पुराण विषय अनुक्रमणिका

PURAANIC SUBJECT INDEX

(From Pitaa to Puurnabhadra  )

Radha Gupta, Suman Agarwal & Vipin Kumar

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Pitaa- Pitriyaana ( words like  Pitaa / father, Pitaamaha / grandfather etc. )

Pitrivartee - Pishangajata ( Pinaaki, Pipeelikaa / ant, Pippalaa, Pippalaada etc.)

Pishaacha - Peevari ( Pishaacha, Pishta / ground, Peetha / chair, Peeta / yellow, Peevari etc.)

Punshchalee - Punyajana ( Punjikasthalaa, Pundareeka, Pundra, Punya etc.)

Punyajani - Punarvasu ( Punyasheela, Putra / son, Putri / Putree / daughter, Punarvasu etc.)

Punnaaga - Pureesha (Pura / residence, Puranjana, Puranjaya, Purandara, Puraana, Pureesha etc. ) 

Puru - Purusha ( Puru, Purukutsa, Purusha / man etc. )

Purusha - Pulaka  ( Purushasuukta, Purushaartha, Purushottama, Puruuravaa, Purodaasha, Purohita etc.)

Pulastya - Pulomaa ( Pulastya, Pulinda, Pulomaa etc.)

Pulkasa - Pushkaradweepa (  Pushkara etc. )

Pushkaraaksha - Pushpa ( Pushkaraavarta, Pushkarini /pushkarinee, Pushkala, Pushti, Pushpa / flower etc.)

Pushpaka - Pushya ( Pushpaka, Pushpadanta, Pushpabhadra, Pushya etc.)

Pushyamitra - Puujaa (Puujaa / worship)

Puutanaa - Puurnabhadra (  Puurana, Puuru /pooru, Puurna / poorna / complete, Puurnabhadra /poornabhadra etc.)

 

 

In yaaga rituals, a special sacrificial bread is prepared by baking of dough of cereals. The preparation of dough involves removing husk from the cereal in a mortar and pestle, grinding it on a grinding stone by another stone and then adding water. The processes seem too trivial until their inner meaning is understood. Grinding is done to insert all types of life forces in gross matter. Vedic texts clarify what is the upper limit of grinding. The purpose of grinding is to convert the gross matter into a state equivalent to an active matter which can germinate in a proper womb. This grinding is done not by stones, but by a special light or power. Grinding work has been assigned to a maid. What is the esoteric meaning of a maid, is yet to be investigated. 

 

पिष्ट

टिप्पणी : दर्शपूर्णमास आदि यागों में पुरोडाश के निर्माण हेतु धान्य को पहले उलूखल व मुसल द्वारा धान्य की भूसी निकाली जाती है और उसके पश्चात् पत्थर की सिल व बट्टे द्वारा उसे पीसा जाता है । शतपथ ब्राह्मण १.२.१.२० के अनुसार पीसते समय प्राणाय त्वा, उदानाय त्वा, व्यानाय त्वा इत्यादि मन्त्र कहना चाहिए जिसका अर्थ होगा कि पिष्ट में प्राण, उदान, व्यान के समावेश के लिए पेषण का कार्य किया जा रहा है । कृष्ण यजर्वेद के ग्रन्थों में उदान के स्थान पर अपान प्रकट हुआ है ( उदाहरण के लिए, आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १.२१.६) । जिस पत्थर की सिल द्वारा धान्य का पेषण किया जाता है, उसे यज्ञ की भाषा में दृषद् कहते हैं तथा बट्टे को उपल कहते हैं । दृषद् के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण १.२.१.१५ आदि में कहा गया है कि दृषद् पर्वती धिषणा है और उपल पार्वतेयी धिषणा है । में दृषद् को हनु का रूप कहा गया है क्योंकि हनु में ऊपर नीचे के दो जबडे पेषण का कार्य करते हैं । दोनों जबडों के बीच स्थित जिह्वा को यज्ञ की भाषा में शम्या नाम दिया गया है ।

          ऋग्वेद की कुछ एक ऋचाओं में पिष्ट शब्द अपने अन्य रूपों सहित प्रकट हुआ है । वैदिक निघण्टु में पिष्टम् का वर्गीकरण रूप नामों के अन्तर्गत किया गया है । इस वर्गीकरण का रहस्य इतिहासोपनिषद १८:१२ के एक आख्यान से खुलता है । इस आख्यान में राजा शिबि के पास पांच रत्न हैं । इनमें से एक रत्न के सम्बन्ध में कहा गया है कि 'त्विषिर्मे अजस्रं पिनष्टि'। इन रत्नों में से कोई भी एक वह इतिहास का स्मरण कराने वाले ब्राह्मण को देना चाहता है । ब्राह्मण अपने परिवारजनों से उन पांच रत्नों में से एक का चयन करने के सम्बन्ध में पूछता है । दासी की इच्छा है कि दृषद् को ग्रहण किया जाए । अतः यहां त्विषि दृषद् का पर्यायवाची है । त्विषि शब्द दीप्ति के अर्थ में आता है । इसका अर्थ हुआ कि यज्ञ की दृषद् भी कोई साधारण पत्थर की दृषद् नहीं है अपितु वह दीप्ति से निर्मित कोई दृषद् है जो जड पदार्थ के पेषण का कार्य करती है । ऋग्वेद १०.१८४.१ में पेषण के संदर्भ में त्वष्टा का नाम आया है जहां कहा गया है कि त्वष्टा ने रूपों द्वारा सारे भुवनों का पेषण किया । त्वष्टा शब्द की व्यnत्पत्ति भी त्विष~ - दीप्तौ धातु के आधार पर होती है । ऋग्वेद १०.१८४.१ में कामना की गई है कि विष्णn योनि का कल्पन करे, त्वष्टा रूपों का पेषण करे, सिंचन का कार्य प्रजापति करे और धाता गर्भ को धारण करे । इसका निहितार्थ यह हुआ कि त्वष्टा द्वारा रूपों का पेषण उस सीमा तक होता है जहां वह योनि में धारण करने योग्य रेतः रूप हो जाता है । शतपथ ब्राह्मण ११.१.२.१ में दृषद् - उपल द्वारा यज्ञ के हनन के संदर्भ में रेतः सिंचन अग्नि की योनि में करने का उल्लेख है । इसी प्रकार ऋग्वेद २.३३.९ में बभ्रn संज्ञक रुद्र द्वारा शुक्र व हिरण्यों द्वारा पेषण किया जाता है । ऋग्वेद ५.५६.१ में रुक्म अंजियों द्वारा पेषण का उल्लेख आता है । ऋग्वेद ५.५७.६ में मरुतों की श्री द्वारा तनुओं में पेषण करने का उल्लेख है । जैमिनीय ब्राह्मण १.४८ में मृत दीक्षित के आण्ड स्थान पर दृषद् रखने का निर्देश है जबकि शिश्न पर शम्या । यह भी संकेत करता है कि यज्ञ में दृषद् का स्थान वैसे ही है जैसे भौतिक जगत में रेतः का निर्माण करने वाले आण्ड - द्वय का । इस रेतः को किसी उपयुक्त योनि में धारण करने पर पिण्ड का, गर्भ का निर्माण होता है ।

          दासी द्वारा दृषद् पर पेषण का निर्देश आपस्तम्ब श्रौत सूत्र १.२१.६ में भी आता है । दासी क्या हो सकता है, इस संदर्भ में श्रीमती राधा का विचार है कि हमारा जो ज्ञान अहंकार के आधीन है, वह दासी है ।

          पुराणों में ५ धान्यों के पेषण का निर्देश है जबकि शतपथ ब्राह्मण १४.९.३.२२ में १० ग्राम्य धान्यों के पेषण का निर्देश है ।

          शतपथ ब्राह्मण २.६.१.५ में बर्हिषद् नामक पितरों की हवि के रूप में अर्ध पिष्ट, अर्ध अपिष्ट धान का निर्देश है । पैप्पलाद संहिता २.२.५ में पिष्ट - अपिष्ट विष का उल्लेख आता है । अर्ध पिष्ट - अर्ध अपिष्ट से क्या तात्पर्य है, यह अन्वेषणीय है ।

          ऐतरेय ब्राह्मण २.९ में पेषण आदि द्वारा पुरोडाश निर्माण के संदर्भ में भूसी /किंशारूणि द्वारा रोमों के तथा पिष्ट द्वारा पुरोडाश के मांस के निर्माण का उल्लेख है । शतपथ ब्राह्मण १.२.३.८ के अनुसार जब पिष्ट में आपः का संयोजन किया जाता है तो उस समय पिष्ट लोम रूप होते हैं इत्यादि । ऋग्वेद १.१६१.१० में मांस के पेषण का उल्लेख है । ऋग्वेद ३.६०.२ तथा १.१६१.९ में ऋभुओं द्वारा चमसों के पेषण का उल्लेख है । पैप्पलाद संहिता ६.१५.५ में पिष्ट ऊर्जा का उल्लेख है । अथर्ववेद १२.२.५३ में पिष्ट माषा:(मासा:?) का उल्लेख है । वाजसनेयि संहिता २१.४६ में पिष्टतम रशना द्वारा धारित वनस्पति(यूप?) का उल्लेख है ।

 

 

 

 

ESOTERIC ASPECT OF NANOTECHNOLOGY

 

Vipin Kumar

National Physical Laboratory, New Delhi - 110012

&

Lakshmi Narayan Dhoot

3- Shreepuram, Ranade Compound Extension, Old palasia, Indore - 452018

 

ABSTRACT

 

It is a general practice in Materials Sciences now a days that in order to change the properties of the material, the material is converted into smallest particles either mechanically or chemically, impurities are mixed in it and then the particles are pressed together and sintered at high temperature. Powder technology exists in Hindu mythology also, but in the realm of consciousness. All the creatures in this world may be the powdered form of one single entity called God. But the question is, can all these so called powder particles be again collected and sintered back to that original God? The answer according to Hindu texts is that particle surface has been turbid and if these particles have to be combined together again, this surface has to be cleaned by the methods specified in the sacred texts, viz. devotion.

 

 नैनोटेक्नालाजी का दूसरा पक्ष

 

विशिष्ट गुणधर्म वाले पदार्थों के निर्माण में आजकल नैनोटेक्नालाजी का उपयोग किया जा रहा है । जब पदार्थों के कण नैनोमीटर के आकार में होते हैं तो उस समय यह कहा जा सकता है कि यह १, १०, १००, १००० अणुओं का एक समूह होता है । कणों को इतना छोटा आकार देने का लाभ यह होता है कि उसमें कुछ अन्य उपयुक्त पदार्थ की थोडी सी मात्रा मिला कर वांछित गुण वाले पदार्थों का निर्माण किया जा सकता है । उदाहरणार्थ, टिन आक्साइड जो कि विद्युत के लिए कुचालक है, उसे नैनोमीटरिक कणों के आकार में पीस कर उस महीन चoर्ण में एण्टीमनी लवण की अल्प मात्रा मिला दी जाती है और फिर मिश्रण को ईंट की भांति पका कर ठोस पदार्थ का रूप दे दिया जाता है । इस प्रकार वांछित चालकता वाला ठोस पदार्थ प्राप्त किया जा सकता है ।

          अब इस नैनोटेक विज्ञान के उदाहरण से जैविक सृष्टि की संरचना को समझने का प्रयास करते हैं । महान् व्यक्तियों का कथन है कि एक ही सार्वलौकिक चेतना विभिन्न प्राणियों के रूप में प्रस्फुटित हुई है । सब प्राणी एक ही महान् चेतना के अंश हैं । इस जानकारी के प्रकाश में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करे । एक प्रश्न यह उठाया जाता रहा है कि क्या छोटे अंश अकेले या परस्पर मिल कर उस समग्र चेतना के सब गुण प्राप्त कर सकते हैं? दूसरे शब्दों में, क्या मनुष्य परमेश्वर बन सकता है ? इस प्रश्न के उत्तर में विचारकों में मतभेद रहा है । उत्तर के रूप में अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, शुद्धाद्वैत, द्वैताद्वैत आदि कईं सिद्धान्त प्रतिपादित हुए हैं । डा. लक्ष्मीश्वर झा का कथन है कि अंश रूप में विभाजित चेतनाओं को मिलाकर पुनः एक तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि उन अंशों को भक्ति के ४ प्रकारों सामीप्य, सारूप्य, सालोक्य व सायुज्य द्वारा परिष्कृत न कर लिया जाए । श्रीमती राधा का कथन है कि चेतना के संदर्भ में उनके अंशों के मूल चेतना से भिन्न होने का प्रश्न उठाना ही गलत है । चेतना तो इस प्रकार है जैसे जल और जल की बूंदें । जल की बूंद जल में मिलाने पर तुरंत उसमें मिल जाती है । लेकिन यदि जल की बूंद अशुद्ध हो गई है तो अष्टांग योग, भक्ति आदि द्वारा उसका शोधन आवश्यक है । तथा कि अशुद्धि मिलाकर जो पिष्ट बनाया जाता है, वह जगत रूप ब्रह्म के सदृश है तथा जो बिना अशुद्धि मिलाए पिष्ट बनाया जाता है, वह निराकार या अदृश्य ब्रह्म के सदृश है । नैनोटेक के विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में हम कह सकते हैं कि जब तक प्रकृति का विजातीय तत्त्व ( अशुद्धि के रूप में भी ) चेतन अंश के साथ जुडा है, तब तक जीव, जो चेतन और प्रकृति का सम्मिश्रण है, शुद्ध चेतन ब्रह्म के गुण प्राप्त कर ही नहीं सकता ।

          अब मूल प्रश्न पर पुनः विचार करें कि क्या प्रकृति के अंश से सर्वथा मुक्त चेतनाएं परमात्मा के सभी गुणों से सम्पन्न होंगी? नैनोमीटिरिक विज्ञान की सादृश्यता से तो यही अनुमान किया जा सकता है कि ऐसा नहीं होगा क्योंकि नैनोमीटरिक आकार में होने पर शुद्ध पदार्थ के गुण भी भिन्न हो जाते हैं । जल के अणु में जल की प्रावस्था वाले गुणों की कल्पना नहीं की जा सकती । ऐसा ही प्रतिपादन भगवद्गीता में भी हुआ है । गीता ९.४ व ९.५ में कहा गया है कि ' सब भूत/जीव यद्यपि मेरे/परमात्मा के अंश हैं, लेकिन मैं सारे गुणों के साथ भूतों में स्थित नहीं हूं ' और इसकी पुष्टि में यह उदाहरण भी प्रस्तुत किया गया है कि ' भूतों में स्थित मेरा आत्मा भूतों को उत्पन्न करने वाला और भूतों का पालन - पोषण करने वाला नहीं है ( भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ) ' अर्थात् यह गुण भूतों में स्थित मेरे अंशों/जीवात्माओं को प्राप्त नहीं हैं । स्पष्ट है कि यहां विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त बनाम ' नैनो ' विज्ञान का वर्णन हुआ है ( रामानुजाचार्य के विशिष्ट अद्वैत के अनुसार हम सब उसके अंश हैं, जीव और ईश्वर में अद्वैत की स्थिति है, लेकिन फिर भी वह विशिष्ट है ) ।

          उपरोक्त प्रतिपादन का अनुप्रयोग ' अहंकार ' के सम्बन्ध में करने पर महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्राप्त होते हैं । प्रश्न यह है कि ' अहम् ब्रह्मास्मि ' का भाव और क्षुद्रांश जीवात्मा का ' मैं हूं ' का भाव, जिसकी अनुभूति हम सहज ही कर पाते हैं, इनमें क्या कोई भिन्नता है ? उत्तर मिलता है कि भिन्नता इस बात में है कि ' अहम् ब्रह्मास्मि ' वाली विशाल चेतना का गुण प्रकृति की जकड से सर्वथा मुक्त रहने का है, किन्तु उसके अंश रूप जीवात्मा का क्षुद्र ' अहम् ' प्रकृति से विलग रह नहीं पाता । वह शरीर को इतना कस कर पकडता है कि हम देह को ही ' मैं ' समझते हैं ।

          अन्त में अब हम इस प्रश्न पर विचार करें कि प्रकृति की अशुद्धि को दूर करके हम चेतन ब्रह्म के नैनोमीटरिक कण रूप हमारे व्यक्तिगत शुद्ध जीवात्मा/आत्मा की अनुभूति को किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं ? इसके लिए अष्टांग योग, विभिन्न ध्यान प्रणालियां, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग आदि अनेक विधियां बताई गई हैं । संभवतः ये भिन्न विधियां प्रकृति अंश (स्थूल प्रकृति से निर्मित क्रोमोसोमिक भिन्नता और सूक्ष्म प्रकृति के विचार, भावों - की अशुद्धता) के अनुरूप ही उपयोगी हैं, इसलिए इनका प्रयोग तब ही फलदायी हो सकता है जब वे स्थूल और सूक्ष्म व्यक्तित्व की वर्तमान संरचना के अनुसार प्रयोग में लाए जाएं ।