स्वेन भागधेयेनोप धावति स एवास्मिन्ब्रह्मवर्चसं दधाति ब्रह्मवर्चस्येव भवति वशं वा एष चरति यदुक्षा वश एव खलु वै ब्रह्मवर्चसं- तै.सं. . ..

१०४. वयस्याख्येष्टकाभिधानम् उक्षा वयः सतोबृहती छन्द - तै.सं. .. .

१०५. चित्याग्निहोमोक्तिः - मा नो महानामुत मा नो अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम् । मा नो वधीः पितरं मोत मातरं प्रिया मा नस्तनुवः रुद्र रीरिषः  तै.सं. ..१०.

१०६ अग्निप्रणयनाभिधानम्. उक्षा समुद्रो अरुणः सुपर्णः पूर्वस्य योनिं पितुरा विवेश । मध्ये दिवो निहितः पृश्निरश्मा वि चक्रमे रजसः पात्यन्तौ  तै.सं. ... ४ १०७. वसोर्धाराद्यभिधानम् ः- उक्षा च मे वशा च म- तै.सं. ..१०.

१०८. त्वामग्ने प्रदिव आहुतं घृतेन सुम्नायवः सुषमिधा समीधिरे । स वावृधान ओषधीभिरुक्षित उरु ज्रयांसि पार्थिवा वितिष्ठसे । ।-आप.श्रौ.सू. ..

१०९. अग्निहोत्री के प्रवास से गृह आगमन पर ः इरां वहन्तो घृतमुक्षमाणास्तेष्वहं सुमना संविशामीति प्रविश्य जपति  आप.श्रौ.सू. .२७.

११० अग्निचयनम् उक्षान्नाय वशान्नायेत्येताभिः षड्भिश्चितिंचितिमुपधायाभिजुहोति

आप.श्रौ.सू. .६३५.

१११. सोमस्याग्ने वीहीत्यनुयजति ।-----

यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षणो वशा मेषा अवसृष्टास आहुताः ।- - -- आप. श्रौ.सू. १९. .

११२ प्राशृङ्गो ऽवाशृङ्ग उक्षा वशा वेहद्धेनुर्वत्स ऋषभोऽनड्वान्पुनरुत्सृष्टो गोमृग इति गव्याः । अन्नाय

वेहतमालभते---- आप.श्रौ.सू. १९. १६.१६

११३ पञ्चशारदीयेन बहोर्भूयान्भवति ।-- -सप्तदश पृश्नीनुक्ष्णः पञ्चवर्षानानयन्ति ।---- प्रोक्षितान्पर्यग्निकृतानुक्ष्ण उत्सृजन्ति ।-- -एत उक्षाणः सवनीयाः । त्रींस्त्रीनन्वहमालभन्ते । पञ्चोत्तमे ऽहन् । ऐन्द्रमारुता उक्षाणः । मारुत्यो वत्सतर्यः । यद्युक्ष्णो रुद्रो ऽभिमन्येत  आप.श्रौ.सू. २२.२०.

११४. अग्निहोत्री के प्रवास से गृह आगमन पर - -- इरां वहन्तो घृतमुक्षमाणास्तेष्वहं सुमना संविशानीति -आश्वलायन श्रौ.सू. ..१७

११५--उक्षान्नाय वशान्नायेति प्रातःसवनिक्यः प्रस्थितयाज्याः ।-आश्वलायन श्रौ.सू. ..१९

११६ पञ्चशारदीयस्य तु सप्तदशोक्षाण ऐन्द्रामारुता मारुतीभिः सह वत्सतरीभिः सप्तदशभिः सप्तदशभिः पञ्चवर्षपर्यग्निकृताः सवनीयाः । तेषां त्रींस्रीश्चतुर्ष्वहस्वालभे-रन्परिशिष्टान्पञ्च पञ्चमे  आश्वलायन श्रौ.सू. १०..२९

११७. वैश्यस्तोमदक्षिणालिङ्गान् । उक्ष्णो वत्सतरीर्वर्णानुपूर्व्येण ।-- पर्यग्निकृतानुत्सृजन्त्युक्ष्णो वत्सतरीभिः संस्थापयन्ति । एवं पञ्च वर्षाण्युक्ष्णो नियुञ्जन्ति । षष्ठे सवनीया भवन्ति त्रयस्त्रयोऽन्वहमैन्द्रामारुताः । पञ्चोत्तमे -कात्यायन श्रौ.सू. २३..

११८. अग्निचयनम् ----अथ विषुवत्याग्नीध्रस्य काले पृश्निमश्मानं निदधाति विमान एष दिव उक्षा समुद्र इति द्वाभ्यामथ चतसृभिः---बौ.श्रौ.सू.१०. ५१

११९ इष्टिकल्पः - अग्नये ऽन्नवते पुरोडाशमष्टाकपालं निर्वपेद्यः कामयेतान्न-वान्त्स्यामिति तस्या एते भवत उक्षान्नाय वशान्नाय- बौ.श्रौ.सू. १३. ६ १२०. सौत्रामणी यस्मिन्नश्वास ऋषभास उक्षण इत्यनुवषट्कृते हुत्वाश्विनस्य सँस्रावँ सारस्वते ऽवनयति- --- बौ.श्रौ.सू. १७.३५

१२१ पञ्चशारदीयः - अथैतेषां पशूनां त्रयः प्रथमे ऽहन्नैन्द्रामारुता उक्षाणः सवनीया आलभ्यन्त एवं द्वितीय एवं तृतीय एवं चतुर्थे पञ्चोत्तमे ऽहन्नालभ्यन्ते वर्षिष्ठमिव ह्येतदहर्मन्यन्ते- बौ.श्रौ.सू. १८.११

१२२. वनिष्ठुसवः - स उपकल्पयते शतमुक्षवेहत शतं दार्वाचितानि शत सर्पिष्पात्राच्छतं पयःपात्रान्---- ---- -अथैतानि दार्वाचितानि प्रदोष एवाग्नावादधाति तेषु प्रज्योतिषूक्षवेहतो निघ्नन्ति----बौ.श्रौ.सू. १८.४०

१२३ ---आज्ञा औक्षा भूरयः---- बौ. श्रौ.सू.प्रवर १७

१२४. अथ जायामानीय स्वान् गृहान् प्रपादयति- महान् गृहान् सुमनसः प्रपद्येऽवीरघ्नी वीरवतस्तुवीरान्। इरां वहतो घृतमुक्षमाणास्तेष्वहं सुमनास्संविशानि इति ।- बौधायन गृह्य सूत्र १..